रविवार, 25 अक्टूबर 2026

अंग्रेज क्यों चले गए?

अंग्रेज भारत आए और भारत से चले भी गए|  क्यों?  अंग्रेज अपने ‘धन’ से ‘धन’ कमाने के लिए भारत आए और अन्य देशों में भी गए| इनके धन की कमाई का रफ़्तार अभी भी जारी है, या बढ़ ही गयी वे  है| ऐसी स्थिति में उनके यहाँ रहने का कोई ‘तुक’ (Logic') नहीं था| इसीलिए अंग्रेज भारत से अपना उपनिवेश समाप्त कर चले गये| वे ‘धन’ कमाने भारत आए थे और अभी भी भारत से ‘धन’ कमा रहे हैं, इसीलिए उनका यहाँ रहने की कोई जरुरत नहीं थी और चले गये| ऐसी स्थिति में, एक समझदार को यहाँ रह कर परेशान होने की कोई जरुरत नहीं थी| इस क्रियाविधि को विस्तार से और तार्किक आधार पर समझते हैं|

आर्थिक इतिहास में ‘धन’ कमाने का स्वरुप समय और तकनीक के साथ बदलता गया| धन कमाने का आधुनिक युग में प्रारम्भिक स्वरुप ‘व्यापार’ (Trading) होता है| यह धन कमाने का सबसे आद्य स्वरुप होता है, जो सबसे सरल, साधारण, सहज और प्राकृतिक होता है| विज्ञान और तकनीक के साथ नए मशीनों, भाफ (Steam) और विद्युत की शक्ति, एवं अन्य वैज्ञानिक विधियों ने ‘धन कमाने की प्रक्रिया’ को गति दिया| फिर उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार में ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital) के रूप ‘निवेश’ कर ‘धन’ कमाने का सबसे सुरक्षित तरीके का ईजाद हो गया|

अब ‘धन’ कमाने के लिए किसी के भौतिकी उपस्थिति अनिवार्य नहीं रह गया| व्यापार के नए स्वरुप – “वित्तीय साम्राज्यवाद” (Financial Imperialism) के साथ अंग्रेज भी भारत सहित अपने सभी उपनेवेशों से चले गया| अंग्रेज उन देशों से भी चले गए, जहाँ स्वतन्त्रता के लिए कोई आन्दोलन भी नहीं हुआ, जैसे श्रीलंका और वर्मा (वर्तमान म्यांमार) से| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम उपनिवेशवादी देश ‘तथाकथित संप्रभुता’ के साथ साम्राज्यवादियों से भौतिक रुप में स्वतंत्र किए जाने लगे| इसकी संपुष्टि के लिए, एक अवलोकन आधुनिक विश्व इतिहास का किया जा सकता है|

एक बार आधुनिक आर्थिक इतिहास का अवलोकन किया जाना चाहिए| यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ ‘सामन्तवाद’ का क्रमबद्ध समापन शुरू होने लगा और उसी जमीन पर ‘पूँजीवाद’ का उद्विकास होने लगा| ‘सामन्तवाद’ का समापन और ‘पूँजीवाद’ का उद्विकास ‘सामन्तवाद’ के कोख से हुआ| सामन्तो को अपने धन में वृद्धि चाहिए था, जो परम्परागत रूप में जमीन के विस्तार से ही संभव था, ताकि भू –लगान के राजस्व संग्रहण की मात्रा को बढाया जा सके| लेकिन जमीन का ‘और अनन्त विस्तार’ करना सहज और व्यावहारिक नहीं रह गया था|

‘धन’ बढ़ाने का दूसरा व्यावहारिक, सहज, सरल और वैधानिक तरीका ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital) में बदलना होता है| ‘उत्पादक धन’ ही ‘’पूँजी’ कहलाता है| इस तरह से ‘पूँजीवाद’ का उत्पत्ति और उद्विकास पश्चिमी यूरोप में प्रारंभ हो गया| मध्य एशिया के राजनीतिक उथल पुथल और निरन्तर अनिश्चितता के कारण भारत सहित पूर्वी एशिया के साथ व्यापार करने के लिए सुविधाजनक और बाधारहित मार्ग की आवश्यकता थी| वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग की तलाश में समुद्री मार्ग एक सस्ता और बेहतर विकल्प था| यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ कई नयी वैज्ञानिक जानकारियाँ मानवता को उपलब्ध होती जा रही थी|

पश्चिम यूरोप के गर्म समुद्री जलधारा और विस्तृत समुद्री किनारा ने स्पेन और पुर्तगाल के उत्साही नाविकों को भारत और पूर्वी एशिया के लिए समुद्री मार्ग खोजने के लिए प्रेरित किया| वहां के शासको और सामन्तों के ‘धन –सहयोग’ के साथ इन उत्साही नाविकों ने समुद्री भ्रमण और व्यापारिक मार्ग तलाशने का कार्य शुरू किया| इस प्रयास ने दोनों अमेरिका एवं पश्चिम इंडीज सहित और आस्ट्रेलेशिया (अस्ट्रेलिया सहित अन्य द्वीप समूह) की खोज हो गयी| इसी के साथ भारत पहुचने का व्यापारिक मार्ग की जानकारी हुई| पश्चिम में कई व्यापारिक कम्पनियाँ बनी| ब्रिटेन की ‘इस्ट इंडिया कंपनी’ की स्थापना 31 दिसम्बर 1600 को हुई| यह भारत सहित पूर्वी  एशिया के देशों में व्यापार करने के लिए गठित हुई| व्यापार करना, यानि अपने ‘धन’ से ‘और धन’ कमाना हुआ|

मतलब इन कंपनियों का उद्देश्य अपने ‘धन’ से लाभ कमाना था| स्पष्ट है कि अंग्रेज अपने धन से लाभ कमाने के लिए आए थे| अंग्रेज अपने व्यापारिक उद्देश्य से पहली बार 1608 में सूरत आए| ये व्यापार करने की अनुमति के लिए 1615 में जहाँगीर के दरबार में पहुंचे| व्यापार में अपनी मजबूत पकड के लिए 1757 में प्लासी की लड़ाई लड़ी गयी| 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी कंपनी का शासन समाप्त कर ब्रिटिश सरकार का शासन प्रारंभ हो गया|

अपने शुरुआती काल में कम्पनी सिर्फ व्यापार तक सीमित रही, जिसमे कम्पनी की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य थी| यह ‘उपनिवेशवाद’ की शुरुआत थी| यह लाभ कमाने का प्राथमिक अवस्था था, जिसे ‘वणिक साम्राज्यवाद’ (Mercantile Imperialism) कहा गया| यूरोप में ओद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत हो चुकी थी| भारत में शासन भी कम्पनी से सरकार को हस्तगत हो चुका था| उद्योग के लिए कच्चा मॉल, इंधन के लिए कोयला और बाजार के ग्राहक चाहिए होता है, जो उपनिवेशों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था| अब ‘वणिक साम्राज्यवाद’ अपने नए स्वरुप ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ (Industrial Imperialism) में बदल गया| अब शासन इन्ही सुविधाओं को उपलब्ध करने के लिए कार्यरत हो गया| इन्ही सुविधाओं और एकाधिकार को पाने के लिए विश्व को दो दो विश्व युद्ध झेलना पडा| इस युद्ध में यूरोप पस्त हो चुका था|

अब साम्राज्यवाद का स्वरुप फिर बदल कर “वित्तीय साम्राज्यवाद” (Financial Imperialism) हो गया| अब ‘धन’ कमाने का तरीका अपने धन को ‘पूँजी बाजार’ में निवेश करना हो गया| यह तरीका आज भी जारी है| इसके लिए किसी उपनिवेश, या भौतिक उपस्थिति की अनिवार्यता नहीं रह गयी| इसके साथ ‘सूचना साम्राज्यवाद’ यानि ‘डाटा साम्राज्यवाद’ उदित हो गया, जिसकी जानकारी अभी भी बहुत कम लोगों को है| जब ‘धन’ कमाने के लिए किसी उपनिवेश, या भौतिक उपस्थिति की अनिवार्यता ही नहीं रह गयी, तो अंग्रेज चले गए| वैसे भी अब सम्प्रभुता का तेजी से ‘विखण्डनीकरण’ और ‘विलोपीकरण’ होता जा रहा है|

अब विश्व को ‘बाजारवाद’ (Marketism) चला रहा है, आप माने या नहीं माने| लेकिन विचार अवश्य कीजिएगा|  

   आचार्य प्रवर निरंजनजी                       

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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2 टिप्‍पणियां:

  1. संक्षिप्त लेकिन सटीक और नई व्याख्या

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  2. पीढ़ियों से मनुष्य अपनी जिजीविषा (Survival Instinct) से प्रेरित होकर विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में लगातार नयी नयी खोजें करते हुए अपनी आर्थिक परिस्थितियों को लगातार सुदृढ़ करने के प्रयास में लगा हुआ है। मानव शारीरिक और सांस्कृतिक उद्विकास के मूल में यह Survival Instinct ही मूल प्रेरणा शक्ति है। हमारे आधुनिक बाजार और उस बाजार की विभिन्न आर्थिक शक्तियां इसी मूल प्रेरणा शक्ति की उपज हैं। आचार्य प्रवर निरंजन जी ने इसी बात को एक नये दृष्टिकोण के साथ बड़े ही रोचक ढंग से संक्षेप में समझाया है।

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