शनिवार, 15 अगस्त 2020

मार्केटिंग प्रबन्धन का विज्ञान(और बुद्ध ) (Science of Marketing Management n Buddha)

 

मार्केटिंग प्रबन्धन का विज्ञान(और बुद्ध )

(Science of Marketing Management n Buddha)

एक अच्छा मार्केटिंग प्रबंधन की विधा कला एवं विज्ञान का योग होता है| इसकी सफलता के लिए काफी सावधानी के साथ योजना बनाना एवं उसका कार्यान्वन करना होता है| मार्केटिंग में मानवीय एवं सामाजिक अवश्यकताओ एवं मांगों की पहचान करना और उसको पूरा करना होता है, परन्तु लाभ के साथ| लाभ के साथ इसलिए ताकि मार्केटिंग तंत्र को संचालित रखने के लिए उर्जा के रूप में ईंधन की अबाध आपूर्ति होते रहे| मार्केटिंग इस तरह किया जाता है कि इसके लाभों से अधिकतम लोगो को लाभ मिलें अर्थात इन उत्पादों का व्यापक प्रसार करना मार्केटिंग की मौलिक आवश्यकता है| व्यापक प्रसार के लिए संसाधनों की अबाध आपूर्ति भी एक आवश्यक शर्त है| संसाधनों में धन और सामाजिक समर्थन आवश्यक हो जाता है| इस तरह मार्केटिंग प्रबंधन में एक कला एवं एक विज्ञान की तरह लक्षित बाज़ार का चयन करना होता है और ग्राहकों को उच्चतर मूल्यों को उपलब्ध कराने, आपूर्ति करने तथा सम्प्रेषण करने के लिए ग्राहकों को बनाना, बनाए रखना और उसमे वृद्धि करना शामिल है| मार्केटिंग एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसमे व्यक्तिगत एवं समूह अपनी इच्छाओं तथा आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाता है| एक अच्छा विपणनकर्ता यानि मार्केटर  समाज को उच्चतर जीवन स्तर प्रदान करता है| बुद्ध को एक सफ़ल विपणनकर्ता कहा जाना चाहिए जिन्होंने अपने उत्पादों का विश्व व्यापी प्रसार एवं प्रचार किया|

एक सफल विपणनकर्ता अपने उत्पादों (विचारों, शिक्षाओं, सेवाओं) की आपूर्ति अपने लक्षित बाज़ार (समाज) को ध्यान में रख कर करता है और उससे सूचना एवं संसाधन (धन) प्राप्त करता है| इसी मौलिक सिद्धांत पर बाजार एवं विपणनकर्ता काम करता है| मार्केटिंग के शोधकर्ताओं के अनुसार मार्केटिंग के प्रवृति में विगत वर्षो में काफी बदलाव आए हैं जैसे तकनीकी (Technology) , वैश्वीकरण (Globalisation) और सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Responsibility)| इन तीन परिस्थितियों को बुद्ध के सन्दर्भ में देखते हैं| बुद्ध का कपिलवस्तु से राजगीर आना उनका तकनीक के प्रति आकर्षण ही था| उस समय राजगीर या राजगृह मगध की राजधानी थी और यह कृषि तकनीक, औद्योगिक तकनीक, अध्ययन तकनीक एवं सामाजिक प्रयोगों की तकनीक की प्रयोगशाला रही| आज के मार्केटिंग दार्शनिक यानि शिक्षक बताते हैं कि आज सूचनाओं का युग नहीं रहा अपितु सूचनाओं के प्रसार (Sharing Information is Power) का युग है| बुद्ध को जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तो वे अपनी ज्ञान (सूचनाओं) के प्रसार करने यानि बाँटने के लिए गया से सारनाथ पहुँच थे और बाद में तत्कालीन दुनिया में इसे शेयर करना चाहा| वैश्वीकरण  की नीति आज के शोधकर्ताओं के लिए एक नई खोज लग सकती है, परन्तु बुद्ध ने तत्कालीन दुनिया के कई राज्यों एवं साम्राज्यों (भले ही सब तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप में ही थे) तक इसे पहुचाया| इनकी वैश्वीकरण  की नीति के कारण ही बाद के अनुयायी शासकों एवं शिष्यों ने तत्कालीन दुनिया में पहुंचाया| यह उनकी वैश्वीकरण की समझ और परिणाम थी| आज के कतिपय शोधकर्ताओं को सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR- Corporate Social Responsibility) एक नया मार्केटिंग अवधारणा लगता है| बुद्ध ने इसकी आवश्यकता की पहचान उसी समय कर ली थी या कहें कि यह उस समय से ही परम्परा रही|

यदि हम विपणन के सम्पूर्णता के अवधारणा (Holistic Marketing Concept) को देखे तो बुद्ध ने संबंधों का विपणन (Relationship Marketing), समन्वित विपणन (Integrated Marketing), आन्तरिक विपणन (Internal Marketing) एवं प्रदर्शन या उपलब्धि विपणन (Performance Marketing) किया था जो आज एक आधुनिक अवधारणा माना जाता है| बुद्ध ने सम्बन्धो के विपणन में आम जनता के साथ साथ राजाओं एवं सम्राटों से मधुर सबंध बनाए| उन्होंने सम्बन्धो को बनाने एवं उसको बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया| इन्होंने अपने समन्वित विपणन में विपणन के सभी पहलुओं और पक्षों को ध्यान में रखकर एक समेकित नीति बनाई थी| उसने जीवन के सभी पक्षों को ध्यान में रखा| विपणन के आतंरिक हिस्से में उन्होने संघ की स्थापना एवं संचालन  किया| प्रदर्शन या उपलब्धि विपणन हर विपणन का लक्ष्य और प्राप्ति होता है| इसी से विपणन के सफलता का स्तर जाना जाता है|

किसी भी विपणन यानि मार्केटिंग के चार अंतर्दृष्टि (Marketing Insight) (चार आर्य सत्य) होता है- 1. स्वीकार्यता (Acceptability) –बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं के लिए कोई औपचारिकता नहीं रखी| इसमे कोई कर्मकांड या पाखण्ड या ढोंग को कोई स्थान नहीं दिया जिससे उनकी स्वीकार्यता काफी बढ़ी हुई थी| 2.सामर्थ्यता (Affordability) – इसका खर्च को कोई भी वहन कर सकता था क्योंकि इसमे कोई खर्च की कोई शर्त ही नहीं थी| 3. अभिगम्यता (Accessibility) – अभिगम्यता का अर्थ पहुँच से है| इनकी शिक्षाओं की पहुँच सभी – स्त्री एवं पुरुष, राजा एवं प्रजा, गरीब एवं अमीर, निम्न वर्गीय एवं उच्च वर्गीय या समाज के किसी भी स्तर के लोग हो, तक थी| 4. जागरूकता (Awareness) – इन्होंने अपनी शिक्षाओं के प्रति सभी वर्गों के लोगो में जागरूकता लायी| यही कारण है कि एक वेश्या, एक दस्यु या इन्ही के समतुल्य अन्य की भी पहुँच इन तक रही थी|

विचारों एवं शिक्षाओं के सफल प्रचार एवं प्रसार (मार्केटिंग) के लिए इन्होंने संघ का निर्माण किया ताकि हर क्षेत्र में इनके शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार हो सके| संघ विमर्श का भी एक केंद्र होता है| संघ में बदले हुए काल एवं संस्कृति के अनुरूप इन शिक्षाओं के स्वरुप पर विमर्श कर यथावश्यक संशोधन होता रहता था| सभी जनों के लिए आष्टाँगिक मार्ग का सिद्धांत दिया, परन्तु परिव्राजकों (सेल्समेन) के लिए दस पारमिताएं का अतिरिक्त सिद्धांत दिया| बुद्ध का मानना था कि प्रचारकों को आदर्श व्यवहार का होना चाहिए क्योंकि लोग उन्हें ही प्रथमत: पालनकर्ता का आदर्श मानते हैं| वैसे भी माना जाता है कि सेल्समैन का सामान बाद में बिकता है, पहले खुद सेल्समैन बिकता है अर्थात सेल्समैन को आकर्षक एवं नैतिक  व्यक्तित्व का होना चाहिए ताकि उसको हर जगह एवं हर समाज में प्रवेश मिल सके| इसी के निमित्त इन्होंने इन्हें शील का पथ या सद्गुणों का मार्ग बताया| उन्होंने समझाया कि शील के पथ का पथिक होने का अर्थ है इन दस सद्गुणों का सम्यक अभ्यास करना| ये सद्गुण हैं- शील, दान, उपेक्षा, नैष्क्रम्य, वीर्य, शान्ति, सत्य, अधिष्ठान, करुणा, मैत्री| 

 

1.      शील का अर्थ हुआ कि परिव्राजकों में नैतिकता हो तथा बुराई करने में लज्जा भय रहे| अच्छा कार्य करने की प्रवृति तथा बुरा कार्य नहीं करने की प्रवृति शील में ही शामिल है| लज्जा- भय के कारण पाप से बचे रहने की प्रयास करना ही शील है| नैतिकता – अनैतिकता का विवाद समय एवं संसाधन की बरबादी है| अत; ऐसे कामों से बचा ही रहना चाहिए जो अनावश्यक विवाद में घसीटता हो|

 

2.      नैष्क्रम्य का अर्थ है सांसारिक काम- भोगों का त्याग यानि परिवार आदि के बंधन से मुक्त रहना| सांसारिक काम-भोगों की अधिकता को ही व्यभिचार माना जाता है और इसलिए इसका सर्वथा त्याग ही परिव्राजकों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है| ऐसा व्यक्ति सदैव अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है|

 

3.      दान का अर्थ होता है बदले में किसी भी प्रकार की स्वार्थ- पूर्ति के आशा के बिना दूसरों की भलाई के निमित्त अपनी संपत्ति का ही नहीं, अपने रक्त, अंग या प्राण तक का भी दान करना| अर्थात एक परिव्राजक का अपना कुछ भी नहीं होता, उसका सभी कुछ समाज के लिए सदैव समर्पित होता है| निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का सभी सुनते एवं सम्मान करते हैं| संभावित ग्राहकों से सम्मान पाना और अपनी बातों को सुनाने के लिए संभावित ग्राहकों को तैयार कर लेना ही पहली सफलता होती है| ऐसे दानी की छवि वाले को अपनी बात रखने और सुनाने का अवसर अवश्य मिलता है|

 

4.      वीर्य का अर्थ होता है सम्यक प्रयत्न| इसके अनुसार जो कुछ एक बार करने का निश्चय कर लिया अथवा जो कुछ करने का संकल्प कर लिया गया, उसे पूरा करने में अपना सामर्थ्य लगा देना ही वीर्य कहलाता है| यदि किसी ने एक बार परिव्राजक बनाने का निर्णय ले लिया तो उसमे परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए| पालि के इस शब्द का संस्कृत में अर्थ विकृत कर शुक्राणु के पर्यायवाची कर दिया गया और इसी कारण सामान्य लोगों को इसे समझने में कठिनाई होती है|


5.      शान्ति का अर्थ क्षमा- शीलता से लिया जाता है| घृणा से अर्थात घृणा करके घृणा को नहीं मिटाया जा सकता है| यह सभी जीवों के लिए लागू होता है पर परिव्राजको के लिए पारमिता की सूचि में रखा गया है| क्षमा शीलता से ही घृणा का नाश या घृणा को समाप्त किया जा सकता है| मार्केटिंग के लिए  लक्षित कोई भी उपभोक्ता यानि संभावित ग्राहक घृणा का पात्र नहीं होता| क्षमा- शीलता से हर तरह का ग्राहक आपकी उपयोगिता बढा देता है यानि आपको लक्ष्य पाने में आपका सहायक होता है|

 6.      सत्य का अर्थ होता है सही और सच्चा रहना| किसी को कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए| हमेशा सत्य के          पक्ष में रहना चाहिए| कभी बेकार एवं फिजूल की बातों में नहीं रहना या पड़ना चाहिए| इससे समाज में इनकी        स्वीकार्यता तथा विश्वसनीयता बढ़ जाती है|   

7.      अधिष्ठान का अर्थ अपने उद्देश्य तक पहुँचने यानि अपने लक्ष्य को पाने का दृढ़ निश्चय करना होता है|          जहाँ वीर्य सम्यक प्रयत्न करने से सम्बन्ध रखता है, वही अधिष्ठान सम्यक लक्ष्य से सम्बन्ध रखता है| हर                  परिव्राजक से यह उम्मीद की जाती है कि प्रत्येक अपने प्रचार- प्रसार (मार्केटिंग) के लक्ष्य को प्राप्त करे|

8.      करुणा का अर्थ होता है सभी के प्रति प्रेमभरी दया का भाव| करुणामयी व्यक्ति लम्बे दौड़ में अपनी पहचान बना लेता है| करुणामयी व्यक्ति एक आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होता है| करुणा का भाव उसके आँखों एवं व्यवहार से झलकता है| एक करुणामयी सेल्समैन अपने ग्राहकों से समानुभूति (Empathy) ही नहीं रखता, अपितु ग्राहकों की स्थिति के अनुसार उसे आस्थगित मूल्यों या किश्तवार मूल्यों की सुविधाये भी उपलब्ध करा कर अपना लक्ष्य प्राप्त करता है और संगठन को लाभ पहुंचाता है|

 

9.      मैत्री का अर्थ होता है सभी प्राणियों के प्रति भाई चारे का भाव रखना| यह भाव मित्रो के अतिरिक्त शत्रुओं के प्रति भी समान रूप से होना चाहिए| मित्र हो या शत्रु , उत्पादों के संभावित ग्राहकों के रूप में सभी समान रूप में मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण हैं| इसीलिए एक परिव्राजक को सभी के प्रति समान मैत्री भाव रखना चाहिए| एक सेल्समैन को यह भाव रखना उसके लिए आवश्यक होता है| हर व्यक्ति एक संभावित ग्राहक है|

 

10. उपेक्षा का अर्थ है अनासक्ति| यह चित्त यानि मनोभाव की वह अवस्था है जिसमे प्रिय या अप्रिय कुछ नहीं होता| परिणाम कुछ भी हो, उसकी ओर से निरपेक्ष रहना ही उपेक्षा है| यह किसी के सुख- दुःख के प्रति निरपेक्ष भाव रखने से सर्वथा भिन्न वस्तु है| एक परिव्राजक को एक निश्चित परिणाम की आशा किए बिना ही सभी के पास जाना चाहिए| एक सेल्समैन से भी यही आशा की जाती है कि वह किसी भी परिणाम की आशा किए हर संभावित ग्राहक के पास जाए| कहा जाता है कि यदि आप किसी दस व्यक्ति के पास जाते हैं और किसी एक व्यक्ति को अपना उत्पाद लेने को राजी कर पाते हैं तो आप एक सफल सेल्समैन हैं|

 

मैं भी उपरोक्त दसों बिन्दुओं को एक सेल्समैन के लिए आवश्यक गुण मानता हूँ| एक परिव्राजक बुद्ध की शिक्षाओं यानि विचारों का प्रचार- प्रसार कर रहे थे, उसी तरह एक सेल्समैन अपने किसी भी उत्पाद का विपणन (Marketing) कर सकते हैं|

 

इन्होंने विचार एवं दर्शन और शासनात्मक नीतियों एवं आयोजनाओ के सम्यक प्रचार और प्रसार के लिए मार्केटिंग प्रबंधन का सिद्धांत दिया जो आज भी उपयुक्त है और अध्ययन का विषय है| केलौग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के मार्केटिंग प्रबंधन के प्रोफेसर फिलीप कोटलर भी विचारों और नीतियों के मार्केटिंग प्रबंधन सिद्धांत दिए हैं जो इसी दर्शन पर आधारित कहा जा सकता है| बुद्ध का ही सफल मार्केटिंग प्रबंधन था जिसके कारण इनके दर्शन को जनता और शासकों का अपार समर्थन मिला और बाद में इसी के आधार पर विश्व को प्रभावित किया| आज जब बेहतर मार्केटिंग प्रबंधन के सिद्धांतों का अवलोकन एवं अध्ययन किया जाता है तो बुद्ध के दर्शन के मार्केटिंग प्रबंधन से काफी समानता मिलती है जो एक अलग अनुसंधान का विषय है| इस तरह बुद्ध को मार्केटिंग प्रबंधन के प्रथम सिद्धांतकार कहा जाना चाहिए|

 सभी को समेकित रूप में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि बुद्ध  इन विषयों या इन विधाओं में पारंगत थे| इन्होंने इन्ही चीजों को समझकर उचित मार्ग दर्शन दिया जिससे मानवता लाभान्वित हुआ| आज के विश्व के सभी विकसित देशों और समाजों का यदि सूक्षम अवलोकन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिन सिद्धांतों का अनुपालन कर ये देश और समाज आज अग्रणी बनें हुए हैं, उनका प्रथम प्रतिपादन बुद्ध ने ही किया था| इसी को रेखांकित करने का यहाँ प्रयास किया गया है| इन्होंने इन सभी को सम्यक ढंग से समझा और सूक्ष्म अवलोकन कर सिद्धांत का रूप दिया जिसे बौद्ध दर्शन के रूप में जाना जाता है|


 केलौग स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट (नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, यू० एस० ए०) के मार्केटिंग के विश्व प्रसिद्ध प्रोफ़सर  फिलिप कोटलर (एवं केलर) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ मार्केटिंग मैनेजमेंट” (प्रकाशक पियर्सन) में बताया है कि वस्तुओं, सेवाओं, घटनाओं, संपदाओं, व्यक्तिओं, स्थानों, संगठनों, अनुभवों, सूचनाओं, नीतियों  इत्यादि के साथ साथ विचारों और आईडियाओं  की भी मार्केटिंग की जाती है| उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि मार्केटिंग में आईडिया या लाभों की ही आपूर्ति की जाती है, वस्तुएँ और सेवाएँ तो मात्र माध्यम होती हैं| अर्थात सभी चीजों के आपूर्ति में विचार यानि आईडिया ही सबसे महत्वपूर्ण है| बाज़ार में तो वस्तुएँ और सेवाएँ मार्केटिंग के लिए होती है, परन्तु लोगों को सिर्फ उम्मीद (Hope) प्रदान की या बेची जाती है|  


 अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों का कई (पांच) स्तर का क्षेत्रक (Sector) होता है- प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector), द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector), तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector), चतुर्थक क्षेत्रक (Quaternary Sector) और पंचक क्षेत्रक (Quinary Sector)| प्राथमिक क्षेत्रक में सभी प्राकृतिक उत्पाद आ जाते हैं जैसे कृषि उत्पाद, वनोत्पाद, जलीय उत्पाद, खनन उत्पाद आदि| द्वितीयक क्षेत्रक में प्राथमिक उत्पाद में मूल्यवर्धन किया जाता है| इसमे उद्योग क्षेत्र आता है| तृतीयक क्षेत्रक में लोगो को सेवाएँ दी जाती है जैसे व्यापार, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा, और अन्य व्यक्तिगत एवं सामाजिक सेवाएँ| चौथे क्षेत्रक को ज्ञान क्षेत्रक (Knowledge Sector) भी कहा जाता है| इसमे सूचनाओं पर आधारित (Information based) सेवाएँ दी जाती है जैसे म्यूच्यूअल फण्ड मैनेजर, कर सलाहकार, सॉफ्टवेयर निर्माता, सांख्यिकीविद आदि| पंचक क्षेत्रक में उच्च स्तरीय निर्णय लिया जाता है या नीतियों का निर्धारण किया जाता है| यह क्षेत्रक चौथे क्षेत्रक यानि ज्ञान क्षेत्रक से सूक्ष्म ढंग से भिन्न है| यह सेवाएँ नए और पुराने विचारों एवं आंकड़ों की नई व्याख्या (New Interpretation), नए चीजों के निर्माण पर संकेन्द्रण (Focus or Concentration on creation), पुनर्व्यवस्थापन (Re- Arrangement), पुनर्विन्यास (Re- Orientation) से उत्पन्न होता है| इसमे नए तकनीक के उपयोग और मूल्यांकन (Use and Evaluation) भी शामिल किया जाता है| इसे Gold Collar Profession भी कहा जाता है|

 

वर्तमान अर्थव्यवस्था के चौथे और पंचक क्षेत्रक को जानने के बाद यह बड़े गर्व के साथ कहा जा सकता है कि बुद्ध का स्तर इन वर्तमान चौथे और पंचक क्षेत्रक पर रहा था| इन्होंने ज्ञान और सूचनाओं को नए तरीके से व्याख्यापित किया| नव निर्माण पर केन्द्रित हो कर मन की क्रियाविधि को उद्घाटित किया| आत्म- अवलोकन, आत्म- केन्द्रण, आत्म- परिक्षण विधियों का पदार्पण नए तकनीकों के उपयोग और मूल्यांकन पर आधारित था| वे तत्कालीन कई दार्शनिकों के सानिध्य में रहकर जो सिखा, उनके पुनर्विन्यास और पुनर्गठन से कई नए सिद्धांत दिए जो नव उदित नगरीय समाजों और नव उदित राज्यों के सम्यक विकास के लिए महत्वपूर्ण था जिसे जानने और सिखने के लिए ही तत्कालीन दुनियाँ के विभिन्न क्षेत्रों से कई विद्वान् भारत भूमि आए और रहकर ज्ञान अर्जित किया|

निरंजन सिन्हा,

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक

(निरंजन सिन्हा की प्रकाशनाधीन पुस्तक – “बुद्ध: दर्शन एवं रूपांतरण” से)

 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

हमारी बुद्धिमता कहाँ है?

विचारों के युवाओं से ..........

मेरा सवाल बड़ा ही अटपटा है| हमारी बुद्धिमता कहाँ है? मुझे कभी कभी लगता है कि मैं बुद्धिमान हूँ| मेरी बुद्धि की मात्रा आपके या उनके अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है या नहीं भी हो सकती है| मै अपने बारे में अपनी बुद्धिमता के सम्बन्ध में किसी निरपेक्ष परिणाम पर पहुँच सकता हूँ? क्या मैं अपने बुद्धिमता के स्तर को जान सकता हूँ? मैं इसी द्वन्द में हूँ| मैंने सोचा कि आपको भी इस विमर्श में शामिल कर लिया जाए तो संभव है कि आप मेरा समाधान करने में सहायक बनेगें|

विद्वानों ने बुद्धिमता को भी कई प्रकार में बाँट दिया हैसामान्य बुद्धिमता, संवेगात्मक यानि भावनात्मक बुद्धिमता, और सामाजिक बुद्धिमतासामान्य बुद्धिमता ज्ञान के उपलब्ध जानकारी को जानना और आवश्यकता पड़ने पर उसका पुरोत्पादन कर देना ही है| साधारण शब्दों में रट्टू होना ही सामान्य बुद्धिमता है| इसे ही IQ (Intelligent Quotient) कहते है| दुसरे के संवेगों या भावनाओं को समझ कर अपनी नियंत्रित प्रतिक्रिया देना ही संवेगात्मक या भावनात्मक बुद्धिमता है| इसे ही EQ (Emotional Quotient) कहते हैं| डेनिएल गोलमैन (Daniel Golemanबताते हैं कि किसी की सफलता में EQ का योगदान 80% होता है और IQ का योगदान 20% होता है| सामाजिक बुद्धिमता समाज के व्यापक कल्याण को ध्यान में रख कर होता है| इसे SQ (Social Quotient) भी कहा जाता है| इसे IQ और EQ का योग कहा जाता है| कार्ल अल्ब्रेच (Karl Albretchके अनुसार जहाँ EQ वर्तमान से सम्बन्धित है, वही SQ भविष्य से सम्बन्धित हैकार्ल अल्ब्रेच ने तो इसे सफलता का विज्ञान ही कह दिया| मैं यहाँ यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि समाज के खिलाड़ी हमारी किन बुद्धिमताओं से खेलते हैं, यह जानने के  बाद आप मेरा बेहतर सहयोग कर सकते हैं

समाज के खिलाडी कई खेल खेलते हैं और कई खेल खेलवाते भी हैं| माहिर खिलाडी खेलते कम हैं और दूसरों को खेलवाते ज्यादा हैं| या यों कहे कि वे खेलते ही नहीं हैं, और सिर्फ खेलवाते ही रहते है| उनका ध्यान सिर्फ उनके अपने आदर्श पर होता है जिसे पूरा करने या पाने के लिए उनकी सुविचारित, सुनियोजित, और सुव्यवस्थित रणनीति, योजना होता है एवं चक्रव्यूह बनाते है| वे उद्देश्य या आदर्श से भटकते नहीं है, क्योंकि वह उनके रणनीति का हिस्सा होता है| हम तो डुगडुगी के निकलने वाली आवाज पर, उसके ध्वनि के उतार चढाव पर, उसके विभिन्न आवृति और उसके तरीको पर प्रतिक्रिया देने लगते हैंचूँकि हमें उस डुगडुगी के नेपथ्य का भाव पढ़ने नहीं आता है तो हमें लगता है कि यह हमें अपनी बुद्धिमता दिखाने की बेहतरीन अवसर दे रहा है| वास्तव में हम उस ध्वनि पर खेल ही नहीं रहे; हम नाच रहे हैं और हमें लग रहा है कि हम अपनी बुद्धिमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं| और हम जुट जाते हैं कि उनके तर्कों और तथ्यों को इतिहास में तथा वैधानिक प्रावधानों में गलत साबित कर देने में| यही तो वे चाहते है कि हम और हमारे लोग अपनी तथाकथित बुद्धिमता दिखाने के नाम पर  अपना पूरा समय, संसाधन और समर्पण झोंक दें| हम अपने बुद्धिमता से उनके बातों को तर्कहीन और तथ्यहीन करने ही वाले होते हैं कि वे डमरू से डुग डुगी के स्वर बदल देते हैं| हम उनके नए स्वर को तुरंत पहचान लेते हैं और उस ध्वनि को समझ भी जाते हैं| उनके विरोध में हम तुरन्त अपनी बुद्धिमता दिखाने को तत्पर हो जाते हैं| इस बुद्धिमता के उभार में हम अपना पूरा कौशल, समझदारी, समय और संसाधन झोंक देते हैं| फिर डुगडुगी का स्वर बदल जाता है| हम यह समझने का कोशिश ही नहीं करना चाहते हैं कि यह डुगडुगी क्यों बजाई जा रही है? यह मार्केटिंग का नया अवधारणा है| इसे आप विचारों का मार्केटिंग भी कह सकते हैं|

कभी कभी तो लगता है कि यदि डुगडुगी का स्वर नहीं बदला तो हमें अपनी बुद्धिमता दिखाने का अवसर ही नहीं मिलेगा| मेरा अचेतन इन आवाजों का ऐसा अभ्यस्त हो गया है कि इस डुगडुगी के आवाज नहीं सुनने पर मेरा मन बेचैन हो जाता है| हमें तो यह डर लगने लगता है कि हमारा सामाजिक और राजनितिक पहचान ही इसी से है और इस आवाज के नहीं बदलने से मेरा क्या होगा; यह मैं नहीं, मेरा अचेतन एवं अवचेतन मन कह रहा है| इसीलिए तो इसे अवसर मान कर हम और हमारे जुझारू लोग अपनी बुद्धिमता के जबरदस्त उपस्थापन में लग ही नहीं जाते, भिड भी जाते हैं और फतह हासिल करने के करीब पहुँच जाते हैं| ऐसा नहीं है कि हम और हमारे लोग गलत हैं; हम और हमारे लोग विद्वान हैं तथा फतह करने योग्य भी हैं| पर डुगडुगी के स्वर बदल जाते है और हम सबों की सामाजिक एवं राजनितिक पहचान बनी रह जाती है| यदि ऐसा नहीं हो तो हमें राजनितिक नेतृत्व थामने में भी कठिनाई होगी| ऐसा नहीं होने से लोग भावनाविहीन मुद्दों जैसे बेरोजगारी, गरीबी, असमानता और पिछड़ेपन से जुड़ने लगते हैं| यह भावनाविहीन मुद्दें लोगों के दिलों पर असर नहीं करते हैं और हमें भी लोगो को सम्हालने में कठिनाई होने लगती है|

लोग तो रोग के लक्षणों को ही रोग मानकर ईलाज करने लगते हैं| रोग क्या है यह जानने की कोशिश ही नहीं करते| एक अच्छा चिकित्सक रोग की पहचान करना चाहता है, जब रोग की पहचान कर लेता है तो ईलाज बहुत आसन हो जाता है| माना कि किसी को टाईफायड हो गया है| तब उसे बुखार आएगी| सामान्य लोग उस बुखार का ईलाज करते हैं और समस्या जटिल होती जाती है| जब तक रोग की पहचान नहीं हो, तबतक सब प्रयास बेकार है| अत: किसी समस्या के मूल पर जाईए, लक्षणों की ईलाज कर संतुष्ट नहीं हो| लक्षण से मूल रोग का पता लगाएं| सामान्य आदमी को यह सब समझना होगा| अन्यथा सबों का समय, साधन और धन बर्बाद होता रहता है|     

अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षिता का सिद्धांत देकर सामाजिक विज्ञान को भी उलझा दिया है| अब हमें सामाजिक विज्ञान में भी सापेक्षिता नजर आने लगती हैलोगो के सोच के अनुसार उनका नजरिया बदलता रहता है| लोगो का सोच भी उनके पृष्ठभूमि से निर्धारित होता है और उनका मेरे बारे में नजरिया भी उनके सोच से ही निर्धारित होता हैलोगो के सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्तर अलग अलग होते हैं और चीजो को समझने का नजरिया भी अलग अलग हो जाता हैयदि लोग मध्यम आर्थिक स्तर के होते हैं तो वे धार्मिक, राजनितिक और महिलाओं के चरित्र पर उनका निर्णय उनके भावनाओं के अनुरूप होता है; उनके बुद्धि के अनुरूप नहीं होता है|

 “दिमाग हमेशा दिल से हार जाता है अर्थात बुद्धिमता हमेशा भावनाओं से हार जाता है; यह मध्यम वर्ग के लिए ही ज्यादा सही होता है|”

इनकी एक खासियत होती है जिसके उल्लेख के बिना इनकी बात अधूरी रहेगी| ये मध्यम दर्जे में इसलिए हैं क्योंकि इनकी सामान्य बुद्धिमता ठीक रहती है और दूसरों के लिए सेवा देने योग्य होती है यानि किसी सेवा में होते हैं| इनकी सम्वेदनात्मक और सामाजिक बुद्धिमता की बात करने की हमें हिम्मत नहीं है| हाँ, इनकी एक विशेषता होती है| यदि धर्म, राजनितिक, और महिलाओं के चरित्र पर सामने वाले के मानसिकता के अनुकूल ही मैंने अपने विचार व्यक्त कर दिए तो उनकी नजरो में मैं बड़ा ही ज्ञानी, समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति होते हैं; पर यदि इन मुद्दों पर सामने वाले की मानसिकता से भिन्नता हुई तो उनके लिए मैं पढ़ा- लिखा एक अच्छा डिग्रीधारी होते हुए भी निपट मुर्ख और बेहूदा व्यक्ति हूँ|

अब आप समझ गए होंगे कि मैंने धर्म, राजनितिक, और महिलाओं के चरित्र की बाते क्यों कीसमाज का सवर्जन और कतिपय उच्च वर्ग भी मध्य वर्ग को ही प्रबुद्ध मान कर चलता है| यदि आपने इस प्रबुद्ध वर्ग की मानसिकता और अचेतनता एवं अवचेतनता को समझ लिया तो निश्चित है कि डुगडुगी वाले भी इसको समझते ही होंगेइस तरह उनको डमरू बजाने में सहुलिअत होती है| बस, उन्हें इतना ही ध्यान रखना होता है; हम और हमारे लोग हर ताल एवं सुर पर उनका पुरे मनोयोग से साथ देगे और हम एवं हमारे लोग अपनी सम्पूर्ण बुद्धिमता पूरी तन्मयता से उस डुगडुगी पर उढ़ेल देंगे| ये मध्य वर्ग चूँकि आस्थावान होते है, और इसीलिए तर्क एवं विश्लेषण से दूर रहते है| सामान्यत: इनमे विश्लेषणात्मक और तार्किक क्षमता कम होती है और इसीलिए ये आस्थावान भी होते हैं| वे इलेक्ट्रोनिक डिब्बे पर आकर्षक चेहरों द्वारा कहे गए बातों पर पूरा भरोसा करते हैं| मैं सामान्य अपवादों की बात नहीं कह रहा हूँ, मैं तो सामान्य विश्लेषण कर रहा हूँ ताकि आपको  मेरे सम्बन्ध में निर्णय लेने में सुविधा हो|

अब हम सवाल कर रहे हैं कि तब हमें क्या करना चाहिए? क्या हमें डुगडुगी पर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या हमें विरोध नहीं करना चाहिए? वे तो आपके विरोध को विरोध ही नहीं मानते| वे तो इसे मानते कि आप उनके उलझन में खेल खेल कर भटक गए हैं और उनके योजना के अनुसार ही खेल रहे हैं| जंगल में शेर जंगल के अन्य पशुओं के शिकार के लिए पहले उसे दौड़ा- दौड़ा कर थका देते हैं, और फिर आराम से शिकार कर लेते हैं| लगता है कि आप भी दौड़- दौड़ कर जल्दी ही थकने वाले हैं| जो थोड़े तथाकथित बुद्धिमान हैं, वे इस खेल में अपना समय, समर्पम, और संसाधन झोंक रहे हैं| उनको और क्या चाहिए? उनकी योजना और रणनीति उनको उनके लक्ष्य तक  पहुंचा रहा है|

हमें समझना है कि वह डुगडुगी बजाने वाला कौन है? क्या वह एक व्यक्ति है या एक संस्था? यदि वह व्यक्ति है तो वह उस गड़ेरिये के समान है जिसके सन्दर्भ से बाहर होते ही कोई भी उसके भेड़ को बिना किसी प्रतिरोध के उठा ले सकता है| यदि वह साधारण डुगडुगी वाला है तो उसका कोई आदर्श नहीं है| क्योकि जिसका भी आदर्श होता है,वह संस्था वाला हो जाता है| किसी आदर्श के बिना संस्था हो ही नहीं सकता, भले हमें जानने एवं समझने नहीं आता है| परन्तु वह डुगडुगी वाला एक संस्था का समर्पित कार्यकर्त्ता है तोसंस्था है तो उसका स्पष्ट निहित आदर्श होगा, भले हमें देखना और समझना नहीं आएभले संस्था के आदर्श बाहरी (दिखावटी) और अंदरूनी अलग अलग हो जैसे हाथी के बाहरी दांत और अंदरूनी दांत अलग अलग होते हैंजिसका भी आदर्श होगा, निश्चित ही उसका संगठन भी होगा| संगठन है तो निश्चिततया उसके कई कार्यशील एवं समर्पित इकाइयां होगी| जिसके आदर्श होते हैं, जिसके पास संस्था होते हैं| और जिसके पास संगठन एवं विभिन्न अंग होते है, तो निश्चिततया ही उनके पास उस आदर्श को पाने का समयबद्ध, निश्चित, सुनियोजित, सुविचारित योजना होगा और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज होगी|

तो मैं आपको डरा नहीं रहा हूँ| मैं आपको भी उसके लिए एक रणनीति समझा रहा हूँ| बड़े कारपोरेट का कभी खेल समझने की कोशिश करें| यदि आप उसके आदर्श को ही शून्य या उसे समाप्त कर दें तो? तो वह संस्था भी बेकार हो जाएगा यानि शून्य हो जाएगा और उसको या तो उत्पाद बदल देना होगा या संस्था को ही बंद कर देना होगा| तब वह संगठन भी बिना मतलब का हो जाएगा| तब उसके भेड़ को कोई भी उठा ले सकता है, आप भी| क्या यह संभव है? इस पर कभी किसी ने विचार नहीं किया| “आउट ऑफ़ बॉक्सतो  हमारे नजरिए से ही बाहर है| कभी इस पर भी विचार होअल्बर्ट आइंस्टीन ने समय और स्थान के सन्दर्भ में गुरुत्व के प्रभाव में समय एवं स्थान को ही मोड़ दियाकहने का तात्पर्य यह है कि सबकुछ संभव है| पर यह संभव के बारे में सोचने से ही शुरू हो सकता है| संभव  के बारे में सोचा जाए|

लगता है हमें उनके डुगडुगी पर प्रतिक्रिया बंद करनी चाहिए और उसके आदर्श पर ही चोट करनी चाहिए| इसके लिए हमें उसका आदर्श समझना होगा| तब उसके आदर्श की तथाकथित सत्यता की जांच करनी होगी| आप विमर्श तो करें| डुगडुगी वाला कौन है और उसका आदर्श क्या है? इसे आप अपने समाज में, व्यवस्था में, संस्थान में या अंतर्राष्ट्रीय व्यापकता पर इस्तेमाल कर सकते हैं|

अब आप बताएँ कि हमारी बुद्धिमता कहाँ है? वैसे मैंने इस हममें आपको भी शमिल कर लिया है| यह समान रूप से आप पर भी लिखा गया है| आपका डुगडुगी पर कैसा प्रतिक्रिया होता है? क्या आप डुगडुगी के मूल तक पहुँच सकते हैं? इतिहासकार ई० एच० कार कहते हैं कि इतिहास तथ्यों और इतिहासकार के मिलने से बनता है| वे कहते हैं कि किसी इतिहास को समझने के लिए इतिहासकार के भावों को पढ़िए| यदि आप यह नहीं पढ़ पाते हैं तो आपका इतिहास बोध नहीं है या आप बहरा हैं| यही हमारे साथ लागु होता है| आप बुद्धिमान दिखना चाहते हैं या समाज को रूपांतरित करना चाहते हैं? थोडा रुक कर इस पर गंभीर विचार करे|

ई० निरंजन सिन्हा                                                                   

व्यवस्था- विश्लेषक एवं चिन्तक|

बुधवार, 5 अगस्त 2020

सामाजिक संघर्षों की सफल रणनीति

यदि आपको सामाजिक संघर्षों में दमदार सफलता पानी हो, तो यही एक मात्र रणनीति है, जो आपको निश्चित सफलता दिलाएगी| बाकी तमाशा करने के लिए बहुत मजेदार है| यह भी निश्चित है कि इन तमाशों में तालियाँ भी खूब गडगड़ाती है| विषय गंभीर है|

संघर्ष यानि लड़ाई सामाजिक मुद्दों की हो, तो इसके मूल को ही ‘सांस्कृतिक’ मुद्दा कहा जाता है| जब बात सांस्कृतिक मुद्दों की होती है, तो यह अपने में सामाजिक मुद्दों के अलावे, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक आदि कई मुद्दों को अपने में समेट लेती है| सामाजिक लड़ाईयों में मुद्दा समाज के हित में परिवर्तन या रूपांतरण का होता है| जब समाज ही लक्ष्य है, तो इसका स्पष्ट मतलब है कि एक बड़ी आबादी इसके लक्ष्य में समाहित है| समाज का एक बड़ा हिस्सा ‘भीड़’ के रूप में होता है, जिसकी मनोवैज्ञानिक ढांचा एवं संरचना ही सामान्य लोगों से भिन्न रहती है|

एक कहावत है कि ‘भेड़’ को, यानि भेड़ों के झुण्ड को हथियाने से पहले ‘गड़ेरिया’ को ही संदर्भ से बाहर निकलना होता है। ‘गड़ेरिया’ के उपस्थिति में उसके समर्थक एवं रक्षक कुत्ते भौंकते हैंदौड़ाते हैंकाटते हैं और आपको भगा भी देते हैं। इसके अतिरिक्त गड़ेरिया भी आपका दुश्मन बन जायगा| दरअसल ‘भेड़’ और ‘भीड़’ का स्वभाव, प्रकृति एवं प्रवृति भी एक ही समान होता है| मतलब कि ‘भीड़’ का गड़ेरिया भी भेड़ के ही गड़ेरिया के समान होता है|  तो सबसे अहम सवाल यह है कि गड़ेरिया कैसे कैसे होते हैं? उसकी प्रकृति क्या है, और उसकी क्रियाविधि क्या है? उसी की प्रकृति एवं प्रवृति के अनुरूप ही उस पर विजय पाने की रणनीति काम करेगी और उस पर विजय हासिल होगी|

गड़ेरिया या तो एक ‘व्यक्ति’ होगा, या ‘व्यक्तियों का एक समूह’ होगा, या कोई एक “संस्था” (Institution) होगा| यहाँ तीन स्थिति है, और तीनों का स्वभाव एवं प्रकृति अलग अलग है – व्यक्ति, समूह एवं संस्था| एक व्यक्ति सीमित मात्रा में ही काम कर सकता है, भले ही वह एक समूह के रूप में कार्य करे या एक व्यवस्था के रूप में कार्य करे| एक व्यक्ति के मामले में उस व्यक्ति विशेष का भौतिक अस्तित्व ही सब कुछ है, और उसकी कोई भिन्न एवं स्पष्ट, सशक्त विचारधारा नहीं होती है| इनके मामले में कोई समूह भी मात्र सलाहकार की हैसियत में, या भूमिका में ही होते हैं| आपने भी देखा होगा कि मामले चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक हो, ऐसे लोगों का, यानि ऐसे गड़ेरिये का प्रभाव क्षेत्र कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित होता है| इन सीमित क्षेत्रों को कुछ लोग क्षेत्र या प्रान्त भी कहते हैं| ऐसे व्यक्ति विशेष गड़ेरियों को सन्दर्भ से बाहर करने के लिए उन्ही व्यक्ति विशेष को घेरे में लेना होता है|

इस ‘घेरे में लेने’ की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा प्रचलित तरीका उन पर ‘भ्रष्टाचार’ का आरोप लगाना होता है, चाहे आरोप तथ्य आधारित हो या बेबुनियाद हो| यह तरीका सबसे सरल, साधारण और सवसे ज्यादा प्रचलित है| आरोप तीखा और संवेदनशील होना चाहिए, उसकी सत्यता के तथाकथित जाँच में ही दशकों के समय को निकाल दिया जा सकता है, या निकाल दिया जाता है| यदि कम समय में ही उस तथाकथित जाँच के परिणाम आ भी जाय, और परिणाम उस व्यक्ति विशेष के पक्ष में ही आ जाय, तो आरोपकर्ता एक माफीनामा दाखिल कर देता है और उसे काफी मान लिया जाता है, लेकिन तबतक काफी खेल बिगाड़ दिया जा सकता है| उस व्यक्ति का यानि उस गड़ेरिये का ‘चरित्र हनन’ करना भी एक सशक्त उपाय है| इसीलिए उस व्यक्ति या उसके परिवार के ही किसी मुख्य एवं नजदीकी सदस्य के चरित्र हनन करना या करवाना भी एक प्रचलित एवं आसान कदम हो सकता है| इस चरित्र हनन में कुछ मूर्खतापूर्ण एवं अज्ञानतापूर्ण बातें या हरकतें करने का, भले ही नकली हो, एडिटेड हो, मनगढ़ंत हो, आरोप शामिल किया जा सकता है| यदि आपका मीडिया प्रबंधन मजबूत हो और आपके प्रभाव में हो, तो झूठ –पर- झूठ  लगातार प्रसारित प्रचारित करने से भी वह सत्य का प्रभाव बनाता है| हिटलर भी कहा करता था कि किसी के विरुद्ध एक ही झूठ कई तरीके से बार बार बोला जाय, तो वह ‘झूठ’ भौतिक चट्टान की तरह मजबूत, सशक्त, कठोर और अटल बन जाता है|

यदि भेड़ या भीड़ का गड़ेरिया भी एक समूह है, समुदाय है, या गिरोह है, तो इसका भी स्वाभाव, प्रवृति एवं प्रकृति भी मौलिक रूप में एक व्यक्ति विशेष की ही होती है| और इसीलिए ऐसे समूह, समुदाय, या गिरोह पर भी नियंत्रण के लिए व्यक्ति विशेष के ही नियम प्रभावी होते हैं, जैसे भ्रष्टाचार र्के आरोप, चरित्र हनन के आरोप, विदेशी एजेंट होने के आरोप लगाये जा सकते हैं| लेकिन विदेशी एजेंट के आरोप में उस सम्बन्धित देश की औकात आदि का ध्यान रखना होता है, जो स्वयं ही एक संवेदनशील मामला होता है, और इसीलिए इस हथियार का प्रयोग कम ही किया जाता है, या नहीं ही किया जाता है|

गड़ेरियों की तीसरी श्रेणीं सबसे प्रमुख एवं महत्वपूर्ण है| यह “संस्था” (संस्थान नहीं) के स्वरुप में होती है| स्पष्ट है कि इसमें कोई भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह महत्त्वपूर्ण या प्रमुख नहीं होता है| कोई भी संस्था का निर्माण किसी स्पष्ट आदर्श की स्थापना एवं उसकी प्राप्ति के लिए ही होता है, अन्यथा संस्था की आवश्यकता ही नहीं होती| यह आदर्श एक स्पष्ट विचार धारा होता है, या एक स्पष्ट विचारधारा पर आधारित होता है, या एक जीवन दर्शन होता है, और इसी आदर्श के केंद्र बिंदु के परिधि में पूरा संगठन कार्य करता हुआ होता है| एक ‘संस्था’ में व्यक्ति आते जाते रहते हैं, परन्तु ‘संस्था’ का आदर्श जीवित रहता है, स्थिर रहता है, कार्यरत रहता है और पूरे संगठन को प्रेरणा देता रहता है|

इसीलिए ऐसे संस्था के कई अंग होते हैं, लाखों करोड़ों समर्पित सदस्य या समर्थक हो सकते हैं| यह भी सुनिश्चित है कि ऐसे संस्था के पास अपार धन होता है, संसाधन होता है, कई संगठन होते हैं, कई प्रभावकारी एवं नियंत्रणकारी यन्त्र होता है और यह पूरे तंत्र को भी संचालित करा हुआ हो सकता है| इसीलिए ऐसे संस्था का प्रभाव क्षेत्र किसी सीमित क्षेत्र तक सीमित नहीं होता है, बल्कि एक ही साथ बड़े एवं विस्तृत क्षेत्रों में यानि विभिन्न प्रान्तों में भी फैला हो सकता है| इसके समर्थक उस देश से बाहर भी हो सकते हैं| विचार का यही आधार उन संस्थानों को विस्तृत क्षेत्रों में यानि विभिन्न प्रान्तों में फैलने का आधार होता है, और इसके उदाहरण आप राजनीति के क्षेत्र में भी आसानी से देख सकते हैं|

यही ‘आदर्श’, यानि यही ‘विचार धारा’ ही उस संस्था का ‘आत्म’ (Self) या प्रचलित ‘आत्मा’ (Soul) होता है|  मतलब यही आदर्श यानि विचार धारा ही उस संस्था का प्राणशक्ति होता है, यही उस आदर्श, यानि विचार धारा में ही निहित है, और उससे बाहर कहीं नहीं है| अत: संस्थागत गड़ेरिये को नियंत्रण में पाने के लिए किसी भी व्यक्ति या उनके समूह के विरुद्ध लड़ाई की जरुरत नहीं होती है, और उसके किसी भी अंग पर नियंत्रण पाने की जरुरत नहीं होती है| आप यहाँ तक कह सकते हैं कि उन अंगों की किसी भी मुद्दों पर भी प्रतिक्रया देने की भी जरुरत नहीं होती है| आप उनके मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रया देकर अपना समय, धन, संसाधन, उर्जा, वैचारिकी, और अपनी जवानी (उत्साह) को झोके जा रहे हैं और अपने लोगों को भी उसी में डुबाये जा रहे हैं| उनका तो कुछ ठोस बिगड़ता नहीं है और आप आसानी से उनसे नियंत्रित होते रहते हैं| तब विरोध का खेल चलता रहता है, और वे आपके ‘नादानी’ का ‘चाय के चुस्की’ लेते रहते हैं| तब आपको भी एक सशक्त क्रान्तिकारी होने का सुखद भ्रम या बहम का अहसास होता रहता है|

इस संस्था के नायक का महत्व किसी व्यक्ति विशेष गड़ेरिए का नहीं होता है। किसी ‘सं’स्था’ में सिर्फ वह ‘आदर्श’ और ‘दर्शन’ ही महत्वपूर्ण होता है, जिसके लिए वह संस्था स्थापित और कार्यरत हैं। ऐसे संस्था का नेतृत्वकर्ता अहम नहीं होताआदर्श और दर्शन महत्वपूर्ण होता है। ऐसे संस्था के सैकड़ों कार्यरत एवं सक्रिय अंग होते हैं। वे मुद्दे बनाते हैं और उसके विरोधी उसमें उलझते जातें हैं। इन विरोधियों को लगता है कि उनका तर्क और तथ्य मजबूत और कारगर है एवं कोई फतह के निकट है। पर फिर मुद्दा ही बदल जाता है। इन हवा हवाई क्रांतिकारियों का कोई स्पष्ट एवं सुनिश्चित सकारात्मक एवं सृजनात्मक कार्य योजना नहीं होता, और ये बौद्धिक सिर्फ प्रतिक्रिया देने तक ही अपने को क्रान्तिकारी बनाते एवं समझते हैं| स्पष्ट है कि ऐसे बौद्धिक एक संसाधन सम्पन्न, सक्षम एवं सक्रिय ‘संस्थागत किले’ के सामने असहाय होते है। किसी भी संस्थागत तंत्र की कार्य प्रणाली भी काफी प्रतिभाशाली और सशक्त होती है, इसे भी समझना चाहिए। मार्केटिंग (चाहे वे आदर्शों या विचारों का हो) के वैश्विक माने जाने वाले गुरु फिलिप कोटलर कहते हैं कि आज ‘सूचनाओं का युग’ नहीं है, बल्कि ‘ सूचनाओं को शेयर करने’ का युग है।

अन्त में, यह स्पष्ट है कि उस संस्थगत गड़ेरिये पर नियंत्रण पाना सबसे आसन और सरल होता है| आपको सिर्फ उस आदर्श, यानि उस विचार धारा पर नियंत्रण पाना होता है| आपको सिर्फ उस आदर्श को, यानि उस विचार धारा को ही अतार्किक, तथ्यहीन, साक्ष्य विहीन, गैर ऐतिहासिक, अवैज्ञानिक, अमानवीय, गलत और झूठ आधारित प्रमाणित कर देना है| बस, उस संस्था की ही कहानी खत्म| तब उस संस्था के सभी अंग, सभी संसाधन, सभी व्यक्ति एवं समूह प्रयोजन विहीन हो जाते हैं, मतलब उस “संस्थागत गड़ेरिये” की ही जरुरत नहीं होती है, उसकी कोई उपादेयता ही नहीं होती है| चूँकि इस संथागत ढाँचा में कोई व्यक्ति, या कोई व्यक्ति समूह, या कोई अंग, या कोई समर्थक महत्वपूर्ण नहीं होता है, और इसीलिए इनमे में से किसी भी पर कोई ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती| ये सभी उस संस्था के कठपुतली मात्र होते हैं| और यह संस्था उस आदर्श, यानि उस विचार धारा पर ही टिका हुआ होता है| इस तरह वह ‘संस्था” अपने ढांचे के साथ, अपनी संरचना के साथ पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है|

निष्कर्ष यही है कि यदि उस ‘संस्थागत गड़ेरिये’ (जो काफी मजबूत है, सशक्त है, प्रभावशाली है) का आदर्श और दर्शन ही शून्य हो जाए, यानि वह आदर्श और दर्शन ही बकवासनिरर्थकसंदर्भविहिन और गलत साबित हो जाए, तो?

तब वह संस्था ही शून्य  हो जाएगा।

सारा खेल समाप्त।

विचार करें।

गंभीर विचार करें।

निरंजन सिन्हा

आचार्य प्रवर निरंजन 

डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी में सम्बन्ध

डॉ हेडगेवार एक भारतीय नायक रहे हैं, जिन्होंने भारत में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की| यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा ‘नागरिक समाज’ ...