‘चेतना’ (Consciousness) किसी ‘जीवन’ में होता है| ‘चेत’ (Alert) जाना
ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना’ ही ‘जागरुकता’ है| ‘जानने की क्षमता’ ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना
का अहसास’ उर्जा के प्रवाह और उसके रूपान्तरण से होता है| उर्जा के प्रवाह और उसके
रूपान्तरण से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं| उन संकेतों के विशिष्ट आव्यूह (Matrix) से
‘सूचना’ (Information) का निर्माण होता है| सूचनाओं के व्यवस्थित और संगठित स्वरुप
को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं| किसी चीज को यथास्थिति में जानना ‘ज्ञान’ है| ‘ज्ञान’
के सकारात्मक या नकारात्मक उपयोग एवं प्रयोग को ‘बुद्धि’ (Intellect) कहते हैं| ‘ज्ञान’
का उपयोग या प्रयोग अपने लिए करना ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग
‘मानवता’ या ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करना ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यह सब
चेतना के विभिन्न ‘स्तर’ (Level) हैं| इसे कोई चेतना के विभिन्न ‘स्वरुप’ (Form) और
‘प्रतिरुप’ (Pattern) कह सकते हैं| एक आदमी का चेतना एक सामान्य जानवर से लेकर
प्रज्ञावान तक हो सकता है|
चेतना की अवस्था में कोई अपने भीतर या अपने से बाहर की दुनिया के
प्रति सजग और सतर्क होता है| इस चेतना में विचार, भावनाएँ, और प्रत्यक्ष ज्ञान शामिल
रहता है| जीवन दो तरह का होता है, एक पादप –जीवन (Plant –Life) होता है, और दूसरा जन्तु
–जीवन (Animal –Life) होता है| पादप स्वयं चलायमान नहीं होता है, इसीलिए इसकी
चेतना सीमित मात्रा में कार्यरत होती है| हमलोग जन्तु की श्रेणी में आते हैं|
जन्तु चलायमान होता है| जंतुओं में स्तनपायी (Mammal) सबसे ज्यादा चेतनशील होते
हैं| मानव भी एक स्तनपायी जीव है| मानव का चेतना स्तर और इसका प्रतिरुप
सर्वोत्कृष्ट और उच्चस्थ होता है|
मानव अपनी चेतना के विस्तार से ‘होमो सेपियंस’ (पशु मानव) से ‘होमो
फेबर’ (निर्माता मानव), होमो सोशिअस’ (सामाजिक मानव), ‘होमो साइन्टिफिक’ (वैज्ञानिक
मानव) और ‘होमो स्पिरिचुअल’ (आध्यात्मिक मानव) बन गया है| मानव चेतना का विस्तार
अनन्त तक हो सकता है| मानव चेतना की विस्तार की कोई निश्चित सीमा नहीं हो सकती| मानव
चेतना का स्तर अब ज्ञान, बुद्धि और प्रज्ञा तक पहुँचा हुआ है| अब इसके विस्तार करने
और गहराइयों में उतरने की जरुरत है| लेकिन यह कैसे सम्भव हो सकता है?
मानव चेतना का विस्तार ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ के आधार पर हो सकता है|
जहाँ तर्क हमें यथार्थ के धरातल पर खड़ा रखता है, वहीं कल्पना हमें अनन्त आकाश में उड़ान भरने की
प्रेरणा देती है। आईन्स्टीन ने कल्पना को तर्क और परिश्रम से बहुत महत्वपूर्ण
माना| ये ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ मानव विकास के आधार स्तंभ हैं| परंतु इन दोनों की
अपनी-अपनी सीमाएँ और संभावनाएँ हैं। तर्क की अपनी सीमाएँ होती है और इसके सहारे आप
कुछ सीमित दूरी तक जा सकते हैं| कल्पना सीमाविहीन होती है और कोई कल्पना के सहारे अनन्त
तक पहुँच सकता है|
आईन्स्टीन अपने बारे में कहते हैं कि मैं विलक्षण बौद्धिकता का
व्यक्ति नहीं हूँ| मेरी कल्पनाशीलता मुझे विशिष्ट और भिन्न बनाती है| वे कहते हैं
कि अपनी चिन्तनशीलता के कारण वे विशिष्टता और भिन्नता की स्थिति पाते हैं| चिन्तनशीलता
ही कल्पनाशीलता है| यह चिन्तनशीलता विचारों पर ठहराता है और गहराइयों में उतारता है।
अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं कि आप तर्क से अ (A) से ज्ञ (Z) तक जा सकते हैं| लेकिन
आपकी कल्पनाशीलता आपको कहीं भी ले जा सकता है। मानवता में अद्वितीय योगदान तार्किक
और कल्पनाशीलता से मिली है| इन दोनों में कल्पनाशीलता का स्थान तार्किकता से अलग,
उच्चतर, विशिष्ट और सर्वोच्च है|
तर्क का कार्य वस्तुओं, घटनाओं और विचारों को प्रमाणों और कारणों के आधार पर
समझना है। यह मनुष्य को भ्रामक विश्वासों और अंधविश्वासों से मुक्त करता है। परंतु
तर्क की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह केवल उस क्षेत्र में कार्य कर सकता है, जिसे
इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं या जिसे बुद्धि प्रमाणित कर सकती है। तर्क अदृश्य,
अमूर्त या भावनात्मक सत्य को नहीं पकड़ सकता। प्रेम, सौन्दर्य, श्रद्धा या ईश्वर जैसे अनुभव तर्क की सीमा
से बाहर हैं। तर्क यदि अति-प्रबल हो जाए, तो वह जीवन को
यांत्रिक और भावना शून्य बना देता है।
कल्पना वह शक्ति है जो हमें दृश्य से अदृश्य, ज्ञात से अज्ञात और सीमित से असीम
की ओर ले जाती है। विज्ञान की हर खोज और कला की हर रचना कल्पना की ही देन है।
कल्पना वह सेतु है जो मानव को सृजनशील बनाती है। इसका कोई निश्चित क्षेत्र नहीं
है| यह विचार, भाव, और स्वप्न के संसार
में असीमित रूप से विचरण करती है। यही कल्पना की अनन्ता है| यहीं से धर्म, दर्शन और कला का उद्भव हुआ। चेतना के असीमित विस्तार का यही मुख्य आधार
है| आप तर्क के सहारे सदैव आगे नहीं बढ़ सकते, लेकिन आप कल्पनाशीलता के साथ कहीं से
और कभी भी आगे बढ़ सकते हैं|
मनुष्य के समग्र विकास के लिए तर्क और कल्पना दोनों का संतुलन आवश्यक
है। केवल तर्क पर आधारित जीवन सूखा और सीमित होता है| केवल कल्पना पर आधारित जीवन
भ्रम और अस्थिरता में डूब सकता है। जब तर्क दिशा देता है और कल्पना उसमें ऊर्जा
भरती है, तब सृजन
का चमत्कार घटित होता है।
तर्क हमें यह सिखाता है कि क्या है? कल्पना हमें यह दिखाती है कि
क्या हो सकता है? तर्क की अपनी सीमाएँ हैं| कल्पना की कोई सीमा नहीं। इसी कारण
मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विकास तर्क
की ठोस भूमि और कल्पना के अनन्त आकाश — दोनों के सम्मिलन से संभव हुआ है|
आप मानव चेतना का अनन्त विस्तार अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’
के साथ कर सकते हैं| इसलिए आप अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’ की क्षमता का
विस्तार करते रहिए| यही आपको विशिष्ट, उच्चतर और लाभकारी बनाएगी|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय
अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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