रविवार, 22 मार्च 2026

अमेरिका 'दादागिरी' क्यों करता है?

आजकल फिर अमेरिका ‘दादागिरी’ कर रहा है| सवाल यह है कि अमेरिका ‘दादागिरी’ क्यों करता है? ‘दादागिरी’ करने के लिए क्या क्या गुण या क्या क्या क्षमताएँ होने चाहिए? क्या कोई भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या भारत भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या ‘दादागिरी’ भी सापेक्षिक होता है? तो ‘दादागिरी’ क्या है?

'दादागिरी' (Bullying) एक अनुचित प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें बलप्रयोग कर या धमकाकर किसी अन्य पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया जाता हैं। ‘दादागिरी’ सदैव अपने से छोटे और कमजोर देश या समाज पर दिखाया जाता है| लेकिन यह ‘कमजोर’ क्या होता है? क्या कोई ‘कमजोर’ या ‘शक्तिशाली’ सिर्फ संख्या के आधार पर हो सकता है, या शारीरिक ताकत के आधार पर, या अपने ‘बौद्धिक’ क्षमता के आधार पर होता है? तो ‘बौद्धिक’ क्षमता क्या होता है?

आधुनिक युग में कुछ वैश्विक ‘दादा’ हुए हैं, जिनके अध्ययन करने के पश्चात इस सम्बन्ध में कुछ सार्थक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं| आधुनिक युग में, सबसे पहले स्पेन और पुर्तगाल ‘दादा –देश’ हुए। उसके बाद इस कड़ी में कई यूरोपीय देश जुडते रहे। फिर ग्रेट ब्रिटेन (UK) एक ऐसा ‘दादा’ हुआ, जिसके साम्राज्य में कभी सूरज का अस्त नहीं होता था| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ‘विश्व व्यवस्था’ (World Order) में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का स्थान प्रथम हो गया| अर्थात अमेरिका ‘दादा’ बन गया| आज उसके लिए कोई वैश्विक नियम –कानून काम के नहीं है| वह जो चाहता है, कर लेता है या कर लेना चाहता है|

लेकिन ऐसा क्यों होता है? आधुनिक युग के सभी ‘दादाओं’ के अध्ययन के बाद इन सभी में एक समान प्रवृत्ति पाया जाता है। इन सभी ‘दादाओं’ में ‘बौद्धिक शक्ति’ सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस ‘बौद्धिक शक्ति’ का आधार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ होता है। इन सभी ‘बौद्धिक’ देशों या समाजों में ‘धर्म –सत्ता’ का महत्त्व गौण रहता है| ‘ज्ञान’ (Knowledge) ‘सूचनाओं’ का व्यवस्थित और संगठित स्वरुप होता है। ‘ज्ञान’ को निरपेक्ष माना जाता है| यह यथास्थिति में सब कुछ जानना है| इस ‘यथास्थित’ (निष्पक्ष) ‘ज्ञान’ का उपयोग या प्रयोग ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है। किसी भी ‘दादागिरी’ का आधार अवश्य ही ‘विज्ञान’ (Science) होता है|

‘विज्ञान’ का उपयोग कर किसी ‘समस्या’ का समाधान खोजना ही ‘इंजीनियरिंग’ (Engineering/ अभियंत्रण) होता है। ‘अभियंत्रण’ वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करके व्यावहारिक समस्याओं को हल करने की एक विधा है। किसी कार्य को सुव्यवस्थित, प्रभावी और जल्दी करने के लिए वैज्ञानिक एवं अभियंत्रण सिद्धांतों का व्यावहारिक समाधान 'तकनीक' कहलाता है। यदि किसी समस्या का समाधान करना ‘इंजीनियरिंग’ है, तो उस समाधान में मशीन, यन्त्र, औजार, उपकरण, उपस्कर, आदि बनाना एवं उपयोग करना ही तकनीक (Technology) है।

अर्थात शक्ति का स्रोत ‘विज्ञान’ (वैज्ञानिकता) से होता है, किसी दैवीय आस्था से नहीं| ‘विज्ञान’ में निरन्तर शोध एवं अनुसंधान से मौलिक नियमों एवं सिद्धांतों का परिमार्जन होना वहाँ की सामान्य संस्कृति बन जाती है| इसीलिए वहाँ नित आविष्कार होता रहता है| विज्ञान प्रकृति और भौतिक दुनिया के व्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त ज्ञान है। यह अवलोकन (Observation), प्रयोग (Experimentation) और जांच के माध्यम से तथ्यों को समझने की एक विधि है, जो सटीक परिणाम देती है। यह जिज्ञासा से शुरू होता है, अर्थात यह सवाल पूछने से शुरु होता है| ‘दैवीय आस्था’ विज्ञान –विरोधी होता है| ज्ञान की पुनः तलाश एक परम्परा बन जाती है।

इस तरह, ‘विज्ञान’ एक ‘विषय’ (Subject) ही नहीं है, यह  एक ‘क्रियाविधि’ (Method/ Methodology) भी है। सभी इंजीनियरिंग और तकनीक इसी विज्ञान पर आधारित है| जो समाज विज्ञान में मौलिक शोध एवं अनुसंधान करता रहता है, वही सभी क्षेत्रों में सबसे आगे रहता है| इसी आधार पर आज चीन, अमेरिका, जापान, रुस, जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन आगे हैं| आजकल यही देश एक दूसरे की दादागिरी को संतुलित कर रहे हैं, या संतुलित कर सकते हैं, बाकियों की कोई औकात नहीं है| वे सभी देश और समाज, जिनके लिए ‘विज्ञान’ के सापेक्ष ‘आस्था’ या ‘धर्म’ प्रमुख है, इन वैज्ञानिक शक्तियों के समक्ष सदैव नतमस्तक रहते हैं|

 ‘आस्था’ (Faith) का विषय किसी ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ पर आधारित नहीं होता है। यही ‘आस्था’ सभी धर्मों का आधार होता है| अर्थात सभी धार्मिक बातें आस्था की बात है, इनमे कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं होता है| अक्सर ‘आस्था’ का आधार ‘दैवीय’ होता है। यदि ऐसे धर्म में आस्था रखने वाले देशों का कुछ महत्त्व वैश्विक व्यवस्था में है, तो वह आधार उनके ‘उपभोग’ (Consume) करने की क्षमता (खाने एवं पचाने वाले पेटो की संख्या) होगी| इन आस्था के आधार पर मूर्खो पर दादागिरी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी बौद्धिक शक्ति के देशों या समाजों पर ‘दादागिरी’ नहीं दिखाई जा सकती| ध्यान रहे कि सभी आधुनिक हथियार आधुनिक ‘सूचना =तकनीक’ युग में उनके ‘उत्पादक’ देशों के नियंत्रण में सदैव रहती है| अर्थात कोई भी ख़रीदा गया हथियार उनके उत्पादक देशों के मर्जी के विरुद्ध प्रयोग नहीं किया जा सकता है| अर्थात कोई भी देश ख़रीदे गए हथियारों के भरोसे ‘दादागिरी’ नहीं कर सकता|

जिन बौद्धिक शक्तियों के पास ‘न्यायिक चरित्र’ (Judicious Character) होता है और उनमे यदि ‘अखंडता’ (Integrity) का चरित्र भी होता है, तो ऐसे सभी ‘बौद्धिक शक्तियाँ’ भविष्य के ‘दादा’ बन सकते हैं| ‘अखंडता’ का सिद्धांत वह होता है, जिनके बातों, नीतियों एवं व्यवहारों में समानता रहता है| अमेरिका इस सिद्धान्त पर विश्वसनीय नहीं माना जाता है| चीन विज्ञान एवं तकनीक के साथ साथ अपने ‘न्यायिक चरित्र’ और अपनी ‘अखंडता’ के नीतियों के कारण निकट -भविष्य में विश्व के व्यवस्था में ‘प्रथम’ स्थान पर आ रहा है| चीन की इसी उभरती अवस्था के कारण अमेरिका अब बौखलाया हुआ है, जिसकी परिणति आज विश्व में दिख रहा है|

यदि आपको भी ‘दादा’ बनना है, तो अपनी बौद्धिकता बढाइए| बौद्धिकता बढ़ाने के लिए अपने ‘वैश्विक दृष्टिकोण’ में विज्ञान और वैज्ञानिक विधियों का उपयोग कीजिए| कोई और विकल्प कारगर नहीं है| आधुनिक युग में, कोई दैवीय या धार्मिक सत्ता किसी को ‘दादा’ नहीं बना सकता है| यदि किसी को  दैवीय या धार्मिक सत्ता स्थापित करना है, तो अपने विरोधियों की बौद्धिकता को कमतर कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 14 मार्च 2026

भारत का दुर्भाग्य ‘मरोड़े’ गए इतिहास -दर्शन में है

आप सही पढ़ रहे हैं, ‘भारत का दुर्भाग्य’ (Misfortune of India) ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शन’ (Philosophy Ancient of Indian History) के मरोड़े जाने” (Twist/ Wrench) में फँसा’ (Entrapped/ Got Stuck) हुआ है| भारत का दुर्भाग्य यानि भारतीय लोगों का दुर्भाग्य, एक सत्य है| यह एक गंभीर विषय है|

दर्शन’ (Philosophy) किसी बात, विषय, या नीति का मूल सार’ (Essence/ Gist) होता है| कोई विषय पहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित एक मूल सारके इर्द गर्द चक्कर लगाता रहता है| यह मूल सारपहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित उद्देश्य” (Goal) को पाने के लिए होता है| किसी विषय के सारया उद्देश्यको जानना दर्शनका मूल विषय होता है| इसे समझने की जरुरत है, जो भारत को आजतक दयनीय अवस्था में जकड़े हुए है|

भारत की यह दयनीय अवस्था’ ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शनको मरोड़े जानेसे निर्मित हुआ है| इसीलिए यहाँ भारतीय इतिहास के दर्शन के सार’, यानि  भारतीय इतिहास के दर्शन के मूल भावका आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक समीक्षा करना है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि किसी संस्कृति का आधार उसका प्राचीन इतिहास होता है| स्पष्ट है कि मध्भा काल में जब प्राचीन भारतीय इतिहास को सम्पादित किया जा रहा था, तब भारतीय संस्कृति को ही मरोड़ दिया गया है। और इस सम्पादित इतिहास को ही आज प्राचीन एवं सत्य बताया जा रहा है| भारत का भविष्य इसे सुधारने से ही सुधर सकता है| बाकी सब प्रयास महज एक तमाशा है, दिखावा है, जो चलता आ रहा है|

इतिहास’ ‘दर्शन का गतिशील रुपहोता है| एक इतिहासकार को इतिहास लेखन में अपनी अंतर्दृष्टि (Intuition) का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों का प्राकृतिक उद्विकास की अवधारणा के अनुरूप तार्किक व्याख्या कर वर्तमान की समस्यायों का समाधान दे सके| इसलिए ‘इतिहासएक सक्रिय दर्शनहै| इस तरह, ‘दर्शन’ ऐतिहासिक चेतना के उद्विकास का स्वरुप है| ‘इतिहास’ अतीत का विज्ञान होता है, क्योंकि यह वैज्ञानिक विधियों के अनुरुप तार्किक, तथ्यात्मक और विवेकशील प्रस्तुति होता है| इतिहास भी विज्ञान की तरह वर्तमान की समस्यायों का समाधान देता हुआ भविष्य पर निगाहें रखता है|

इतिहास को किसी दैवीय या अतार्किकता के आधार पर व्याख्यापित नहीं किया जा सकता| दैवीय या अतार्किकता ही इतिहास को मिथक में मिला देता है| इतिहास वर्तमान और भविष्य को ‘और सुधार’ करने के उद्देश्य से अतीत और वर्तमान का संवाद होता हैइतिहास के तथ्य तो अतीत के होते हैं लेकिन इतिहासकार वर्तमान का होता है| ये ऐतिहासिक तथ्य भी वही बोलते हैं, जो उन तथ्यों के माध्यम वह इतिहासकार बोलवाना चाहता है| इसलिए ‘इतिहास सापेक्षिक होता है, जो हर काल एवं परिस्थिति के अनुसार गतिशील रहता है||  

इतिहास हमें अपनी जड़ो तक पहुचाता है, जिसे हम लोकप्रिय शब्दावली में संस्कृति का मूल स्रोतकहते हैं| यही संस्कृति यानि हमारे इतिहास बोध’ (Perception of History) ही हमारे संस्कारको निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता हैं ये संस्कार, संस्कृति और हमारे इतिहास बोधही हमारी मानसिकता और हमारा विश्वदृष्टिकोण को निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता रहता है| ‘इतिहास का उद्देश्य मानव की मुक्तिको सुनिश्चित कराना होता है’| इसी ‘मानव की मुक्ति’ को अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन  'विकास' (Development as Freedom) कहते हैंस्पष्ट है कि किसी भी इतिहास के दर्शनके मूल में न्याय’, ‘समता’, ‘स्वतंत्रताऔर बंधुत्वअवश्य रहना चाहिए, जो विश्व को शांतिमय, सुखमय एवं विकाशशील माहौल दे सके| प्राचीन भारतीय इतिहास को मरोड़ कर इन्ही तत्वों की ह्त्या कर दिया गया है| यदि किसी इतिहास का दर्शन अभी भी मानवीयता का सन्देश नहीं दे रहा है, तो वह इतिहास के नाम पर साजिश है, धोखा है, षड़यंत्र है|

भारत के प्राचीन काल का लगभग समस्त इतिहास, जो आज उपलब्ध है, वह सक्ष्यात्मक रुप से कागज पर ही लिखित रहा है| अर्थात ऐसा लिखित इतिहास कागज के चीन में आविष्कार होने और अरब क्षेत्र के माध्यम भारत आने और भारत में इसके प्रयोग के प्रचलित होने के बाद का है| यह काल भारत में दसवी शताब्दी के बाद का होता है| इसके पहले भारत का इतिहास ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, और ख़ास पत्तों पर लिखित रहा है| इसके अतिरिक्त ये विवरण पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर लिखित हुए| ये विवरण इतिहास के नव सम्पादन के बाद सुनियोजित तरीके से तत्कालीन इतिहासकारों के वर्ग, जो शासक वर्ग होता है, ने नष्ट कर दिया|

स्पष्ट है कि जो इतिहास मध्य काल में लिखा जा रहा था, वह मध्य काल का समकालीन इतिहास रहा| उस समय प्राचीन भारत का जो इतिहास लिखा गया, या संपादित किया गया, उसे तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरुप इस काल में पूरा मरोड़ दिया गया| तत्कालीन सामन्तवादी आवश्यकताओं के अनुरुप सामग्रियों को प्राचीन काल के इतिहास में समाहित एवं समायोजित कर दिया गया| तब इन सामन्तवादी आवश्यकताओं को प्राचीन इतिहास की सामग्री की तरह स्थापित कर दिया गया| तब यही संपादित एवं संशोधित इतिहास हमारी सांस्कृतिक जड़े हो गयी| यह आज भी मजबूती से जमी हुई है| इसिहास का मध्य काल वैश्विक सामन्तवाद का काल रहा, और इसीलिए उस काल में सम्पादित सभी इतिहास समकालीन सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूलन एवं समायोजन का पर्याय रहा|,  यही समकालीन इतिहासहो गया|

इतिहास का कोई भी तथ्य एवं सत्य श्रवण एवं वाचन’ (Listening n Speaking) के माध्यम से कई पीढ़ियों के लोगों से गुजर जाने के बाद भी वही तथ्य एवं सत्य बना रहेगा, ऐसा आधुनिक मनोविज्ञान के सन्दर्भ में उचित नहीं माना जा सकता| श्रोता और वाचक भी हर स्तर पर अपनी समझ के अनुसार उन तथ्यों को संपादित करता रहा| हुआ यह है कि प्राचीन भारत का इतिहास, जो ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, एवं ख़ास पत्तों और पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर उपलब्ध था, उन्हें नए स्वरुप एवं नयी भाषा में तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप सम्पादित कर दिया गया| इन नए स्वरुपों में सम्पादन के बाद इन सामग्रियों को यथासम्भव नष्ट कर दिया गया|

मध्य युग वैश्विक सामन्तवादी युग था, तो उनके अनुकूल प्राचीन इतिहास के दर्शन को ध्यान में रख कर तत्कालीन नए इतिहास के स्वरुप को तैयार किया गया| लेकिन वह सम्पादित इतिहास आज भी वर्तमान युग में मौजूद है| अब हमारे प्राचीन काल के इतिहास को वर्तमान वैश्विक आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है| यही व्याख्या भारत को दुर्भाग्य से बाहर निकलेगा, बाकी सब प्रयास मौलिक नहीं है|

वर्तमान भारत के बहुसंख्यक या लगभग सभी इतिहासकार संस्कृति या इतिहास के वर्चस्ववादको नहीं समझते होते हैं| ये सभी इतिहासकार, चाहे वे अपने को प्रगतिशीलकहें या इतिहास का संशोधककहें, इसी ऐतिहासिक वर्चस्ववादयानि सांस्कृतिक वर्चस्ववादके चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं| ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony) एक ऐसी अवधारणा है, जिसे अलग से, गहनता से और विस्तार से समझे जाने की आवश्यकता है| इसे समझे बिना भारत कभी वैश्विक नेतृत्व नहीं दे सकता है, कोई भी चाहे जो प्रयास कर ले| आज प्राचीन भारत का जो इतिहास उपलब्ध है और हमारी महान संस्कृति का मूल आधार है, वह मध्य काल में सामन्ती आवश्यकताओं के अनुरुप संपादित है| इस प्राचीन काल के इतिहास दर्शन को मरोड़दिया गया, जो भारत में संस्कृति को भ्रमात्मक बना देता है|

इतिहास कोई स्थिर सत्य नहीं होता है, बल्कि इसे शासक वर्ग अपनी आवश्यकता अनुसार बदलता रहता है’| शासक वर्ग, जिसे ‘राजनीतिक समाज’ भी कहा जाता है, इतिहास को नियंत्रित कर वह वर्तमान एवं भविष्य को नियंत्रित रखता है’| इसीलिए सत्ता वर्ग इतिहास को बदल कर वर्तमान संस्कार और संस्कृति को अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप बनाता  रहता है| इसीलिए प्रत्येक इतिहास’ ‘समकालीन इतिहास’ (Contemporary History) हो जाता है’| इसका अर्थ यह हुआ कि  इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं होता है, बल्कि इसका वर्तमान की आवश्यकतायों के अनुसार पुनर्सृजन होता हैइसी कारण इतिहास को शासक वर्ग के हितों के अनुरुप बदलना पड़ता है| इतिहास वर्तमान के दृष्टिकोण से अतीत का मूल्याङ्कन करता है’| इसीलिए ‘आप वर्तमान इतिहास को अस्वीकृत कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अन्तिम इतिहासनहीं लिख सकते हैं’| यह इतिहास भविष्य में बदलता रहेगा| आज भी अपने प्राचीन इतिहास को तार्किक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक बनाने की आवश्यकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

रविवार, 8 मार्च 2026

क्या धन –प्रदर्शन मानवीय स्वभाव है?

एक छोटी –सी बौद्धिक बैठक हो रही थी| इसमें समाज के कई विधाओं के जानकार एवं विशेषज्ञ शामिल थे| मुद्दा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के प्रदर्शन था| प्रश्न यंह है कि सभी लोग बुद्धिमत्ता यानि समझदारी के किसी न किसी स्तर पर होने के बावजूद खर्च क्यों कर रहे हैं? वैसे यह कहा जा सकता है कि बुद्धिमत्ता यानि समझदारी के समान स्तर के  बावजूद इसके कई स्वरूप और गुणवत्ता हो सकते हैं। आप भी कह सकते हैं कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ नहीं होकर, यह ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन का विषय था| हालाँकि यहाँ  “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा” का शब्द –समूह एक सापेक्षिक दार्शनिक भाव के साथ अर्थ देता हुआ है| यहाँ भी सापेक्षिता के कारण इसका स्पष्ट अर्थ नहीं दिया जा सकता है| लेकिन इसी बिन्दु पर हमलोग का ठहर जाना भी बौद्धिकता नहीं हो सकता, इसलिए बात बढ़ाना आवश्यक है|

सासाराम के राहुल जी ने बौद्धिक –मंडली से आगे प्रश्न किया कि क्या सामाजिक सांस्कृतिक अवसरों पर खर्च को नियंत्रित या कम किया जा सकता है? इनका सवाल आप से भी है, विचार कीजिएगा|

इनके सवाल का उत्तर देने लिए दमोह. मध्यप्रदेश के आचार्य रज्जन जी आगे आए| आचार्य रज्जन जी ज्योतिष विज्ञान में परा –स्नातक (एम० ए०) हो कर ‘वास्तु –विज्ञान’ में अपना पीएच० डी० जमा कर चुके हैं और मध्य प्रदेश के लोकप्रिय एवं विद्वान् संस्कारक एवं पुरोहित के रुप में सर्व ज्ञात हैं| ये विदेशों में अपने यजमानों के लिए ‘आन लाइन पूजा एवं संस्कार’ करने के लिए अनुभवी एवं प्रतिष्टित हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि वे इस क्षेत्र में काफी अनुभवी हैं| और इनके अनुभव जानना बहुत महत्वपूर्ण था| ये बता रहे थे कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंचों से ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ के सख्त विरोधी भी अपने पारिवारिक मामलों में ऐसा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं, औए अपनी ही आदर्शों के विरोध करते हुए दिखते हैं| इसीलिए इनका  मानना है कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ एक “मानवीय स्वाभाव” है|

उत्तर प्रदेश के आम्बेडकरनगर जनपद के प्रोफसर चौधरी जी भी आचार्य रज्जन की ही बातों से सहमति जताते हुए बातों को आगे बढाया| चौधरी सर मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं| इन्होने प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक प्रो० अब्राहम मैसलो के ‘आवश्यकता का पदानुक्रमण सिद्धांत’ के “सम्मान की आवश्यकता” (Esteem Needs) को उधृत करते हुए बताया कि यह सामाजिक सम्मान पाना एक मानवीय स्वभाव है| उन्होंने इसे कई उदाहरणों से समझाया| इन बौद्धिक वार्ता से मैं भी लाभान्वित हुआ| स्पष्ट हुआ कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक मानवीय स्वभाव है|

लेकिन यहाँ यह सवाल उठ रहा है कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक ‘मानवीय स्वभाव’ है?, या धन का अत्यधिक प्रदर्शन करना ‘सामाजिक स्वाभाव’ है? वैसे, उपरोक्त दोनों स्वभावों को ‘मानवीय स्वभाव’ या ‘मानवीय “सहज” (Instinct) स्वाभाव’ मान लेना जल्दीबाजी कहा जाना चाहिए| उपरोक्त दोनों बातें एक समान नहीं है| वैसे ई० राहुल जी का सवाल ऐसे अवसरों पर धन के अनुत्पादक खर्चो के प्रदर्शन को कम करने के बारे में हैं| इसलिए ऐसे गंभीर सवाल का एक सम्यक अकादमिक विश्लेषण होना ही चाहिए|

ऐसे सवालों का सम्यक उत्तर ‘सिर्फ’ एक अनुभवी, या मनोवैज्ञानिक, या सामाजिक, या आर्थिक, या एक राजनीति का अध्येता पर्याप्त तरीके से नहीं दे सकता है, ऐसा मुझे लग रहा है| ‘मानव विज्ञान’ (Anthropology) मानव का सरल एवं साधारण समाजों का अध्ययन कर मानव का ‘सहज एवं स्वाभाविक’ (Basic Instinct and Natural) प्रवृतियों एवं उनकी क्रियाविधियों की पहचान करता है| क्या सभी वैश्विक सरल एवं साधारण समाजों में ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन होता है? कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे अवसरों पर “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानवीय सहज प्रवृति नहीं है|

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर समाज में नए ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं’ (Institution, not Institute) के निर्माण या पुनर्गठन का अवसर होता है| इन संस्थाओं का गठन मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण है कि ये संस्थाएँ ही एक पशु – होमो सेपियंस को एक ‘सांसारिक मानव’ (होमो सोसिअस) बना दिया| ‘विवाह’ एक संस्था का निर्माण है और घर के बुजुर्ग के मरणोपरांत उत्तराधिकार मिलने की प्रक्रिया संस्था एक पुनर्गठन है| ‘यौन व्यवहार’ पशु भी करते हैं, लेकिन वे झुण्ड बनाते हैं, ‘समाज’ नामक संस्था का निर्माण नहीं करते हैं| मानव अपने ‘यौन व्यवहार’ को ‘विवाह’ नामक संस्था के साथ लाता है, और इसी के साथ वह संसार बना पाता है, जो एक पशु नहीं कर पाता है| इसलिए एक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था का निर्माण या पुनर्गठन पारिवारिक एवं सामाजिक सदस्यों की उपस्थिति (या सामाजिक गवाही) में सम्पन्न होता है| संस्था का निर्माण या पुनर्गठन एक सामाजिक सांस्कृतिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का घोषणा का अवसर होता है| समस्या मानव विशेष के सोच में हैं, और समस्या- लेबल सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण को दिया जाता है| इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है|

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्फेड एडलर अपने ‘व्यक्तित्व सिद्धान्त’ में बताते हैं कि मानव जन्म से ही ‘हीनता का बोध’ रखता है और इसीलिए वह ‘श्रेष्टता’ दिखाना चाहता है| ‘श्रेष्ट’ दिखना मूल प्रवृति हो सकती है, या है, लेकिन सिर्फ धन के प्रदर्शन के द्वारा ही ‘श्रेष्ट’ दिखना एक अलग बात है| यह श्रेष्टता का प्रदर्शन ‘धन’ के अतिरिक्त कई ‘और’ स्वरुपों में हो सकता है, जिस पर भी विद्वानों का ध्यान जाना चाहिए| ‘धन का प्रदर्शन’ करना सबसे से सस्ता, सरल और साधारण उपलब्ध तरीका होता है| लेकिन यह व्याख्या भी ई० राहुल को पर्याप्त संतुष्टि नहीं दे पाया|

लेकिन प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग बताते हैं कि एक मानव का व्यक्तित्व उसके ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective UnConsciousness) से निर्धारित एवं नियमित होता है| यह ‘सामूहिक अचेतन’ उस समाज के अचेतन का सामूहिक समझदारी है, जिसे सामान्य भाषा में उसकी ‘संस्कृति’ कहते हैं| यहाँ यह स्पष्ट किया जा रहा है कि सारी बात समाज तय करता है, मानव स्वयं में बहुत कुछ या सब कुछ नहीं है, बल्कि समाज बहुत कुछ है| समाज ही व्यक्ति का कार्य प्रतिरुप यानि पैटर्न (Pattern) तय करता है| जब बात संस्कार और संस्कृति की आती है, तब एक संस्कारक एवं पुरोहित की भूमिका लाल रंगों से रेखांकित हो जाती है|

अत: सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानव का स्वाभाविक गुण नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिरूप का मांग या दबाब है| इस अन्तर से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि समाज चाहे तो विशेष एवं सजग प्रयास कर इसे बदल सकता है, या इसे दूर कर सकता है| चूँकि सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में और उसके प्रतिरुपों में एक ‘जड़ता’ (Inertia) होता है और इसीलिए वह अपनी यथावस्था की अवस्था बनाए रखना चाहती है, जिसे बदलने के लिए एक विशेष, समर्पित और सजग प्रयास चाहता है| इस सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘जड़ता’ को एक संस्कारक और पुरोहित ही हटा कर समाज और संस्कृति को गतिशील बना सकता है,

इसलिए संस्कारक और पुरोहित बनिए|

नजरिया बदलिए और सब कुछ बदलेगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

बुधवार, 4 मार्च 2026

प्रो० अमर्त्य सेन क्या नहीं समझ पाए?

आजकल मैं एक किताब लिख रहा हूँ, जिसका शीर्षक है – “750 करोड़ लोगो का विकास कैसे हो”| इसमें वैश्विक मानवता से सम्बन्धित एक बड़ा सवाल उभरता है कि विश्व की कुल आबादी 800 करोड़ मे से कोई 750 करोड़ लोग अपेक्षित विकास के लिए अभी भी आस लगाये हुए हैं? इसका एक स्पष्ट अर्थ यह है कि विश्व में अभी तक कोई भी अर्थशास्त्री इन 750 करोड़ लोगों के सम्यक एवं समुचित विकास का समाधान नहीं दे पाया हैं| ऐसी स्थिति में, यह कहा जा सकता है कि विकास के सम्बन्ध में विश्व में अभी तक उपलब्ध सभी सिद्धांत, माडल, अवधारणा और क्रियाविधि व्यावहारिक और सफल नहीं है|

यदि इन लोगों ने अभी तक अपेक्षित ‘न्यूनतम विकास’ (Minimum Development) नहीं किया है, तो प्रश्न यह भी है कि यह तथाकथित ‘न्यूनतम विकास’ क्या होता है? ‘न्यूनतम विकास’ उस व्यवस्था या फिज़ा (माहौल) का परिणाम होता है, जिसके कारण कोई व्यक्तित्व अपने महत्तम अभिव्यक्ति के साथ मानवता को योगदान दे सकता है| ‘न्यूनतम विकास’ की अवस्था में व्यवस्था या फिज़ाओं द्वारा वे सभी ‘आधारभूत संरचनाएँ’, ‘प्रेरणाएँ’ एवं ‘सुविधाएँ’ सामान्य लोगों को उपलब्ध करायी जाती है, जिससे ‘वास्तविक विकास’ उत्पन्न और विकसित होता है| ‘प्रेरणाओं’ में ‘Motivation’, ‘Inspiration’ एवं ‘Nudge’ (लेखक - रिचर्ड थेलर) को शामिल माना जाना चाहिए|

प्रोफ़० अमर्त्य सेन को कल्याणकारी अर्थशास्त्र में योगदान देने के लिए वर्ष 1998 में नोबेल पुरस्कार दिया गया| प्रो० सेन ने ‘विकास’ को ‘स्वतन्त्रता’ के रुप में परिभाषित किया है। प्रो० अमर्त्य सेन विकास की अवधारणा को पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों के जंजाल से निकाल कर ‘स्वतन्त्रता’ के नए क्षितिज की ओर ले गये हैं| वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्रति व्यक्ति आय और प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय आदि जैसे आर्थिक सूचकांक आदि और उसके नागरिकों को मिलने वाली ‘असली स्वतन्त्रता’ अर्थात ‘विकास’ के बीच कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।

‘विकास’ व्यवस्था का वह अवस्था है, जो अपने लोगों को अपनी पसन्द के कार्य करने की ‘वास्तविक स्वतन्त्रता’ देता है| ‘विकास’ की अवधारणा ‘स्वतन्त्रता के रुप में’ एक ऐसा सूत्र –वाक्य है, जो ‘विकास’ को एक साथ राजनीतिक, अर्थशास्त्रीय, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, समाज शास्त्रीय, ऐतिहासिक आदि अध्ययन एवं व्यवस्था की बहु –विषयक समझ से जोड़ता है। प्रो० सेन ने ‘विकास’ को मानव के ‘सक्षमता उपागम’ (Capability Approach) से जोड़ा और इसके लिए लोगों की योग्यता और कौशल के उन्नयन को प्रमुख माना|

प्रो० सेन समाजों के विकास के लिए ‘सांस्कृतिक स्वतन्त्रता’ को आवश्यक मानते है| ‘सांस्कृतिक स्वतन्त्रता’ को मौलिक मानवाधिकार माना गया है| सभी लोगों को अपनी प्रजातीय, भाषाई और धार्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार महत्वपूर्ण माना है| इन पहचानों को पहचान देने और उनकी रक्षा करने वाली नीतियों को अपनाना ही अलग-अलग तरह के समाजों में विकास का एकमात्र टिकाऊ तरीका मानते है। आर्थिक वैश्वीकरण तब तक कामयाब नहीं हो सकता, जब तक ‘सांस्कृतिक स्वतन्त्रता’ का सम्मान और सुरक्षा न की जाए, और सांस्कृतिक विविधता  को स्वीकार्य नहीं कर लिया जाता है|  ऐसा प्रो० सेन का मानना है|

प्रो० सेन ‘विकास’ और ‘मानव विकास सूचकांक’ (HDI) की वैज्ञानिक अवधारणा देने के लिए बधाई के पात्र हैं| प्रो० सेन ‘संस्कृति’ और ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा का प्रयोग किया है, लेकिन इसके लिए उनके शाब्दिक प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि वे इन पारम्परिक अवधारणाओं को मूल रूप में नहीं समझ पाए हैं| यह ‘संस्कृति’ और उसकी ‘गत्यात्मकता’ (Dynamism) की अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है कि विश्व में यदि कहीं विकास गतिमान है, तो इसी समझ के कारण है; और यदि कहीं विकास घसीट रहा है या सरकने का प्रयास कर रहा है, इसी नासमझी के कारण है| दरअसल ‘संस्कृति’ किसी समाज के ‘इतिहास –बोध’ से निर्मित होता है और इससे सम्बन्धित विद्वान् ही जाने –अनजाने में गलती कर रहे हैं|

अविकसित एवं विकासशील देशों के ‘प्रभावशाली एवं यथास्थितिवादी वर्ग –समूह’ ने ‘संस्कृति’ और ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा कर दुरूपयोग कर ही उन समाजों के विकास को बाधित किया है| ऐसे ‘प्रभावशाली एवं यथास्थितिवादी वर्ग –समूह’ को क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी ‘राजनीतिक समाज’ (Political Society) कहते हैं| ‘राजनीतिक समाज’ ही अपना ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Cultural Hegemony) अपने देश के ‘नागरिक समाज’ (Civil Society) पर स्थापित करता है| ‘संस्कृति’ में ‘जड़ता की क्षमता’ (Power of Inertia) बहुत ज्यादा होती है| इस ‘जड़ता की क्षमता’ का सकारात्मक और नकारात्मक उपयोग सुलभ होता है, लेकिन इसका उपयोग या दुरूपयोग उसके ‘कर्ता’ (Agent) पर निर्भर करता है|

दरअसल ‘संस्कृति’ शब्द की यात्रा ‘संस्कार’ शब्द से प्रारम्भ होता है| शब्द ‘संस्कार’ समाज के ‘संस्मरण’ को ‘आकार’ (Shape) देना है| इन्ही ‘संस्कारों’ के समुच्चय को ‘संस्कृति’ कहते हैं| समाज के इन्ही ‘संस्मरणों’ को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective UnConsciousness) कहते हैं| यह ‘संस्कृति’ ही ‘व्यवस्था का फिज़ा’ होता है, जो उस समाज या क्षेत्र के फिज़ाओं में तैरता रहता है| यह संस्कृति ही व्यवस्था का ‘फिज़ावेयर’ होता है| किसी व्यवस्था का आधारभूत भौतिक संरचना उस व्यवस्था का ‘हार्डवेयर’ कहलाता है और उस व्यवस्था को संचालित करने वाला अदृश्य तंत्र, जैसे कानून, शिक्षा, धर्म, मीडिया आदि ‘साफ्टवेयर’ कहलाता है| इन अर्थशास्त्रियों का ध्यान व्यवस्था के ‘फिज़ावेयर’, यानि ‘संस्कृति’ के इस स्वरुप पर नहीं गया है| ये विद्वान् व्यवस्था के इन ‘फिज़ावेयर’, यानि ‘संस्कृति’ की अभिव्यक्ति को, जैसे कला, पेन्टिंग, भवन, मूर्तियों, परम्पराओं, रीति –रिवाज आदि को ही ‘’संस्कृति’ समझ लेते हैं| इसी नासमझी के कारण प्रो० अमर्त्य सेन भी विकास के व्यवहारिक समाधान से चूक गए हैं|    

इस ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ के नाम पर विश्व के अधिकतर देशों में ‘सामन्ती काल में विकसित या विरूपित संस्कृति’ को उस समाज और क्षेत्र की मौलिक संस्कृति बता कर वैश्विक विकास को बाधित किया गया है| एक अर्थशास्त्री होने के कारण अमर्त्य सेन भी ‘संस्कृति’ और ‘सांस्कृतिक गत्यात्मकता’ समझ नहीं पाए हैं| ‘संस्कृति’ को सम्मानजनक बता कर और इसकी ‘सांस्कृतिक जड़ता’ का दुरूपयोग कर ही वैश्विक विकास को बाधित किया हुआ है| ऐसे लोगों को ‘संस्कृति’ की ‘गत्यात्मकता’ की समझ नहीं है|

विकास की अवधारणा के लिए एक 'नवाचारी संस्कृति’ की ज़रूरत होती है| 'नवाचारी संस्कृति’ वैज्ञानिक मानसिकता, ‘बाक्स से बाहर चिंतन’, तार्किक सोच और विवेकपूर्ण निर्णय से आती है| चूँकि किसी संस्कृति का आकार उस समाज के ‘इतिहास की समझ’ से स्वरुप लेता है, इसलिए विकास के लिए ‘इतिहास –दर्शन’ (Historiography) को भी समझना अनिवार्य है| इसके बिना कोई ‘विकास का नाटक’ तो कर सकता है, लेकिन अपेक्षित विकास नहीं कर सकता है| प्रो० अमर्त्य सेन यही नहीं समझ पाए और विकास अभी भी सरकने का प्रयास कर रहा है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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