गुरुवार, 20 जुलाई 2023

विज्ञान और अध्यात्म में भ्रम

आपने अक्सर सुना होगा कि जहां विज्ञान (Science) समाप्त हो जाता है, वहां से धर्म और अध्यात्म (Spiritualism) शुरू होता है। क्या इस वक्तव्य में सब कुछ सही है, या सब कुछ ग़लत है, या कोई और मध्यवर्ती अवस्था भी है। दरअसल यह भ्रम (Illusion) विज्ञान और अध्यात्म की अवधारणा की भिन्न भिन्न और मनमानी समझ के कारण है। मैंने यहाँ धर्म को व्याख्यापित नहीं किया है, क्योंकि अध्यात्म को भी धर्म का उच्चतर अवस्था मान लिया जाता है। 

लगभग सभी लोग विज्ञान को ठीक ठाक समझने का दावा करते हैं, लेकिन शुद्ध एवं प्राकृतिक विज्ञान के भी बहुतेरे अध्येयताओ एवं विद्वानों को भी देखा है, जो इस अवधारणा में खुद भटकें हुए हैं और इस भटकाव के कारण वे दूसरों को भी भटका जाते हैं। अध्यात्म की समझ में तो सदैव ही अस्पष्टता रहती हैं और यह अस्पष्टता सभी के द्वारा अभिव्यक्त अवधारणाओं एवं परिभाषाओं में भी झलकता रहता है। इस अध्यात्म को समझने में हम अक्सर पाखंडी बाबाओं के उलझन में उलझ जाते हैं, और उसी के समझ को हम अध्यात्म को समझने का पैमाना बना लेते हैं। इन बाबाओं यानि तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा परिभाषित अवधारणाओं का कोई तार्किक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार नहीं होता है। तो हमलोग आज इसे भी स्पष्ट कर लें, लेकिन इसका आधार अवश्य ही वैज्ञानिक, तथ्यपूर्ण और  तार्किक होना चाहिए।

सामान्यतः लोग भौतिकी (Physics) या रसायन शास्त्र (Chemistry) या जीवन शास्त्र (Life science) में वर्णित विषयों एवं इनसे संबंधित विषयों को ही एकमात्र विज्ञान मान लेते हैं। इस तरह लोग विज्ञान को कुछ विशिष्ट विषयों में सीमित कर देते हैं, जो उचित नहीं है। दरअसल विज्ञान एक विवेकशील विशिष्ट ज्ञान है, जिसमें निश्चित कार्य कारण संबंध होता है, और यह संबंध निश्चित क्रियाविधि का किसी पारिस्थितिकी में स्थायी स्वरुप का होता है। इसका तात्पर्य यह है कि विज्ञान एक निश्चित नियमों पर आधारित कोई निष्कर्ष होता है और वह सर्वव्यापक होता है, बार बार सत्यापित किए जाने योग्य होता है और समान परिस्थितियों में समान परिणाम देने वाला होता है। मतलब यह है कि विज्ञान कई निश्चित नियमों की कड़ी होता है, या कई प्रक्रियाओं का समन्वित स्वरुप होता है, जो कार्य कारण संबंधों पर आधारित होता है। इस तरह विज्ञान निश्चित तौर विशिष्ट प्रक्रियाओं का कार्यवृत्त या कार्यविधि होता है, और यह कुछ निश्चित विषयों तक सीमित नहीं होता है। इस तरह यह स्पष्ट है कि विज्ञान एक विधि है, जीवन जीने की विधि भी है, मात्र एक अध्ययन विषय ही नहीं है। 

यदि राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र, इतिहास, भूगोल आदि आदि विषय विज्ञान है, तो सभी में प्रक्रियात्मक समानता होती है और यही इसमें वैज्ञानिकता की मात्रा का आधार बनता है। विज्ञान की अवधारणा को समुचित ढंग से नहीं समझने वाले लोगो को ही "अध्यात्म" में विज्ञान नहीं दिखता है। हां, बाबाओं के ज्ञान, यानि दर्शन, यानि व्याख्यान को अध्यात्म कहना उनकी व्यवसायिक आवश्यकता है, यानि आकर्षक मार्केटिंग का उदाहरण हो सकता है, लेकिन इन बाबाओं के वाचन को "आध्यात्मिक ज्ञान" मान लेना किसी अन्य की बौद्धिक दरिद्रता का स्पष्ट उदाहरण हो जाता है।

प्रसंगवश हमें ज्ञान (Wisdomको भी समझ लेना चाहिए। इसी ज्ञान को बुद्धि (Intelligence) भी कहते हैं। ज्ञान सूचनाओं (Information) का संकलन या संग्रहण मात्र नहीं होता है। "ज्ञान" में सूचनाओं के संकलन में एक निश्चित "कार्य कारण संबंध" की, यानि किसी तार्किकता (Logic) की, और किसी विवेकशीलता (Rationale) की अनिवार्य शर्त होती है। जब किसी भी ज्ञान या बुद्धि में ये शर्त मौजूद होता है, तो यह ज्ञान तथ्यपरक, विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक भी हो जाता है और कहलाता है। अब हमें ज्ञान के उपयोग के आधार पर भी इसे और गहराई से समझ लेना चाहिए। इस तरह ज्ञान या बुद्धि किसी भी चीज़ को बदलते हुए परिवेश में उसके यथास्थिति स्वरूप में समझना है, ताकि बदलते परिवेश का अनुशरण, अनुकूलन कर नेतृत्व दिया जा सके। 

जब ऐसा ज्ञान यानि बुद्धि सामान्य उपयोग में लाया जाता है, तो इसे संज्ञानात्मक बुद्धिमत्ता (Cognitive Intelligence) यानि सामान्य बुद्धिमत्ता (General Intelligence) कहलाता है। जब किसी बुद्धि का उपयोग सामने वाले की भावनाओं को समझते हुए और अपने को उसके अनुरूप ढालते हुए लाया जाता है, तो उसे भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) कहा जाता है। जब कोई बुद्धि समेकित समाज को ध्यान में रखकर उपयोग में लाया जाता है, तो उसे सामाजिक बुद्धिमत्ता (Social Intelligence) कहते हैं। और जब किसी बुद्धि के प्रयोग में मानवता एवं प्रकृति भी शामिल हो जाता है, तो वह बौद्धिक बुद्धिमत्ता (Wisdom Intelligence) कहलाता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता को डेनियल गोलमैन ने, सामाजिक बुद्धिमत्ता को कार्ल अल्ब्रेच ने और बौद्धिक बुद्धिमत्ता को तथागत बुद्ध ने सर्वप्रथम रेखांकित किया था।

सामान्यतः वर्तमान डिग्रीधारी सूचनाओं के जानकार होते हैं और 'ज्ञानवान' होने के भ्रम में रहते हैं। निम्न पंच प्रक्रिया के अभाव में कोई भी किसी विषय या संदर्भ का ज्ञानी समझता है, तो मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए। किसी सूचना के ज्ञान बनने के सफर में पांच कड़ियां यानि सीढियां होती है, जिसे अंग्रेजी के पांचों स्वर (Vowels - A, E, I, O, U) के क्रमानुसार याद रखा जा सकता है। इसे आलोचनात्मक चिंतन और विश्लेषण (Critical Thinking n Analysis) की पद्धति भी कह सकते हैं। ये क्रियाएं क्रमशः विश्लेषण करना (Analysis), मूल्यांकन करना (Evaluation), प्रश्न करना (Inquiry),  खोल देना (Openness) एवं सर्वव्यापक करना (Universalism) है। अर्थात किसी जानकारी का विश्लेषण करनाउसका उस प्रसंग में या सन्दर्भ में मूल्यांकन करना, उससे संबंधित प्रश्न करना और सभी संबंधित शंकाओं यानि प्रश्नों का समाधान करना, इसे सभी संदर्भों में और सभी के लिए खोल देना है, और फिर इसे सर्व व्यापक बना देना है।  

ऐसा ही ज्ञान ही विज्ञान का दावा करता है। ऐसा ज्ञान जब विवेकपूर्ण हो जाता है, तो यह विशिष्ट ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। उपरोक्त प्रक्रिया के अभाव में भी भारत के अधिकतर लोग ज्ञानवान होने का दावा करते हैं, और भारत की वर्तमान दुर्दशा का भी यही एकमात्र बडा कारण भी है। यह प्रक्रिया और परिणाम तो अध्यात्म में भी है, जो विज्ञान में भी मौलिक है।

जब अध्यात्म में भी ऐसा ही वैज्ञानिक क्रियाविधि अपने साथ विवेकपूर्ण और विशिष्ट अर्थ लेकर आता है, तो अध्यात्म कैसे विज्ञान नहीं हैजिन्हें विज्ञान की समझ नहीं है, और जो अध्यात्म की मौलिक समझ नहीं रखते है, उन्हें ही अध्यात्म विज्ञान से पृथक, विज्ञान से विशिष्ट और विज्ञान से उच्चस्थ दिखता है।

विज्ञान एक सामान्य एवं निश्चित प्रक्रिया (Process) है, और ध्यात्म भी एक निश्चित प्रक्रिया से प्राप्त उच्चतर विशिष्ट विषय (Subject) है।  

विज्ञान एक कार्यप्रणाली (Methodology) है, जीवन प्रणाली भी है, और अध्यात्म  भी एक विशिष्ट प्रणाली से प्राप्त एक अवस्था (Stages) है एवं यह भी एक विशिष्ट सचेतन प्रणाली है। 

विज्ञान किसी विषय की क्रियाविधि (Mechanism) को समझाता है, और ध्यात्म ज्ञान का सर्वोच्च अवस्था है।

विज्ञान के विकास में कई सहभागी हों सकते हैं, जबकि ध्यात्म में कोई अकेला ही चल सकता है। 

विज्ञान में गुरु और शिष्य, यानि ज्ञान देने वाला और ज्ञान लेने वाला दो भिन्न भिन्न अस्तित्व होता है, जबकि ध्यात्म में दोनों एक ही व्यक्ति (ज्ञान देने वाला और पाने वाला) होता है।

अब हमें आगे बढ़ने से पहले ध्यात्म को समझ लेना चाहिए।ध्यात्म शब्द 'अधि' यानि 'ऊपर' और 'आत्म' (Self) से बना है, अधि और आत्म। जब किसी का आत्म अधि, यानि ऊपर, यानि अनन्त प्रज्ञा (Infinite Intelligent) से जुड़ जाता है, तो यही "ध्यात्म" कहलाता है, और तब वह व्यक्ति अनन्त प्रज्ञा से अनन्त स्वरुप का ज्ञान प्राप्त करने लगता है। ऐसे ज्ञान आभास, सहज ज्ञान, अंतर्ज्ञान (Intuition) के रूप में आते हैं और यह नवाचार (Innovation) का आधार बनता है। किसी के आत्म (Self, not Soul) में उसका मन (Mind) एवं spirit शामिल है, जिसे संयुक्त रूप में चेतन (Consciousness) भी कहते हैं। इस तरह चेतन की अवस्था क्रमशः अचेतन, अवचेतन, चेतन, एवं अधिचेतन होता है। अतः चेतन का अनन्त प्रज्ञा से जुड़ना ही अध्यात्म है। कुछ धूर्त साज़िश के तहत् आत्म को आत्मा से प्रतिस्थापित कर देते हैं, जो स्पष्टतया गलत और मनगढ़ंत है। 

इस तरह स्पष्ट है कि अध्यात्म विज्ञान का ही एक विशिष्ट अवस्था या विशेषज्ञता होता है। यह एक कौशल है , जिसे कोई भी सीख सकता है, विकसित कर सकता है। इसमें अनन्त प्रज्ञा से ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इस संदर्भ में कुछ आध्यात्मिक व्यक्ति के नाम में तथागत बुद्ध, अल्बर्ट आइंस्टीन, कार्ल मार्क्स, सिग्मंड फ्रायड, स्टीफन हॉकिंग आदि आदि को ले सकते हैं, और ऐसे ही कई और उदाहरण हैं। लेकिन बाबाओं ने अपने "अंदाजों" (Styles) के आकर्षक और व्यापक मार्केटिंग के रणनीति के अन्तर्गत ज्ञान के इस सर्वोच्च अवस्था के शब्दावली का उपयोग करते हैं। और हमारे तथाकथित ज्ञानी और विज्ञानी बुद्धजीवी भी अपने शब्दावली में इसे प्रयोग में ला कर उसे मान्यता देते रहते हैं।

इसिलिए ऐसे मामलों में सबसे पहले किसी की मौलिक अवधारणा एवं परिभाषा को समझिए, और तब आगे बढिए। 

मुझे अब समाज के "पके हुए", "थके हुए", और "बिके हुए" लोगों से उम्मीद भी नहीं है। भविष्य युवाओं का है, युवाओं के लिए है, और इसे निष्पादित होना भी युवाओं के द्वारा ही है।  ध्यान रहे कि मैंने युवाओं में शारीरिक युवाओं को और बौद्धिक युवाओं (इसमें शारीरिक उम्र आधार नहीं है) को भी शामिल किया है। आप घालमेल को समझें, बारिकियों को जानें और भारत को फिर से "विश्व गुरु" (Global Leader) बनाएं।

आचार्य निरंजन सिन्हा  जी

 

बुधवार, 19 जुलाई 2023

हमारे नेताओं का वहम

lusions of Ours Leaders)

हमारे राजनीतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक नेताओं मे विकास और प्रगति के दावों के संबंध में बहुत से वहम या विभ्रम है। ये परिस्थितियों की संरचनाओं और शक्तियों के परिणाम को भी अपनी उपलब्धियां समझ लेते हैं। और सामान्य जनता सहित तथाकथित बुद्धिजीवी भी उसी दावे में बहने लगते हैं। पहले आप दो छोटे परन्तु मजेदार प्रसंग सुन लें।

मैं एक लोकल ट्रेन में बैठा था। ट्रेन रुकती थी और कुछ समय में खुल जाती थी। सामने बैठे बच्चे का व्यवहार देख रहा था और उसे सुन भी रहा था। ट्रेन रुकने के कुछ समय बाद बच्चा  ट्रेन को आगे बढ़ाने यानि उसे चलाने के लिए अपनी सीट को खड़ा होकर आगे की ओर ठेलने का प्रयास करता था और अपनी मां को बताता था कि वह ट्रेन को गति में ले आया।  उसकी एक दो हरक़तों को ही देख पाया, क्योंकि वे लोग अगले स्टेशन पर उतर गए थे।

ऐसा नजारा एक बार और देखने को मिला। वातानुकूलित द्वितीय क्लास में बैठा था। कहने का तात्पर्य इस बार किसी सामान्य वर्ग के बच्चे का प्रसंग नहीं है। मतलब एक 'तथाकथित ज्ञानी' यानि 'डिग्रीधारी सम्पन्न' व्यक्ति का प्रसंग है। इस नजारे में वह व्यक्ति अपनी पत्नी को बता रहा था कि इनकी यह कोच बहुत कम समय में पटना पहुंचा देगी, और उनकी पत्नी उनके ज्ञानवान जानकारी और उनके समझदारी भरे निर्णय से गौरवान्वित भी थी। मतलब यह था कि यह कोच अन्य सामान्य, शयनयान, या अन्य से गति के मामले में बेहतर था, और इसीलिए वह व्यक्ति ज्यादा समझदार था। बातें सुविधाओं के बेहतरीन होने के संदर्भ में नहीं की जा रही थी, वे  सिर्फ गति की बातें कर रहे थे।

मैं सोचने लगा कि अधिकांश नेताओं की दशा यानि स्थिति भी यही है। इसी समझ की स्थिति को "वहम" यानि विभ्रम (Hallucination) या "भ्रम" (Delusion, not Illusion) कहा जाता है। यह स्थिति सभी समाजों, संस्कृतियों, संगठनों और देशों के नेताओं की है। ये नेता राजनितिक भी होते हैं, और सामाजिक एवं सांस्कृतिक भी होते हैं। जब अधिकांश जनता अज्ञानी होते हैं, जो अक्सर होता है, तो ऐसे नेताओं द्वारा किए गए प्रगतिशील और क्रांतिकारी बदलाव के बड़े बड़े दावे तुरन्त सही मान लिए जाते हैं। ध्यान रहे कि जिन लोगों में "आलोचनात्मक चिंतन एवं विश्लेषण" (Critical Thinking n Analysis) की क्षमता नहीं होती, वे डिग्रीधारी भी अज्ञानी ही होते हैं। 

बहुत से राज्यों, देशों और संगठनों के नेतागण विकास के बड़े बड़े दावे करते हैं। जब इसे आलोचनात्मक विश्लेषण से समझा जाता है, तो दूसरा नजारा दिखने लगता है। पहली बात तो यह है कि इन नेताओं को "वृद्धि" (Growth) और "विकास" (Development) में अन्तर समझ में नहीं आता है। दूसरी बात यह है कि ये समाज, राज्य, देश इन विकास के समेकित सूची में उसी स्थान पर होते हैं, या नीचे सरकते होते है, जहां पहले भी थे। मतलब ट्रेन के किसी कोच ने स्वतंत्र रूप में कोई विशेष गति नहीं बनाया है, बल्कि वह कोच ट्रेन के गति को ही बनाए हुए हैं। ऐसे नेतागण "ऐतिहासिक शक्तियों और बाजार की शक्तियों" की गति को भी अपनी उपलब्धियां समझ लेते हैं। वे ऐतिहासिक शक्तियों और बाजार की शक्तियों को और उसकी क्रियाविधि एवं उसके परिणाम को नहीं समझते हैं। ये नेता ऐतिहासिक और बाजार की शक्तियों के परिणाम को अपना 'कमाल' समझते और बताते हैं।

बहुत से देशों की आबादी बडी होती है, अर्थात उस आबादी की खाने और पचाने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यानि बाजारु खपत की क्षमता बहुत अधिक होती है। ऐसे बड़ी आबादी के देशों के नेताओं का वैश्विक सम्मान बहुत होता है। ऐसा वैश्विक सम्मान उन्हें उनके अच्छे व्यक्तित्व के आधार पर नहीं मिलता है, बल्कि उनके देश की आबादी की बाजार की खपत की क्षमता के कारण मिलती है। उनका वैश्विक सम्मान बाजार की शक्तियों के कारण होता है और वे नेता इसे अपना व्यक्तित्व का परिणाम समझ लेते हैं। बाजार की शक्तियों को समझना जरूरी है और ऐसे तथाकथित करिश्माई नेताओं की वास्तविकता को भी समझना जरूरी है।

हमें बड़े इत्मीनान से ऐतिहासिक शक्तियों और बाजार की शक्तियों और उनकी संयुक्त एवं समन्वित क्रियाविधि (Mechanism) को समझना चाहिए। ये शक्तियां संस्थागत (Institutionalised) रूप में क्रियान्वित होते हैं और इसीलिए इनमें निरंतरता (Continuity), व्यापकता (Comprehensiveness), गहनता (Intensity) और गहराई (Depth) भी होती है। ध्यान रहे कि एक 'संस्था' (Institution, not Institute)  अपने प्रभाव में सदैव एक व्यक्ति या समूह से ज्यादा प्रभावी, असरदार, व्यापक, और निरंतरता बनाए रखती है।

ऐतिहासिक शक्तियां (Historical Forces) अर्थात इतिहास को बदलने वाली यानि समाज और संस्कृति को रुपांतरित करने वाली शक्तियां हैं। सारी रुपांतरण (Transformation) यानि स्थायी परिवर्तन मानव और उसके द्वारा निर्मित संस्थाएं ही प्रकृति में हस्तक्षेप कर करता है। मतलब रुपांतरण क्रियाविधि का केंद्र बिन्दु मानव और उसके द्वारा निर्मित संस्थाएं हैं। मानव की शारीरिक क्षमता और योग्यता उसके भौतकीय शरीर में होता है और मानव का 'आत्म' (Self, not Soul) यानि 'मन' (Mind) भी शरीर के ही अस्तित्व पर ही निर्भर है। इस तरह किसी भी मानव का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कृत्य उसके भौतकीय अवस्था पर ही निर्भर है और यह भौतकीय अवस्था आर्थिक शक्तियों यानि उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधनों और शक्तियों पर निर्भर करता है। अर्थात यही ऐतिहासिक शक्तियों हुई, जो इतिहास बदलता रहता है।

इसी तरह बाजार (Market) की शक्तियां भी बहुत ही प्रभावशाली होती है। बाज़ार ऐसी जगह को कहते हैं, जहां पर किसी भी चीज़ (Things) का व्यापार होता है और चीज़ में वस्तु, सेवा, सम्पत्ति, सम्पदा, विचार, व्यक्तित्व, नीति, आदि कई प्रकार शामिल होता है। बाजार दिखने में अर्थशास्त्रीय अवधारणा है, परन्तु इसका प्रभाव सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षणिक, तकनीकी और राजनीतिक भी होता है। यदि आपके पास बाजार को प्रभावित करने की क्षमता है, या आपकी क्रय (Purchase) की अद्भुत क्षमता है, तो आप बाजार की शक्तियों का उपयोग कर अपने समाज या देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षणिक, तकनीकी और राजनीतिक हैसियत बदल सकते हैं। बाजार का प्रभाव भी ऐतिहासिक शक्तियों के प्रभाव की तरह ही "तितली प्रभाव" (Butterfly Effect) की तरह होता है। अब आप ऐतिहासिक शक्तियों और बाजार की शक्तियों को संक्षेप में समझ चुकें हैं। अब आप इन दोनों के संयुक्त और समेकित प्रभाव को भी अपनी कल्पनाओं में देख सकते हैं।

उपरोक्त दोनों के संयुक्त और समेकित प्रभाव को उदाहरण के साथ समझा जाय। लेकिन इनके समन्वित प्रभाव को नेतागण अपने प्रयास का प्रभाव बताते हैं और उसके समर्थक उसी में झूमते रहते हैं। सामान्य जनता को तो छोड़िए, तथाकथित बुद्धजीवियों की स्थिति भी दयनीय है और वे आलोचनात्मक चिंतन एवं विश्लेषण के अभाव में इसे नेताजन की ही उपलब्धि मान लेते हैं। ध्यान रहे कि मैं व्यक्तिगत प्रयासों की उपेक्षा नहीं कर रहा हूं, लेकिन उनके उपलब्धियों के बड़े बड़े दावे को आलोचनात्मक चिंतन और विश्लेषण की नजरिया से देखने एवं समझने का आग्रह ही कर रहा हूं। 

व्यक्तियों की नेतृत्वकारी क्षमता की उपलब्धियां भी "तितली प्रभाव" रखतीं हैंयदि उन्होंने मानव में सांस्कृतिक बदलाव (इसे मानसिकता का बदलाव कहते हैं) किया है, अन्यथा सभी बदलाव दिखावटी एवं सतही है, जो उनके द्वारा नहीं प्राप्त किए गए है। संस्कृति सामाजिक मूल्यों, प्रतिमानों, अभिवृति, व्यवहार, कर्म, परम्पराओं आदि के प्रति चिन्तन और व्यवहार को समाज से सीखता है। यह संस्कृति आदमी और समाज को संचालित करने का 'साफ्टवेयर' है। इसे बदलें बिना विकास के सभी दावे महज़ एक तमाशा होता है। मात्र सीमेंट की खपत को विकास नहीं समझा जा सकता है।

ऐतिहासिक शक्तियों ने मनुष्यों को पहाड़ों पर से उतार कर मैदानों में लाया। कृषि के अतिरेक (Surplus) उत्पादन ने नगर, राज्य, बाजार, मुद्रा, लिपि एवं भाषा, सरकार आदि संस्थाओं को उदित और संवर्धित किया। इन दोनों (इतिहास और बाजार) ने ही समन्वित रूप में बुद्धि का विकास किया, सामंतवाद, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद आदि का विकास किया, जो अभी भी रुपांतरित स्वरुपों में कार्यरत हैं और प्रभावी भी है। इन दोनों ने ही विज्ञानवाद, आधुनिकतावाद, डाटावाद, मानवतावाद को भी संवर्धित किया है। इसी ऐतिहासिक शक्तियों में बाजार की शक्तियां भी क्रियाविधि और प्रभाव में एक दूसरे से गुंथी हुई है।

यह स्थिति सभी क्षेत्रों, यानि राजनीतिक सहित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के तथाकथित नेताओं की भी है। राजनीतिक नेता भी ऐतिहासिक और बाजार की शक्तियों को नहीं समझते हैं, या समझ कर भी इसे स्वीकार करना नहीं चाहते हैं। इन तीनों क्षेत्रों यानि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में संयुक्त एवं समन्वित रूप में कई समस्याएं पसरी हुई है। इनमें ग़रीबी, बेरोजगारी, जाति व्यवस्था की असमानता, धर्म विभेद, लैंगिक विभेद, वेश्यावृत्ति, भिक्षावृत्ति आदि की समस्या विभिन्न स्वरूपों और अवस्थाओं में व्याप्त है। यदि ऐतिहासिक शक्तियां और बाजार की शक्तियां जाति व्यवस्था को कमजोर कर रही है, तो सामाजिक सांस्कृतिक नेता इसे अपने कार्यों के प्रगति का परिणाम बता रहे हैं और अपने अनुयायियों के मन में नाच भी रहे होते हैं। यदि बाजार की शक्तियां लैंगिक (Gender, not Sex) विभेद मिटा रहा है, तो ये नेता इसे अपनी उपलब्धियों में गिना रहे हैं। यदि बाजार की शक्तियां गरीबी घटा रही है और बेरोज़गारी बढ़ा रही है, तो ये नेता गण गरीबी घटने का तथाकथित कमाल अपने नाम ले लेते हैं और बेरोज़गारी को बाजार का करतब बता दे रहे हैं। उदाहरण भरे पड़े हैं, सिर्फ आपको अपना नज़र और नजरिया बदलना है।

इन सामाजिक और सांस्कृतिक नेताओं की ऐसी बेचारगी क्यों है?  ये अपनी विचारों में, परिस्थितियों की संरचनाओं के समझ में, बदलते संदर्भ में और अवधारणाओं में कोई पैरेडाईम शिफ्ट (Paradigm Shift) नहीं करते और सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलाव कर देने का हवाई ख्वाब देखते रहते हैं। ये "सत्ता परिवर्तन" (Change in Rule) को ही "व्यवस्था परिवर्तन" (Change in System) समझ लेते हैं, और इसीलिए बेचारे बने  रह जाते हैं। इसे आप उनकी "पैरेडाईम शिफ्ट" दरिद्रता भी कह सकते हैं। ये ऐतिहासिक शक्तियों और बाजार की शक्तियों के उद्विकासीय प्रभाव (Evolutionary Effect) की गति को ही अपनी उपलब्धियां समझ लेते हैं। वे यह भी समझते हैं कि उनकी दिशा समुचित एवं सही है और बदलाव की गति भी पर्याप्त है। ऐसे नेता वस्तुत: उस समाज, संस्कृति और देश के समय, संसाधन, ऊर्जा, धन, उत्साह और जवानी को बर्बाद कर रहे होते हैं। पूरा समाज और राष्ट्र ठहरा रहता है, और वे विकास के नेतृत्व को देने के दावे के विभ्रम में रहते हैं। भ्रम (Illusion) किसी वस्तु को ग़लत समझना होता है, जबकि विभ्रम (Delusion/ Hallucination) किसी वस्तु की अनुपस्थिति को भी कुछ समझ लेने की अवस्था है।

आप तो बौद्धिक हैं, आप ही विचार कीजिए। 

मानवता के विकास में मैं भी आपके साथ हूं।

आचार्य प्रवर निरंजन ।

 

 

सोमवार, 17 जुलाई 2023

कथानक ही शासन करता है

 (The Narrative itself Rules)

चूंकि कथानक (Narrative) ही शासन करता है, यानि कथानक ही व्यवस्था और शासन को संचालित, नियमित, नियंत्रित करता है और उसे प्रभावशाली बनाता हैं, इसीलिए इस महत्वपूर्ण और सार्थक अवधारणा (concept) को समझना और उसकी क्रियाविधि (mechanism) के साथ साथ उसके प्रभाव एवं प्रयोग की विधि को जानना समझना जरूरी होता है। कथानक को आख्यान भी कहा जाता है। एक नारा (slogan) या एक उक्ति (quote) एक कथानक की संरचना का निचोड़ यानि सार (abstract) होता है। इसी कारण इसे ध्यान से समझा जाय, यदि आप शासन या व्यवस्था पर नियंत्रण या प्रभाव चाहते हैं

कथा एक छोटी कहानी (Story) होती है, जिसमें एक साहित्यिक रचना अपनी अभिव्यक्ति में सम्पूर्णता (प्रारंभ से समापन तक) लिए होती है। जबकि एक कथानक एक सुस्पष्ट भाव या मंशा को अभिव्यक्त करने के लिए एक कथा स्वरुप में होती है, जिसे किसी स्पष्ट लक्ष्य या उद्देश्य के लिए संगत, सरल और बुद्धिग्राह्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। अतः एक कथानक यानि एक Narrative वह कहानी है, जिसमें व्यक्ति विशेष, घटनाओं और विचारों एवं आदर्शों को जोड़ते हुए उनका सूक्ष्म, विस्तृत, गहन और सुविचारित भावनात्मक ब्यौरा एवं वर्णन होता है, जिसका उद्देश्य सामने वाले श्रोताओं को कथाकार अपनी मंशा की मंजिल तक ले जाएं। इस तरह एक कथानक एक ऐसी वर्णनात्मक प्रसंग या कहानी होती है, जो भावनात्मक लहरें उत्पन्न कर श्रोताओं को बहाकर वहां ले जाती है, जहां उस कथानक का सृजनकर्ता अपने श्रोताओं को ले जाना चाहता है।

इस तरह एक कथा किसी भी कथ्यात्मक कृति का संरचनात्मक ढांचा (Structural Frame) मात्र होता है, जबकि एक  कथानक उस कथा के मूल संरचना पर आधारित किसी स्पष्ट और पूर्व निर्धारित लक्ष्य की ओर जनमानस को बहा ले जाने की भावना से प्रस्तुति होता है। स्पष्ट है कि एक कथानक वर्णनात्मक शैली में सरल, सहज और साधारण रूप में प्रस्तुत होगा एवं सभी के लिए बोधगम्य भी होगा। यह कथा स्वरुप से ज्यादा असरदार होता है और लक्ष्य को प्राप्त करने में अधिक कारगर साबित होता है। जहां एक कथा अपने वाचन में श्रोता को आने वाली अगली कड़ी (आगे क्या होगा) के लिए उत्सुकता जगाती हैं, वहीं एक कथानक अपने श्रोताओं को 'क्यों' और 'कैसे' आदि उत्सुकताओं को सम्हालता है और इसलिए एक कथाकार अपने श्रोताओं को बहा ले जाने में सक्षम और सफल भी होता है।

एक कथानक को तर्कसंगत कार्य -कारण अंत: संबंध पर आधारित दिखना होता है, यथार्थ एवं वास्तविकता की पूर्णता का आभास देता हुआ होना होता है, और विवेकशील यानि समाज और मानवता के लिए समुचित होने का झलक दिखलाना या झांसा देता हुआ (यानि झूठों का पुलिंदा) होना होता है। समेकित रूप में एक कथानक को वैज्ञानिकता से पूर्ण वास्तविक दिखना होता है। इतने तत्वों के संयोजन और समेकन से ही एक कथानक भावनापूर्ण उत्तेजना (धर्म अब ख़तरे में है) पैदा कर उसमें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर अपने लक्ष्यों से सराबोर कर देता है। यह काल्पनिक होते हुए भी प्रभाव में वास्तविक होती है। एक कथानक अपने श्रोताओं को विचारों की जीवंतता प्रदान करता है।

कोई व्यवस्था या शासन या वर्ग या राष्ट्र कथानकों का उपयोग कर ही अपने विचार, आदर्श, मूल्य आदि का प्रचार प्रसार करता है और विरोधी को नुक़सान पहुंचाने (चीन विश्व में साम्यवाद फ़ैला देगा, मानों मानवता की बात मानवता के विरुद्ध होता है) में इसका प्रयोग उपयोग करता है। चूंकि इसमें भावनाओं को उभारने और बहा ले जाने की क्षमता होती है, इसीलिए यह ठोस तथ्यों और वास्तविकताओं के होने के बावजूद भी उस पर प्रभावी हो जाता है। कहा भी गया है कि दिमाग हमेशा दिल से हार जाता है, अर्थात तथ्य, तार्किकता एवं वैज्ञानिकता समेकित रूप में भी सदैव भावनाओं से हार जाता है। इसीलिए जनता को अपने पक्ष में करने के लिए मुद्दों को भावनात्मक बनाया जाता है और भावनात्मक रूप से प्रस्तुत भी किया जाता है। मानव अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी भावनात्मक बातों में भूल जाता है (जैसे धर्म के सामने गरीबी का प्रसंग निरर्थक हो जाता है) , यानि उसे भी प्राथमिकता नहीं देता है।

किसी की संस्कृति उसके इतिहास से निश्चित और निर्धारित "ऐतिहासिक अवबोध" होता है, और यही ऐतिहासिक अवबोध संस्कार उत्पन्न करता है। और इसीलिए संस्कृति में भावनात्मक मुद्दे उभारने की क्षमता और योग्यता होती हैं। संस्कृति में तथाकथित धर्म भी होता है, प्रजाति भी होता है, जाति यानि समुदाय भी होता है, परम्परा एवं रीति रिवाज भी होता है। इस संस्कृति में विशालता, व्यापकता और गहानता लिए विरासत भी होता है। इस तरह संस्कृति जड़ता (Inertia) पैदा करता है, यानि समाज और समुदाय की सापेक्षिक स्थिति में स्थिरता देता है। यानि यदि वह गतिमान है, तो गति की अवस्था बनाए रखेगी, और यदि वह स्थिर है, तो स्थिरता की अवस्था बनाए रखेगी। इसे ही "सांस्कृतिक जड़ता" (Cultural Inertia) कहते हैं। इसी सांस्कृतिक जड़ता के गुण विशेषताओं का उपयोग कथानक में किया जाता है, और तब यह कथानक भयानक भावनाओं का उभार भूखो और नंगों में भी कर देता है। यही कथानक लोगों में डर और लालच भी पैदा कर देता है। धर्म यानि सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र एवं समुदाय आदि इसी कारण भावनात्मक सैलाब लाता है। इसे समझ कर इसका उपयोग दुरुपयोग किया जा सकता है। इसीलिए व्यवस्था को अपने विचार धारा के अनुकूल इतिहास को बनाना पड़ता है। चूंकि सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन नहीं होता है, इसलिए हर इतिहास उसके लिए प्रामाणिक और वैज्ञानिक होता है। इसीलिए इतिहास को बदलना पड़ता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला एलिनोर रूज़वेल्ट (Eleanor Roosevelt), जो राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डि रूज़वेल्ट की पत्नी थी, ने एक बार कहा था - छोटे लोग यानि छोटे विचारक व्यक्तियों का वर्णन ज्यादा करते हैं, मध्यम दर्जें के लोग यानि विचारक घटनाओं का ब्यौरा ज्यादा देते हैं, और बड़े विचारक आदर्शों, सिद्धान्तों और मूल्यों की बात ज्यादा करते हैं। अर्थात यह बढ़ते हुए यानि चढ़ते हुए क्रम में Individual, Incidence, Ideas (3 I's) के स्तर का निर्धारण करता है। तय है कि समाज में साधारण लोग ही अधिसंख्यक होते हैं और वे किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा, यानि गुणगान एवं आलोचना में ही डूबे रहते हैं, और ऐसे लोग व्यक्ति वर्णन आधारित (जैसे मोहनलाल का तथाकथित कृतत्व) कथानक में आसानी से बहा लिए जाते हैं। समाज में मध्यम दर्जें के लोग अपेक्षाकृत बहुत कम होते हैं, और इसीलिए इनके मानसिक स्तर के अनुरूप इनको बहाने के लिए, यानि तैरने का अहसास दिलाने के लिए घटनाओं के "ब्यौरात्मक वर्णन" (Detailed Discription) की आवश्यकता होती है और ऐसी ही कथानक (जैसे कोई पुलिसिया या सैन्य कार्रवाई) बनानी पड़ती है। बड़े लोग यानि बड़े चिंतक एवं विचारक इस मानसिक स्तर के होते हैं कि किसी भी प्रकार की चटपटी कथानक उनकी आलोचनात्मक विश्लेषण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकशील चिंतन के गर्मी में ठहर नहीं पाता और उसके वास्तविक प्रयोजन को जान लिया जाता है। एक शानदार कथानक बनाने में उपरोक्त स्तर और उनके मनोविज्ञान का ध्यान रखना पड़ता है। 

हमें कथानक गढ़ने और उसकी क्रियाविधि को समझने के लिए Institute of Propaganda Analysis के अध्ययन का भी एक अवलोकन अवश्य किया जाना चाहिए। यह संस्था अमेरिका में द्वितीय विश्व युद्ध के समय स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रचारित और प्रसारित कथानकों यानि प्रोपेगैंडा (Propaganda) की वास्तविकता को समझने के लिए किया गया था। इसे आप सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन विकसित करना कह सकते है, जिसकी आवश्यकता आज़ भारत को भी है। इसे समझ कर कोई अपने मन या लक्ष्य के अनुरूप कथानक तैयार कर सकता है। यह सभी को अपने पारिस्थितिकी, अपनी परिस्थितियों, और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कथानक को तैयार करने में सहायता करेगा। इसमें कथानक को प्रचारित और प्रसारित करने की सात तकनीक बताई गई है, जिसे 1. Name - Calling, 2. Glittering Generality, 3. Transfer, 4. Testimonial, 5. Plain Folks, 6. Card Stacking, and 7. Bandwagon के नाम से जाना जाता है। 'वोल्गा मैया' ने बुलाया है, ' बिरयानी' की खुशबू ने पुकारा है, गरीबी को मिटाना है, धर्म ख़तरे में है (मानो इसके अनुयाई उनके ईश्वर से भी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं और उनका ईश्वर धर्म बचाने सक्षम में नहीं है)वह गया (नगर) गुजरा आदमी है (मानों गया एक अपवित्र नगर है और उससे गुजरने वाले निकृष्ट लोग हैं), आदि आदि कई कथानकों के उदाहरण हैं। जब आप इन सातों तकनीकों का ध्यान पूर्वक अध्ययन करेंगे तो आपको समझ में आएगा कि कुछ प्रभावशाली राजनीतिक समूह भी इसका प्रभावपूर्ण उपयोग या दुरुपयोग आज कर रहे हैं।

वही शासन करता है, या कर रहा है, जिसे कथानक यानि Narratives गढना आता है। यदि आपकों भी शासक बनना है, या शासक वर्ग बनना है, तो आप भी कथानक की अवधारणा और क्रियाविधि को समझिए। और विश्व व्यवस्था पर शासन कीजिए। समझने के लिए, हो सकता है, इसे एक से अधिक बार पढ़ना पड़े। अन्यथा आप शासक बनने के दौर में घिसटते रहेंगे।

आचार्य प्रवर निरंजन  

(आप मेरे अन्य आलेख niranjan2020.blogspot.com पर अवलोकन कर सकते हैं)

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और धर्म

(Invisible Mechanism of Cultural Imperialism n Religion)

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism) और किसी भी धर्म को समझने से पहले हमें साम्राज्यवाद की अवधारणा को समझना चाहिए। साम्राज्यवाद वह दृष्टिकोण (perspective) है, या क्रियाविधि (mechanism) है, या व्यवहार (practice) है, जिसके अनुसार कोई महत्त्वाकांक्षी समाज या वर्ग या राष्ट्र अपनी शक्ति, प्रभाव , नियंत्रण, लाभ और गौरव को बढ़ाने के लिए अन्य दूसरे के प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है, और अपने निजी स्वार्थ में उनका उपयोग करता है। यह हस्तक्षेप, प्रभाव या नियंत्रण राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या अन्य किसी भी प्रकार का या स्वरुप में हो सकता है। साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक स्वरुप के अलावा अन्य स्वरुप सर्वज्ञात और दृश्य भी होता है। और जब कोई साम्राज्यवाद अपने को किसी सांस्कृतिक आवरण मे छुपा लेता है, तो वह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद हो जाता है। 

लेकिन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का एक महत्वपूर्ण स्वरुप ही आजकल "प्रचलित धर्म" कहलाता है। सामन्तवाद और साम्राज्यवाद की संस्कृति को मानव, समाज, संस्कृति और मानवता के लिए सदैव नकारात्मक और विध्वंसात्मक माना जाता रहा है। हमें इस महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कारक "संस्कृति" को ही साकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक बनाना है, जो मानवता का संवर्धन करता रहे। यह सामन्तवाद और साम्राज्यवाद ही उन व्यापक समाजों में "सामाजिक पूंजी" (Social Capital) और "सांस्कृतिक पूंजी" (Cultural Capital) का निर्माण नहीं होने देता। पूंजी वह धन है, जो उत्पादक (Productive) होता है। यह पूंजी अपने गुणात्मक प्रभाव में वित्तीय एवं अन्य पूंजी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का यह स्वरूप भी अदृश्य होता है, या अदृश्य बना दिया जाता है। आर्थिक साम्राज्यवाद में क्रमानुसार  वणिक साम्राज्यवाद, औद्योगिक साम्राज्यवाद और वित्तीय साम्राज्यवाद शामिल होता है। इस तरह आर्थिक साम्राज्यवाद का आधुनिक स्तर 'वित्तीय साम्राज्यवाद' भी अदृश्य होता है, या अदृश्य बना दिया जाता है। हालांकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और वित्तीय साम्राज्यवाद का प्रभाव सबसे ज्यादा व्यापक, विस्तृत, गंभीर एवं खतरनाक स्वरुप का होता है।  लेकिन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद "प्रचलित धर्म" के आवरण (veil) में सदियों तक निरंतरता और प्रभाव रखतीं हैंजिससे वह सनातन भी हो जाता है, या ऐसा कहने का दावा किया जाता है। धार्मिक आवरण के कारण ही साम्राज्यवाद के इस मौलिक स्वरूप की ओर किसी का ध्यान  ही नहीं जाता, लेकिन जिनका ध्यान जाता भी है, तो वे समाज के प्रभुत्व सम्पन्न समुदाय के होते हैं और वे निजी वर्ग स्वार्थ में चुप रहते है।

विश्व में आज जितने भी अविकसित या तथाकथित विकासशील देश हैं, यानि वर्तमान संसाधनों के बावजूद अपेक्षाकृत बहुत पिछड़े हुए हैं, वह सभी इन्हीं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के मारे हुए हैं। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद तो सदैव धार्मिकता का आवरण ओढ़े ही रहता है, और इसी स्वरुप में वह क्रियाशील भी रहता है। धार्मिकता का आवरण दे देने से उपनिवेशित, यानि शोषित भी इसे अपना धार्मिक कर्तव्य समझ कर पूर्ण मनोयोग और समर्पण से उन कार्यों को करता रहता है, जो उन्हें मानवता के लिए नहीं करना चाहिए। तब वह किसी भी प्रकार के साम्राज्यवाद का शिकार भी है, सामान्यतः ऐसा वह मानने को भी तैयार नहीं होता है, खासकर जब साम्राज्यवादी तथाकथित अपने ही हों। ऐसा करना यानि धर्म के नाम पर दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना तो उसके लिए अगले जन्म में बेहतर परिणाम या स्वर्ग पाने के लिए भी आवश्यक होता है, जो पूर्णतया काल्पनिक होता है। आधुनिक विज्ञान तो इन बकवास अवधारणाओं को कतई मान्यता नहीं देता है। तब यह सब उसका सांस्कृतिक विरासत और गौरवमयी हो जता है।

अपने मौलिक चरित्र और क्रियाविधि में समानता रखते हुए भी साम्राज्यवाद जहां आधुनिक युग की अवधारणा है, वहीं सामन्तवाद मध्ययुगीन अवधारणा है। साम्राज्यवाद जहां दूसरे राष्ट्रीयता के लोगों पर आरोपित किया जाता है, सामन्तवाद में अपने - पराए की कोई बाध्यता नहीं होती है, यानि अधिकांशतः अपने ही लोग इसके शिकार होते हैं या प्रताड़ित हैं। सांस्कृतिक सामन्तवाद ही आधुनिक परम्परागत धर्म है, जबकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद अपने में सांस्कृतिक सामन्तवाद को भी शामिल करते हुए इससे विस्तृत अवधारणा है। सांस्कृतिक सामन्तवाद की कोई चर्चा ही नहीं होती है, क्योंकि इसी के साथ परम्परागत वर्तमान धार्मिक सम्प्रदाय अस्तित्व में आए हैं, जबकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद में सिर्फ साम्राज्यवादी देशों के सांस्कृतिक प्रसार और फैलाव को ही ध्यान में रखा जाता है। ध्यान रहे कि दोनों के मौलिक चरित्र और क्रियाविधि की वैसी चर्चा नहीं की जाती है, जिससे समाज के स्थापित परम्परागत समृद्ध और प्रभावशाली वर्गीय हितों को नुक़सान होता है। 

इसीलिए कई संस्कृतियों में यह  दोनों ही, अर्थात सांस्कृतिक सामन्तवाद और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एक ही होता है, जैसे वर्तमान भारतीय संस्कृति की अवस्था। इन दोनों अवस्था में सामन्तवादी और साम्राज्यवादी भी भारतीय ही हैं और इससे पीड़ित भी भारतीय ही है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनके सामान्य ऐतिहासिक युग बीत जाने पर भी इसे मिथकों और कहानियों के सहारे आज़ भी जीवन्त बनाए रखा गया है। अर्थात इनकी प्रसारित ऐतिहासिक वास्तविकता वह नहीं है, जिसे बताया जाता है। इसी मिथकीय कहानियों को ही इतिहास मानकर इतिहास के प्रोफेसर और विशेषज्ञ हवाई काल्पनिक युद्ध भी कर रहे हैं और उसे जीतने का स्वप्न भी देख रहे हैं, जो कभी इतिहास ही नहीं था। इसे फिर से और ध्यान से पढ़ा जाय

ज्ञात कभी अज्ञात को नहीं जान सकता। ज्ञात केवल उसी को जान सकता है, जिसे उसने सीखा है, संचित किया है और समझा है। अज्ञात को जानने के लिए हमें संदर्भ बदलना ही पड़ता है, पृष्ठभूमि बदलना पड़ता है, परिभाषा यानि अवधारणा बदलना पड़ता है और संरचनात्मक  ढांचा भी बदलना पड़ सकता है। ऐसा बदलना ही "पैरेडाईम शिफ्ट" (Paradigm Shift) कहलाता हैं। रिक्तता, शून्यता, मौन, और उत्सुकता ही सृजन का, निर्माण का और विकास का आधार होता है, इसके बिना सृजन संभव नहीं है। अतः किसी भी परम्परागत और सनातन समस्या का समाधान इसी विधि से किया जा सकता है, किसी भी ज्ञात के आधार पर शताब्दियों की परम्परागत समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है, जिसे अभी तक नहीं पाया गया है।

संस्कृति हमारे विचारों, आदर्शों, मूल्यों, प्रतिमानों, व्यवहारों, परम्पराओं को नियंत्रित, निर्देशित, नियमित, संचालित और प्रभावित करता रहता है। यह समय के साथ विकसित होता है और इसके साथ इतिहास भी होता है और मिथक कहानियां भी होती है। फिर यह संस्कृति धर्म के आवरण में आ जाती है या लाई जाती है, और तब यह पवित्र भी हो जाती है। जब इसमें धर्म आ गया, तो यह जड़ भी हो जाता है और फिर इस पर कोई प्रश्न या शंका करना उस स्थापित संस्कृति के ही विरुद्ध हो जाता है, माना जाता है। 

जब कोई भी चीज जड़ (Stagnant) हो जाता है, तब उसमें जडत्व (Inertia) आ जाता है और 'जडत्व की शक्ति' (Power of Inertia) उसे उसके वर्तमान की स्थिति में ही बनाए रखती है। यही जडत्व यानि जड़ता इसमें निरंतरता देती है। इसे ही सांस्कृतिक जड़ता (Cultural Inertia) कहते हैं। यही निरंतरता बनाए रखती है। इससे ही जडत्व में स्वत: स्फूर्तता आ जाती है। इस तरह सामन्तवाद और साम्राज्यवाद अपने सांस्कृतिक और फिर धार्मिक आवरण में क्रियाशील रहता है। यदि यह व्यक्ति, समाज, संस्कृति सकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक नहीं है, तो हमें उसे ऐसा यानि सकारात्मक, रचनात्मक और विकासात्मक बनाना है। यह सामान्य समाज में व्यापक 'सामाजिक पूंजी' और 'सांस्कृतिक पूंजी' का निर्माण नहीं होने देता।

एक मनुष्य या समाज को अपने समस्याओं के समाधान के लिए अनुक्रिया और प्रतिक्रिया की क्रियाविधि को समझना जरूरी होता है। यह सिर्फ़ अपने वातावरण और विविध प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम नहीं है, अपितु वह अनन्त प्रज्ञा से भी संबंधित कर आभास के रूप में भी समाधान प्राप्त करता है। वह वातावरण से अपने पांच शारीरिक इन्द्रियों के माध्यम से और "मन" की 'मानसिक दृष्टि' (vision) से ही अनुभूति प्राप्त करता है। वह अपने वातावरण को अपने इन्द्रियों से प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त कर सकता है, लेकिन अनन्त प्रज्ञा से जुड़ कर और उसे नियंत्रित करने के लिए उसे अतिरिक्त प्रयास करना होता है, जो एक कौशल है और इसे कोई भी विकसित कर सकता है। जब किसी का मन (Mind) यानि उसके 'आत्म' (Self) अनन्त प्रज्ञा से जुड़ता है, तो उसे ही आध्यात्म कहते हैं, और प्राप्त ज्ञान को 'आभास' (Intuition) कहा जाता है।

जीवन में विकास या उद्विकास के त्रिस्तरीय आयाम होता है, प्रथम शारिरिक, द्वितीय मानसिक और तृतीय आध्यात्मिक। शारीरिक विकास या उद्विकास सामान्यतः प्राकृतिक रूप में होता है और इसके लिए एक मानव को कम क्रियाशील रहना होता है। मानसिक विकास यानि  मानसिक उद्विकास एक कौशल है और उसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए उसे कौशल की तरह ही विकसित करना होता है, जिसे कोई भी विकसित कर सकता है। ज्ञान का उच्चतर अवस्था आध्यात्मिक होता है, या कहलाता है। किसी के आत्म को अनन्त प्रज्ञा से संबंधित होने को ही अध्यात्म कहा जाता है। इस तरह आध्यात्मिक विकास भी एक कौशल ही है, जो मानवता सहित प्रकृति के विकास के लिए सजगता से प्रयास किया जाता है। इसलिए हमें किसी के शारीरिक विकास से तुलनात्मक विश्लेषण नहीं करना चाहिए एवं निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, सिर्फ अपना मानसिक और आध्यात्मिक विकास करना चाहिए।

हमें संस्कृति से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और सामन्तवाद के प्रभाव को हटा देना चाहिए। इसके लिए इतिहास से मिथकीय कहानियों को हटाना होगा। इसके लिए पुख्ता प्रामाणिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को ही मान्यता देकर इतिहास को समझना होगा, बाकी सब कथामात्र है। वह सामन्तवाद की यानि मध्य युगीन ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण ऐतिहासिक प्रतिफल था। पुनर्जागरण के द्वारा यूरोप में इसके इन्हीं प्रभावों को समाप्त कर यूरोप में वास्तविक आधुनिक और वैज्ञानिक युग को लाना संभव किया। परन्तु पश्चिम मध्य एशिया, पूर्वी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में यह अभी भी मध्ययुगीन संस्कृति को यथावत बनाए हुए है। इस सनातन, पुरातन और गौरवशाली संस्कृति के आवरण में मौजूद सामन्तवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था को ध्वस्त किए जाने की आवश्यकता है। इसके बिना समाज और संस्कृति में वैज्ञानिक मानसिकता, आलोचनात्मक विश्लेषण एवं चिन्तन और विकासात्मक विचारधारा का समुचित विकास नहीं हो सकता है।

इसे ध्यान से पढ़ा जाय। किसी भी समाज, संस्कृति और इतिहास के पिछड़ेपन का मौलिक चरित्र और क्रियाविधि को समझा जाना अनिवार्य है। विरासत की निरंतरता होनी चाहिए, लेकिन मिथकीय कहानियों को इतिहास के रूप में निरंतरता नहीं होनी चाहिए। इतिहास ऐतिहासिक शक्तियों का ही परिणाम होता है। इसी में समाधान है। वैसे आज के आधुनिक, लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक युग में यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक सामन्तवाद दरकता हुआ है और नष्ट होता हुआ है, सिर्फ एक धक्के लगाने की आवश्यकता है।

आचार्य प्रवर निरंजन जी

 

भारतीय राष्ट्र की समस्याएँ और समाधान

‘भारतीय राष्ट्र’ (Nation) की अनेको समस्याएँ हैं| ध्यान रहे कि ‘भारतीय देश’ (Country) की या ‘भारतीय राज्य’ (State, not Province) की अनेकों सम...