“बौद्धिकों के चोंचले” एक व्यंग्यात्मक एवं
आलोचनात्मक मुहावरा तो है, लेकिन कुछ लोगों के लिए सबसे
उपयुक्त भी है। चोंचले शब्द उनके दिखावटी, आडंबरपूर्ण या
आत्ममुग्ध व्यवहार के लिए है, जो कुछ लोग अपनी बौद्धिकता को
दिखाने के लिए करते हैं। लेकिन ऐसी बौद्धिकता का जमीनी सच्चाई, व्यवहारिक समाधान या सामाजिक उपयोगिता से बहुत कम संबंध होता है, या नहीं होता है। ऐसे लोग अपनी कुछ रटे हुए पुस्तकों पर या अधिकतर पुरातन
स्थापित विचारों एवं आदर्शों की दृढ़ता पर आधारित होते हैं। ऐसे चोंचलों का बदलते
वैश्विक सन्दर्भ एवं सबंधित अन्य विषयों का अद्यतन आधुनिक विज्ञान से कोई संबंध
नहीं होता।
ऐसे
चोंचले अद्यतन एवं जटिल लगने वाले मानवीय मनोविज्ञान सम्बन्धित विषयों पर ध्यान नहीं
देते होते है| वे इस दिशा में कभी चिन्तन के लिए उत्सुक भी नहीं होते| ऐसे लोग
आत्म मुघ होते हैं और असहमति दिखाने वालों को सदैव मूर्ख होने का मौखिक प्रमाण
पत्र बाँटते होते हैं| ऐसे ‘जकड़े’ हुए और ‘जड़’ बौद्धिक व्यक्तिगत मनोविज्ञान एवं
सामाजिक मनोविज्ञान की जटिल प्रक्रियायों के समझ के अभाव में मानव जीवन में बदलाव
की भूमिकाओं को नहीं समझते होते हैं| इन चोंचलो के द्वारा कही गई बातों पर जब
तथ्यात्मक संकट दिखाई देता है या इनकी तार्किक असंगतता स्पष्ट हो जाती हैं,
तब ऐसे चोंचले अपनी प्रतिक्रियायों में सामाजिक मूल्यों की सीमाओं
को ध्वस्त कर देता है| ऐसे ‘तड़पते हुए चोंचले’ अपने विरोधी पक्ष के व्यक्तिगत
बातों पर उतर जाता है, उनकी पत्नी और बच्चों पर व्यक्तिगत
टिप्पणी देंगे, मानो वे न्यायाधीश है। इन ‘तड़पते हुए चोंचलों’ की तब बेचैनी बहुत बढ़
जाती है|
वे
अक्सर बुद्ध, नानक, कबीर,
आम्बेडकर आदि के नाम ले कर ऐसे अड़ते हैं, मानों
उन महान व्यक्तियों ने उन्हें अपने पास बैठाकर उन्हें लिखवा दिया था। ये बौद्धिकता
के चोंचले उनके प्रामाणिक वक्ता बनते हुए होते हैं। ऐसे चोंचले उन स्थापित
विद्वानों को मात्र ढाल बनाते हैं, जबकि उन चोचलों की बातों का इन संदर्भित
विद्वानों की बातों और उनके सन्दर्भों से कोई लेना –देना नहीं होता है|
कुछ
तो ऐसे चोंचले मिलते हैं, जो यह भी कहते मिलेंगे ऐसा किस पालि ग्रंथों में लिखा
है? ऐसे चोंचले दुनिया की हर बात को पालि से ही जोड़ते होते हैं| ऐसे चोंचले एक ‘अनुवादक’
होने के कारण अपने को सर्वज्ञाता समझते हैं| ऐसे चोंचले ‘अनुवादक’ होना और ‘इतिहासकार’
होना एक समझते हैं, जबकि यह दोनों एक –दुसरे से सम्बन्धित होते हुए भी अलग अलग क्षेत्र
होता है|
ऐसे
चोंचले ऐसा भी मानते हैं कि भारतीय बुद्धत्व की परम्परा के स्थापित बुद्धों ने
स्वयं उन त्रिपितकों को लिखा है| यह स्थापित तथ्य है कि बुद्धों की परम्परा सदियों
की एक लम्बी अवधि की रही और अंतिम 28वें बुद्ध
के महापरिनिर्वाण के एक सदी के बाद प्रथम संगीति होने की चर्चा मिलती हैं| यह भी
एक तथ्य है कि कागजी प्रमाण कागज के आविष्कार के बाद ही कागज पर उतारे या लिखे गए
होगे| ऐसी स्थिति में शब्दों के ‘सतही अर्थ’ की अपेक्षा उनके ‘निहित अर्थ’
महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे अनुवादकों को ‘संरचनावाद’
की समझ होनी चाहिए| तब किसी वाचन को किसी व्यक्ति का प्रमाणिक वकतव्य मान कर
बहुत उछाल कूद करने वाले चोचले ऐसा कैसे कह सकते हैं कि शब्द के शब्द उन्ही विद्वानों
के द्वारा और ऐसे ही क्रम में अंकित कराये गये थे| ऐसे चोंचलों को भाषा के ‘संरचनावाद’
और ‘विखंडनवाद’ के दर्शन की कोई समझ नहीं होती| वे सिर्फ अपने घायल अहम् को ठीक
करने के उद्देश्य से उछाल कूद करते होते हैं|
ऐसे
चोचले अंग्रेजी, पालि और संस्कृत के जटिल शब्दों का अनावश्यक प्रदर्शन करते दिख
सकते हैं| ऐसे लोग वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से जमीनी आधार पर कटे
हुए होते हैं| यह इनके अकादमिक या वैचारिक नखरे का एक प्रतिरुप माना जा सकता है|
ये चोंचले विमर्श की समझ बढ़ाने के बजाय अहं-प्रदर्शन का बहस बना देते हैं| “मैं अन्तिम सत्य जानता हूँ” का भाव उनके पूरे
व्यक्तित्व पर छाया रहता है|
ऐसे
चोंचले जमीनी सवालों पर समाधान देने के बजाय केवल संदर्भ और उद्धरण गिनाते रहते
हैं| ऐसे चोंचलों का अपनी कोई जमीनी कार्य –योजना या कोई कार्य –अभियान नहीं होता
है| ऐसे चोंचले असहमति दिखाने वालों को सिर्फ मूर्खता का प्रमाण –पत्र और स्वयं को
बौद्धिकता का प्रमाण लेते हुए कहीं भी उपलब्ध होते हैं| ऐसे चोंचले हर विषय को “सैद्धांतिक शुद्धता” के नाम पर व्यावहारिकता से काट
देते हैं| इन चोचलों के शब्द बौद्धिकता के विरोध में नहीं होते हैं, बल्कि खोखली बौद्धिकता और दिखावटी प्रज्ञा की आत्म –संतुष्टि के लिए होता
है।
“बौद्धिकों के चोंचले” समकालीन समाज में अधिकतर टीवी
बहसों, सोशल मीडिया, अकादमिक मंचों और
वैचारिक आंदोलनों में दिखता होता है| ऐसे बौद्धिक चोंचले टीवी डिबेट की संस्कृति में
दिखते हैं, जहाँ विचार विमर्श के नाम पर, प्रदर्शन के लिए
बहस मात्र होता है| आज के न्यूज़ चैनलों पर तथाकथित बौद्धिक अक्सर मुद्दे को
समझाने के बजाय शब्दों का जादू दिखाते होते हैं| बौद्धिक विमर्श को ज्ञान के उपयोग
की नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता की लड़ाई बना देते हैं| यह बौद्धिकता
समझाने का माध्यम नहीं होकर सिर्फ चौंकाने
का औज़ार बन जाती है।
अधिकतर
बौद्धिक चोंचलों का रवैया “अगर आप सहमत नहीं हैं तो
आप अज्ञानी या मूर्ख हैं” का होता है| ऐसे चोंचले समाधान से
अधिक तथाकथित शुद्धता पर अड़े या जड़े हुए होते हैं| ये व्यावहारिक सुधारों को “आदर्श से विचलन” बताकर खारिज कर देते हैं| ऐसे
चोंचले जमीनी सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय सैद्धांतिक शुद्धता के नाम पर जमीनी
स्तर पर कुछ नहीं करते होते हैं| “यह पूरी तरह सही नहीं है”
कहकर आंशिक समाधान भी रोक देते हैं| परिणामत: समस्या बनी रहती है,
और बौद्धिकता का प्रदर्शन जारी रहता है।
ऐसे
चोंचले वृहत समाज को ढोंगी, पाखण्डी और कर्मकाण्डी बता कर अपने को विशिष्ट बौद्धिक
मात्र साबित करता है| ऐसे चोंचले समाज को कोई वैकल्पिक समुचित समाधान नहीं देता
है| ऐसे चोंचले समाज से संवाद की कड़ी को भी खण्डित कर सिर्फ अपनी बौद्धिकता का
प्रदर्शन करते दिखते है|
आचार्य
प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय
अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
अच्छा हुआ, अब इस तरह के चौचले व्यक्ति से यदि भेंट मेरी होगी, तो मैं केवल मुस्कुरा कर निकल जाउंगा और अपनी उर्जा का अपव्यय से बच सकता हूँ।
जवाब देंहटाएंआप की निष्पक्ष लेखनी के लिए बधाई।