बुद्धि को केवल आंकड़ों या सूचनाओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता। बुद्धि की उत्पत्ति एवं विकास सिर्फ चेतना की 'स्थिरता" की अवस्था में हो सकता है।
मन
और चित्त अक्सर अतीत और भविष्य के बीच झूलता रहता है| मन और चित्त को चेतना कहते
हैं। चेतना बीते हुए कामों पर पछतावा करता है या आगे की योजनाओं को लेकर चिंतित रहता
है| चेतना को नियंत्रित करने की जितनी कोशिश की जाती है,
उतना ही वह प्रयास थका देने वाला और व्यर्थ हो जाता है। यही कारण है
कि ध्यान इतना आवश्यक है। ध्यान के माध्यम से चेतना स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता
है| यह हमें अपनी सहज बुद्धि तक पहुँच
प्रदान करता है। यही वह क्षण होता है, जब जागरूकता सूचनाओं को संसाधित करने के साथ
अपने अंतर्ज्ञान को सुनने की ओर मुड़ जाता है। ध्यान एक विधि है, साधन है, यह कोई
अंतिम लक्ष्य नहीं है| चूँकि यह साधन है, इसीलिए यह अवस्था ‘साधना’ कहलाता है|
ध्यान
एक विधि मात्र है, जो उस बुद्धि तक पहुँचने का उपागम (Approach) देता है| बुद्धि
चेतना का एक स्तर है| चेतना का प्राथमिक स्तर संवेदनशीलता है| यह संवेदनशीलता
उर्जा के प्रवाह से, यानि उर्जा के स्थिति –परिवर्तन से प्रारम्भ होता है| यह
चेतना का प्राथमिक और मूल स्तर हुआ| इस तरह, यह बुद्धि का प्रारम्भिक स्तर हुआ| इन
संवेदनाओं से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं, जो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्राप्त और
संसाधित (Process) किए जाते है| ज्ञानेन्द्रियाँ या तो शारीरिक हो सकते हैं, या
मानसिक, या आध्यात्मिक, या इनका एक निश्चित संयोजित स्वरुप| इन ‘संकेतों’ के
व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| इन ‘सूचनाओं’ के
व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं|
कोई
भी ‘ज्ञान’ एक ऐसी अवस्था है, जो उसके किसी उपयोग और प्रयोग की दशा एवं दिशा से
निरपेक्ष होता है| जब कोई अपनी आवश्यकता या मंशा के अनुरुप उस ज्ञान का उपयोग या
प्रयोग करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है| किसी ‘ज्ञान’
का किसी व्यक्ति के द्वारा किसी विशेष प्रयोजन के लिए किया गया उपयोग या प्रयोग ही
‘बुद्धि’ है| जब कोई ‘ज्ञान’ का उपयोग एवं प्रयोग सिर्फ ‘मानवता’ और ‘मानवता के
भविष्य’ के लिए करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यदि कोई ‘ज्ञान’ किसी को अचानक प्रकट होता है, तो वह ‘ज्ञान’ उसका ‘अंतर्ज्ञान’ (Enlightenment) कहलाता है|
इसे ‘अनन्त प्रज्ञा’ से उत्पन्न माना जाता है|
तो
प्रश्न यह है कि इस ‘बुद्धि’ का उत्पादन या चेतना के स्तर के विकास में ‘स्थिरता’
क्यों आवश्यक है, और यह ‘स्थिरता’ कैसे काम करता है?
‘स्थिरता’
को ‘ठहर जाना’ भी समझा जाना चाहिए| यह शांत चित्त की अवस्था होता है| इसे एकाग्रता
की अवस्था माना जाना चाहिए| यह मन एवं चित्त का स्थिर संतुलन है| यह प्रज्ञा की
पूर्वशर्त है। बुद्ध के अनुसार, “समाधि से प्रज्ञा
उत्पन्न होती है”| चेतना की स्थिरता से ही विवेकशील बुद्धि
जन्म लेती है। चंचल चेतना सत्य को ग्रहण नहीं कर सकता। यह पहले ही स्पष्ट किया जा
चुका है कि बुद्धि केवल जानकारी नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझ
है।
आधुनिक
मनोविज्ञान इस कथन की पुष्टि करता है कि जब चेतना तनाव,
भय या आवेग में होता है, तब निर्णय क्षमता घट
जाती है। चेतना की शान्ति यानि भावनात्मक स्थिरता और संज्ञानात्मक नियंत्रण से बेहतर
तर्क, गहन विश्लेषण और दीर्घकालिक सोच संभव है। स्थिर मानसिक अवस्था में मस्तिष्क
उच्च स्तर पर कार्य करता है।
सामान्य
समाज में प्रतिक्रियाएँ अधिक होती हैं, समझ कम।
स्थिर परिस्थितियों में व्यक्ति अनुभवों को आत्मसात करता है, उनसे सीखता है और यहीं से बुद्धि विकसित होता है। ‘स्थिरता’ का अर्थ कोई ‘जड़ता’
नहीं होता है, बल्कि यह ‘गति’ की दिशा को क्षैतिज अवस्था से उर्घ्वाकार अवस्था में
ले जाना होता है| इससे कोई उसकी गहराइयों में उतरता है| यह दिशाओं की अवस्था में एक
आवश्यक संतुलन बनाना होता है| यह भी स्पष्ट समझना आवश्यक है कि पूर्ण निष्क्रियता
बुद्धि नहीं, बल्कि सजग स्थिरता बुद्धि को जन्म देती है। यह
चेतनाओं की संवेदनशीलता का स्थिरीकरण हुआ| यही ‘मन’ एवं ‘चित्त’ का स्थिरीकरण है|
स्थिरता ही बुद्धि की गहराई, परिपक्वता और विवेकशीलता देता
है| यह सब मन की स्थिरता से ही संभव है| चंचलता
जानकारी दे सकती है, लेकिन बुद्धि नहीं|
आधुनिक न्यूरोसाइंस यह मानती है कि बुद्धि सिर्फ मस्तिष्क या
इसके किसी एक निश्चित भाग में स्थित नहीं होना माना जा सकता| यह ऊर्जा की या
संकेतों या सूचनाओं के नेटवर्क (Network) की स्थिर एवं संतुलित गतिविधि से उभरती है। यही नेटवर्क आत्मचिंतन, अर्थ-निर्माण, तर्क, योजना, समस्या
समाधान और ‘क्या महत्वपूर्ण है’, यह तय करता है| इन तीनों
नेटवर्कों के बीच संतुलन (Switching) करना ही स्थिरता है| स्थिर
मन में तीनों नेटवर्क ‘समरसता के समन्वय’ (Coherent Rhythm) में
काम करते हैं| यहीं से ज्ञान और बुद्धि निकलती होती है
यदि कोई अपने मन एवं चित्त को स्थिर
नहीं करता होता है, तो उसके तंत्रिका तंत्र में और उसके इस नेटवर्क में ‘संकेतों’
का स्वाभाविक शोर (Neural
Noise) होता रहता है| यह संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित
बौछारों से उत्पन्न होती है| संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित बौछारों
से सूचना स्पष्ट नहीं रहती, प्राथमिकता निश्चित नहीं होती, और इसीलिए सम्बन्धित निर्णय
भ्रमित होते हैं| स्थिर अवस्था में न्यूरॉन्स समुचित, लेकिन सटीक सम्प्रेषण करते हैं,
जिससे संकेत एवं सूचनाएँ सामान्य शोर की अपेक्षा बेहतर शांत अनुपात के माहौल में होते हैं| इसी से
गहरी समझ, सूक्ष्म अंतर पहचानने की क्षमता और रचनात्मकता उत्पन्न एवं विकसित होता है|
स्पष्ट है कि बुद्धि का जन्म कम शोर (Low Noise) वाली अवस्था
में होता है।
स्थिरता व्यक्ति में कुछ निश्चित
हार्मोन्स छोडती है, जो बिना नाली –प्रणाली के पूरे शरीर में फ़ैल कर स्थिरता पैदा
करता है| स्थिरता में डोपामिन (Dopamine) का स्राव समुचित मात्रा में होता है, जो सीखने की प्रेरणा देती है। सेरोटिनीन (Serotonin) का स्राव भावनात्मक संतुलन बना कर दीर्घकालीन
निर्णय लेने की सक्षम देता है| कोर्टोसिल (Cortisol) हार्मोन
स्मृति और सीखने की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है| बुद्धि तब उभरती है, जब इन
हार्मोन्स में समुचित संतुलन (Neurochemical balance) होता
है| उत्तेजना की अवस्था में यह संतुलन अनियंत्रित और उग्र हो जाता है|
स्थिरता ही सीखने की शर्त है| स्थिरता
ही सीखने का माहौल बनाता है| स्थिरता जड़ता नहीं है, बल्कि स्थिरता ही ‘मन’ एवं ‘चित्त’
को ‘लचीलापन’ (Plasticity) देता है| न्यूरोप्लास्टीसिटी (Neuroplasticity) के
लिए सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण चाहिए, जो स्थिरता लाने का माहौल दे सके| तनाव की
अवस्था में मस्तिष्क अपनी उत्तरजीविता (Survival) बनाए रखना
चाहती है और इसीलिए यह जड़ हो जाती है| इससे नए सीखने के लिए लचीलापन कम हो जाता
है| इसलिए गहरी बुद्धि संघर्ष की तीव्रता से नहीं, बल्कि स्थिर
अभ्यास से बनती है।
अल्बर्ट आइन्स्टीन ‘समय’ के ‘पतले होने’ या फ़ैल जाने (Dilation)
के सम्बन्ध में बताते हैं| यह ‘समय’ का ‘कम होना’ या ‘बढ जाना’ नहीं होता है| यह ‘समय’
का सिकुड़ जाना’ या ‘फ़ैल जाना’ होता है| न्यूरोसाइंस बताता है कि अस्थिर चेतना में समय सिकुड़ जाता है और स्थिर चेतना में समय फैल जाता है| जब समय की
अनुभूति विस्तृत हो जाती है, तब व्यक्ति दूरगामी परिणाम देख पाता है। उसे यह कारण–कार्य के संबंध से स्पष्ट
होता है| इसी क्षमता को विवेक (Wisdom) कहते हैं। यह
स्थिरता ही समय –बोध को बढ़ा कर बुद्धि को विकसित और संवर्धित करने का अवसर देता
है| ध्यान (Meditation) पर आधुनिक शोध बताते है कि ध्यान से Alpha–Theta
brain waves बढ़ती हैं| ये तरंगें रचनात्मकता, गहन समझ और अंतर्दृष्टि
से जुड़ी हैं। यही “स्थिरता से प्रज्ञा” है|
इसीलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि
मैं कोई तीक्ष्ण बुद्धि का व्यक्ति नहीं हूँ| जिसे लोग तीक्ष्ण बुद्धिमता का
प्रमाण समझते हैं, वह मात्र स्थिरता से चिन्तन होता है| यह मात्र गहनता से एक
स्थिर विषय पर चिन्तन –मनन है| बुद्धि कोई तेज़ मस्तिष्क नहीं है, बल्कि संतुलित,
स्थिर और लचीला मस्तिष्क है। बुद्धि उसी अवस्था में उत्पन्न एवं
विकसित होती है, जब मन एवं चित्त, यानि चेतना की तरंगे एक निश्चित विन्यास और
नेटवर्क में व्यवस्थित रुप से सक्रिय होती है|
इसीलिए स्थिर होना सीखिए और बुद्धिमान बनिए|
आचार्य
प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय
अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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