हमारा प्रत्येक सत्य हमारे पूर्वाग्रहों और मान्यताओं का प्रतिबिम्ब
होता है| हमें उस अपने पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में वही सत्य दिखता है, जिसे हम
सत्य मानते होते हैं| किसी तथ्य के प्रति जैसा हमारा मानना होता है, वैसा ही हमारा
सत्य होता है| इस तथ्य के सत्य के घेरे में लगभग हम सभी लोग आ जाते हैं| इस सत्य
का आधार हमारा ज्ञान और हमारी समझदारी होता है, जिसे हम अन्तिम रुप में जानते और
मानते होते हैं| हमारे ज्ञान और समझ का जो स्तर हमारा है, वही ज्ञान और समझ मेरे
लिए अन्तिम सत्य होता है| यह ज्ञान और समझ समय के साथ सुधरता रहता है या बदलता
रहता है, यदि हम बदलने को सगज हो| हमारा अन्तिम ज्ञान और हमारी अन्तिम समझ हमारे
किए अन्तिम सत्य होता है, क्योंकि यही मेरा पूर्वाग्रह मुझे समझाता है| कोई भी
व्यक्ति पढ़ा लिखा है, या अशिक्षित है, उनके सत्य के निर्धारण में उनकी पूर्वाग्रहों
और मान्यताओं की ही भूमिका प्रमुख होती है|
इसे एक उदाहरण से समझें| मैंने एक बार बुद्ध की एक बात लिखी,
जिस पर एक तथाकथित ज्ञानी ने आपत्ति किया|| आपत्ति कर्ता ज्ञानी ने तुरन्त यह सवाल
किया कि यह बात यदि बुद्ध की है, तो यह त्रिपिटिक के किस भाग और किस सूक्त में लिखित
है? वह ज्ञानी त्रिपिटिक को ऐसे बता रहे थे, मानों स्वयं किसी बुद्ध ने उस पुस्तक
को लिखा हो, और उस त्रिपिटिक के बाहर की कोई बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| वह ज्ञानी भाषा और साहित्य के ‘विखंडनवाद’ (Deconstructionism)
की समझ नहीं दिखा रहा था| उन्हें इसका भी ज्ञान नहीं था, कि ‘हर इतिहास समकालिक
होता है’| बीते हुए काल का कोई विवरण या ब्यौरा ‘इतिहास’ की सामग्री हो जाती है|
इतिहास की हर सामग्री का जब लेखन या संपादन होता है, तब उन सभी सामग्रियों को
समकालिक स्थितियों और शक्तियों के अनुरप हो जाना होता है| ऐसे हर लेखन में उसका
लेखक ‘विखंडनवाद’ के प्रभाव में भी होता है| तब वह हर तथ्य, जो उस पुराने पुस्तक
में दर्ज था, उस लेखक के पूर्वाग्रहों और मान्यताओं’ के अनुकूल हो जाता है|
बुद्धि की यह बात भी मेरे पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में ‘सत्य’
था| बुद्धि की इस बात को मैंने बुद्ध की बात क्यों बतायी? वैसे डा आम्बेडकर अपनी
पुस्तक – ‘बुद्ध और उसका धम्म’ की भूमिका में लिखते हैं, कि जो बात बुद्धि की नहीं
है, वह बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| अर्थात उस समकालिक दुनिया में हरेक बुद्धि
की बात ‘बुद्ध’ की बात थी| यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हर बुद्धिवादी ‘बौद्ध’
है|
यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ‘बुद्ध’ एक व्यक्ति भी
रहे और बुद्ध एक संस्था भी थे| सिद्धार्थ गोतम ‘बुद्ध’ की संस्था की परम्परा के
अंतिम और 28 वें 'बुद्ध'' माने गए| सिद्धार्थ गोतम को अपने 35वें वर्ष में ‘बुद्धत्व’ की
उपाधि प्राप्त हुई थी| ‘बुद्धत्व’ एक उच्चस्थ, उत्कृष्ट एवं विशिष्ट बुद्धि –प्राप्ति
की उपाधि थी| अन्तिम बुद्ध के मृत्यु (महापरिनिर्वाण) के एक सौ साल बाद सभी
बुद्धों के वचनों का संग्रहण करने के लिए प्रथम संघ बुलाने का दावा किया गया| इस
संघ के बाद ही बुद्ध –वचनों के संग्रहण का कार्य शुरु हुआ होगा| बताया गया कि सभी
बुद्धों के वचनों का संग्रहण त्रिपिटक में किया गया है|
वैसे सभी सत्य सापेक्षिक होता है, क्योंकि संदर्भ बदलने से
सत्य बदल जाता है| लेकिन यह बात पूर्वाग्रह के प्रतिबिम्ब की बात से एक अलग विषय
है| बुद्ध ने बताया कि इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य है, कि ‘कुछ भी सत्य नहीं है|’
हर चीज, यानि हर तथ्य हर क्षण बदलता रहता है, जिसे ‘क्षणिकवाद’ कहा गया| अल्बर्ट
आइन्स्टीन ने समय को भी सापेक्ष बता दिया| वैसे आज तक ब्रह्माण्ड के हर चीज को चार
विमाओं (Dimensions) के सापेक्ष ही समझा जाता रहा है, लेकिन गणितीय संगणनाओं में
कुल ‘12’ विमाओं के अस्तित्व का पता चलता है| इन सभी के या इनके कुछ अवयवों के
सापेक्ष तो ‘सत्य’ और फिसलता रहेगा| स्पष्ट है कि एक ही तथ्य बदलते व्यक्तियों के
सापेक्ष बदल जाता है|
‘ईश्वर’ है, या नहीं है? यह भी तथ्य से सम्बन्धित ‘सत्य’ का
प्रश्न है| दोनों तरह के उत्तर सही है, या दोनों तरह के उत्तर गलत है| लेकिन ‘सत्य’
के ये पक्षधर भी ‘ईश्वर’ की अवधारणा को स्पष्ट परिभाषित किये बिना ‘गलत’ और ‘सही’
करते रहते हैं| हालाँकि दोनों के सत्य दोनों के लिए सही है| दोनों ‘सत्य’ के प्रभाव
सकारात्मक मिलते हैं| दोनों ही अपनी मान्यताओं में सही होते हैं, सत्य में भी सही
होते हैं और प्रभाव में भी सही होते हैं| यह सब उनके पूर्वाग्रहों का प्रतिबिम्ब
मात्र हैं|
इसलिए प्रत्येक का सत्य (Truth) अलग अलग होता है| प्रत्येक का
सत्य उनके लिए सही (Correct) भी होता है और उनके लिए प्रभाव भी डालता है| चिकित्सा
विज्ञान की भाषा में ‘प्लेसीबो प्रभाव’ (Placebo Effect) यही है, जिसका प्रभाव
वैज्ञानिक ढंग से स्थापित है| मैं अकसर कहता हूँ कि एक ही तथ्य के अनेक सत्य होते
हैं और सभी सही भी होते हैं| इस विवाद का कोई मतलब नहीं होता है कि हमारा सत्य सही
है और तुम्हारा सत्य मूर्खतापूर्ण है| कुछ ‘मूर्ख’ लोग इसीलिए दूसरो को ‘मूर्खता’ का
प्रमाण पत्र बाँटते रहते हैं| ऐसे लोग ‘टिटहरी’ की तरह अपने पैरो पर आसमान को
टिकाये हुए होते हैं|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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