रविवार, 11 जनवरी 2026

बुद्धि की उत्पत्ति "स्थिरता" से होती है

 बुद्धि को केवल आंकड़ों या सूचनाओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता। बुद्धि की उत्पत्ति एवं विकास सिर्फ चेतना की 'स्थिरता" की अवस्था में हो सकता है।

मन और चित्त अक्सर अतीत और भविष्य के बीच झूलता रहता है| मन और चित्त को चेतना कहते हैं। चेतना बीते हुए कामों पर पछतावा करता है या आगे की योजनाओं को लेकर चिंतित रहता है| चेतना को नियंत्रित करने की जितनी कोशिश की जाती है, उतना ही वह प्रयास थका देने वाला और व्यर्थ हो जाता है। यही कारण है कि ध्यान इतना आवश्यक है। ध्यान के माध्यम से चेतना स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है| यह  हमें अपनी सहज बुद्धि तक पहुँच प्रदान करता है। यही वह क्षण होता है, जब जागरूकता सूचनाओं को संसाधित करने के साथ अपने अंतर्ज्ञान को सुनने की ओर मुड़ जाता है। ध्यान एक विधि है, साधन है, यह कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है| चूँकि यह साधन है, इसीलिए यह अवस्था ‘साधना’ कहलाता है|

ध्यान एक विधि मात्र है, जो उस बुद्धि तक पहुँचने का उपागम (Approach) देता है| बुद्धि चेतना का एक स्तर है| चेतना का प्राथमिक स्तर संवेदनशीलता है| यह संवेदनशीलता उर्जा के प्रवाह से, यानि उर्जा के स्थिति –परिवर्तन से प्रारम्भ होता है| यह चेतना का प्राथमिक और मूल स्तर हुआ| इस तरह, यह बुद्धि का प्रारम्भिक स्तर हुआ| इन संवेदनाओं से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं, जो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्राप्त और संसाधित (Process) किए जाते है| ज्ञानेन्द्रियाँ या तो शारीरिक हो सकते हैं, या मानसिक, या आध्यात्मिक, या इनका एक निश्चित संयोजित स्वरुप| इन ‘संकेतों’ के व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| इन ‘सूचनाओं’ के व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं|

कोई भी ‘ज्ञान’ एक ऐसी अवस्था है, जो उसके किसी उपयोग और प्रयोग की दशा एवं दिशा से निरपेक्ष होता है| जब कोई अपनी आवश्यकता या मंशा के अनुरुप उस ज्ञान का उपयोग या प्रयोग करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है| किसी ‘ज्ञान’ का किसी व्यक्ति के द्वारा किसी विशेष प्रयोजन के लिए किया गया उपयोग या प्रयोग ही ‘बुद्धि’ है| जब कोई ‘ज्ञान’ का उपयोग एवं प्रयोग सिर्फ ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यदि कोई ‘ज्ञान’ किसी को अचानक प्रकट होता है, तो वह ‘ज्ञान’ उसका ‘अंतर्ज्ञान’ (Enlightenment) कहलाता है| इसे ‘अनन्त प्रज्ञा’ से उत्पन्न माना जाता है|

तो प्रश्न यह है कि इस ‘बुद्धि’ का उत्पादन या चेतना के स्तर के विकास में ‘स्थिरता’ क्यों आवश्यक है, और यह ‘स्थिरता’ कैसे काम करता है?  

‘स्थिरता’ को ‘ठहर जाना’ भी समझा जाना चाहिए| यह शांत चित्त की अवस्था होता है| इसे एकाग्रता की अवस्था माना जाना चाहिए| यह मन एवं चित्त का स्थिर संतुलन है| यह प्रज्ञा की पूर्वशर्त है। बुद्ध के अनुसार, समाधि से प्रज्ञा उत्पन्न होती है| चेतना की स्थिरता से ही विवेकशील बुद्धि जन्म लेती है। चंचल चेतना सत्य को ग्रहण नहीं कर सकता। यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि बुद्धि केवल जानकारी नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझ है।

आधुनिक मनोविज्ञान इस कथन की पुष्टि करता है कि जब चेतना तनाव, भय या आवेग में होता है, तब निर्णय क्षमता घट जाती है। चेतना की शान्ति यानि भावनात्मक स्थिरता और संज्ञानात्मक नियंत्रण से बेहतर तर्क, गहन विश्लेषण और दीर्घकालिक सोच संभव है। स्थिर मानसिक अवस्था में मस्तिष्क उच्च स्तर पर कार्य करता है।

सामान्य समाज में प्रतिक्रियाएँ अधिक होती हैं, समझ कम। स्थिर परिस्थितियों में व्यक्ति अनुभवों को आत्मसात करता है, उनसे सीखता है और यहीं से बुद्धि विकसित होता है। ‘स्थिरता’ का अर्थ कोई ‘जड़ता’ नहीं होता है, बल्कि यह ‘गति’ की दिशा को क्षैतिज अवस्था से उर्घ्वाकार अवस्था में ले जाना होता है| इससे कोई उसकी गहराइयों में उतरता है| यह दिशाओं की अवस्था में एक आवश्यक संतुलन बनाना होता है| यह भी स्पष्ट समझना आवश्यक है कि पूर्ण निष्क्रियता बुद्धि नहीं, बल्कि सजग स्थिरता बुद्धि को जन्म देती है। यह चेतनाओं की संवेदनशीलता का स्थिरीकरण हुआ| यही ‘मन’ एवं ‘चित्त’ का स्थिरीकरण है| स्थिरता ही बुद्धि की गहराई, परिपक्वता और विवेकशीलता देता है| यह सब मन की स्थिरता से ही संभव है| चंचलता जानकारी दे सकती है, लेकिन बुद्धि नहीं|

आधुनिक न्यूरोसाइंस यह मानती है कि बुद्धि सिर्फ मस्तिष्क या इसके किसी एक निश्चित भाग में स्थित नहीं होना माना जा सकता| यह ऊर्जा की या संकेतों या सूचनाओं के नेटवर्क (Network) की स्थिर एवं संतुलित गतिविधि से उभरती है। यही नेटवर्क आत्मचिंतन, अर्थ-निर्माण, तर्क, योजना, समस्या समाधान और ‘क्या महत्वपूर्ण है’, यह तय करता है| इन तीनों नेटवर्कों के बीच संतुलन (Switching) करना ही स्थिरता है| स्थिर मन में तीनों नेटवर्क ‘समरसता के समन्वय’ (Coherent Rhythm) में काम करते हैं| यहीं से ज्ञान और बुद्धि निकलती होती है

यदि कोई अपने मन एवं चित्त को स्थिर नहीं करता होता है, तो उसके तंत्रिका तंत्र में और उसके इस नेटवर्क में ‘संकेतों’ का स्वाभाविक शोर (Neural Noise) होता रहता है| यह संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित बौछारों से उत्पन्न होती है| संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित बौछारों से सूचना स्पष्ट नहीं रहती, प्राथमिकता निश्चित नहीं होती, और इसीलिए सम्बन्धित निर्णय भ्रमित होते हैं| स्थिर अवस्था में न्यूरॉन्स समुचित, लेकिन सटीक सम्प्रेषण करते हैं, जिससे संकेत एवं सूचनाएँ सामान्य शोर की अपेक्षा बेहतर शांत अनुपात के माहौल में होते हैं| इसी से गहरी समझ, सूक्ष्म अंतर पहचानने की क्षमता और रचनात्मकता उत्पन्न एवं विकसित होता है| स्पष्ट है कि बुद्धि का जन्म कम शोर (Low Noise) वाली अवस्था में होता है।

स्थिरता व्यक्ति में कुछ निश्चित हार्मोन्स छोडती है, जो बिना नाली –प्रणाली के पूरे शरीर में फ़ैल कर स्थिरता पैदा करता है| स्थिरता में डोपामिन (Dopamine) का स्राव समुचित मात्रा में होता है, जो सीखने की प्रेरणा देती है। सेरोटिनीन (Serotonin) का स्राव भावनात्मक संतुलन बना कर दीर्घकालीन निर्णय लेने की सक्षम देता है| कोर्टोसिल (Cortisol) हार्मोन स्मृति और सीखने की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है| बुद्धि तब उभरती है, जब इन हार्मोन्स में समुचित संतुलन (Neurochemical balance) होता है| उत्तेजना की अवस्था में यह संतुलन अनियंत्रित और उग्र हो जाता है|

स्थिरता ही सीखने की शर्त है| स्थिरता ही सीखने का माहौल बनाता है| स्थिरता जड़ता नहीं है, बल्कि स्थिरता ही ‘मन’ एवं ‘चित्त’ को ‘लचीलापन’ (Plasticity) देता है| न्यूरोप्लास्टीसिटी (Neuroplasticity) के लिए सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण चाहिए, जो स्थिरता लाने का माहौल दे सके| तनाव की अवस्था में मस्तिष्क अपनी उत्तरजीविता (Survival) बनाए रखना चाहती है और इसीलिए यह जड़ हो जाती है| इससे नए सीखने के लिए लचीलापन कम हो जाता है| इसलिए गहरी बुद्धि संघर्ष की तीव्रता से नहीं, बल्कि स्थिर अभ्यास से बनती है।

अल्बर्ट आइन्स्टीन ‘समय’ के ‘पतले होने’ या फ़ैल जाने (Dilation) के सम्बन्ध में बताते हैं| यह ‘समय’ का ‘कम होना’ या ‘बढ जाना’ नहीं होता है| यह ‘समय’ का सिकुड़ जाना’ या ‘फ़ैल जाना’ होता है| न्यूरोसाइंस बताता है कि अस्थिर चेतना में समय सिकुड़ जाता है और स्थिर चेतना में समय फैल जाता है| जब समय की अनुभूति विस्तृत हो जाती है, तब व्यक्ति दूरगामी परिणाम देख पाता है। उसे यह कारणकार्य के संबंध से स्पष्ट होता है| इसी क्षमता को विवेक (Wisdom) कहते हैं। यह स्थिरता ही समय –बोध को बढ़ा कर बुद्धि को विकसित और संवर्धित करने का अवसर देता है| ध्यान (Meditation) पर आधुनिक शोध बताते है कि ध्यान से Alpha–Theta brain waves बढ़ती हैं| ये तरंगें रचनात्मकता, गहन समझ और अंतर्दृष्टि से जुड़ी हैं। यही स्थिरता से प्रज्ञाहै|

इसीलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि मैं कोई तीक्ष्ण बुद्धि का व्यक्ति नहीं हूँ| जिसे लोग तीक्ष्ण बुद्धिमता का प्रमाण समझते हैं, वह मात्र स्थिरता से चिन्तन होता है| यह मात्र गहनता से एक स्थिर विषय पर चिन्तन –मनन है| बुद्धि कोई तेज़ मस्तिष्क नहीं है, बल्कि संतुलित, स्थिर और लचीला मस्तिष्क है। बुद्धि उसी अवस्था में उत्पन्न एवं विकसित होती है, जब मन एवं चित्त, यानि चेतना की तरंगे एक निश्चित विन्यास और नेटवर्क में व्यवस्थित रुप से सक्रिय होती है|

इसीलिए स्थिर होना सीखिए और बुद्धिमान बनिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बौद्धिकों के चोंचले

बौद्धिकों के चोंचलेएक व्यंग्यात्मक एवं आलोचनात्मक मुहावरा तो है, लेकिन कुछ लोगों के लिए सबसे उपयुक्त भी है। चोंचले शब्द उनके दिखावटी, आडंबरपूर्ण या आत्ममुग्ध व्यवहार के लिए है, जो कुछ लोग अपनी बौद्धिकता को दिखाने के लिए करते हैं। लेकिन ऐसी बौद्धिकता का जमीनी सच्चाई, व्यवहारिक समाधान या सामाजिक उपयोगिता से बहुत कम संबंध होता है, या नहीं होता है। ऐसे लोग अपनी कुछ रटे हुए पुस्तकों पर या अधिकतर पुरातन स्थापित विचारों एवं आदर्शों की दृढ़ता पर आधारित होते हैं। ऐसे चोंचलों का बदलते वैश्विक सन्दर्भ एवं सबंधित अन्य विषयों का अद्यतन आधुनिक विज्ञान से कोई संबंध नहीं होता।

ऐसे चोंचले अद्यतन एवं जटिल लगने वाले मानवीय मनोविज्ञान सम्बन्धित विषयों पर ध्यान नहीं देते होते है| वे इस दिशा में कभी चिन्तन के लिए उत्सुक भी नहीं होते| ऐसे लोग आत्म मुघ होते हैं और असहमति दिखाने वालों को सदैव मूर्ख होने का मौखिक प्रमाण पत्र बाँटते होते हैं| ऐसे ‘जकड़े’ हुए और ‘जड़’ बौद्धिक व्यक्तिगत मनोविज्ञान एवं सामाजिक मनोविज्ञान की जटिल प्रक्रियायों के समझ के अभाव में मानव जीवन में बदलाव की भूमिकाओं को नहीं समझते होते हैं| इन चोंचलो के द्वारा कही गई बातों पर जब तथ्यात्मक संकट दिखाई देता है या इनकी तार्किक असंगतता स्पष्ट हो जाती हैं, तब ऐसे चोंचले अपनी प्रतिक्रियायों में सामाजिक मूल्यों की सीमाओं को ध्वस्त कर देता है| ऐसे ‘तड़पते हुए चोंचले’ अपने विरोधी पक्ष के व्यक्तिगत बातों पर उतर जाता है, उनकी पत्नी और बच्चों पर व्यक्तिगत टिप्पणी देंगे, मानो वे न्यायाधीश है।  इन ‘तड़पते हुए चोंचलों’ की तब बेचैनी बहुत बढ़ जाती है|

वे अक्सर बुद्ध, नानक, कबीर, आम्बेडकर आदि के नाम ले कर ऐसे अड़ते हैं, मानों उन महान व्यक्तियों ने उन्हें अपने पास बैठाकर उन्हें लिखवा दिया था। ये बौद्धिकता के चोंचले उनके प्रामाणिक वक्ता बनते हुए होते हैं। ऐसे चोंचले उन स्थापित विद्वानों को मात्र ढाल बनाते हैं, जबकि उन चोचलों की बातों का इन संदर्भित विद्वानों की बातों और उनके सन्दर्भों से कोई लेना –देना नहीं होता है|

कुछ तो ऐसे चोंचले मिलते हैं, जो यह भी कहते मिलेंगे ऐसा किस पालि ग्रंथों में लिखा है? ऐसे चोंचले दुनिया की हर बात को पालि से ही जोड़ते होते हैं| ऐसे चोंचले एक ‘अनुवादक’ होने के कारण अपने को सर्वज्ञाता समझते हैं| ऐसे चोंचले ‘अनुवादक’ होना और ‘इतिहासकार’ होना एक समझते हैं, जबकि यह दोनों एक –दुसरे से सम्बन्धित होते हुए भी अलग अलग क्षेत्र होता है|

ऐसे चोंचले ऐसा भी मानते हैं कि भारतीय बुद्धत्व की परम्परा के स्थापित बुद्धों ने स्वयं उन त्रिपितकों को लिखा है| यह स्थापित तथ्य है कि बुद्धों की परम्परा सदियों की एक लम्बी अवधि की रही और अंतिम 28वें  बुद्ध के महापरिनिर्वाण के एक सदी के बाद प्रथम संगीति होने की चर्चा मिलती हैं| यह भी एक तथ्य है कि कागजी प्रमाण कागज के आविष्कार के बाद ही कागज पर उतारे या लिखे गए होगे| ऐसी स्थिति में शब्दों के ‘सतही अर्थ’ की अपेक्षा उनके ‘निहित अर्थ’ महत्वपूर्ण हो जाता है।  ऐसे अनुवादकों को ‘संरचनावाद’ की समझ होनी चाहिए| तब किसी वाचन को किसी व्यक्ति का प्रमाणिक वकतव्य मान कर बहुत उछाल कूद करने वाले चोचले ऐसा कैसे कह सकते हैं कि शब्द के शब्द उन्ही विद्वानों के द्वारा और ऐसे ही क्रम में अंकित कराये गये थे| ऐसे चोंचलों को भाषा के ‘संरचनावाद’ और ‘विखंडनवाद’ के दर्शन की कोई समझ नहीं होती| वे सिर्फ अपने घायल अहम् को ठीक करने के उद्देश्य से उछाल कूद करते होते हैं|   

ऐसे चोचले अंग्रेजी, पालि और संस्कृत के जटिल शब्दों का अनावश्यक प्रदर्शन करते दिख सकते हैं| ऐसे लोग वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से जमीनी आधार पर कटे हुए होते हैं| यह इनके अकादमिक या वैचारिक नखरे का एक प्रतिरुप माना जा सकता है| ये चोंचले विमर्श की समझ बढ़ाने के बजाय अहं-प्रदर्शन का बहस बना देते हैं| मैं अन्तिम सत्य जानता हूँका भाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर छाया रहता है|

ऐसे चोंचले जमीनी सवालों पर समाधान देने के बजाय केवल संदर्भ और उद्धरण गिनाते रहते हैं| ऐसे चोंचलों का अपनी कोई जमीनी कार्य –योजना या कोई कार्य –अभियान नहीं होता है| ऐसे चोंचले असहमति दिखाने वालों को सिर्फ मूर्खता का प्रमाण –पत्र और स्वयं को बौद्धिकता का प्रमाण लेते हुए कहीं भी उपलब्ध होते हैं| ऐसे चोंचले हर विषय को सैद्धांतिक शुद्धताके नाम पर व्यावहारिकता से काट देते हैं| इन चोचलों के शब्द बौद्धिकता के विरोध में नहीं होते हैं, बल्कि खोखली बौद्धिकता और दिखावटी प्रज्ञा की आत्म –संतुष्टि के लिए होता है।

बौद्धिकों के चोंचलेसमकालीन समाज में अधिकतर टीवी बहसों, सोशल मीडिया, अकादमिक मंचों और वैचारिक आंदोलनों में दिखता होता है| ऐसे बौद्धिक चोंचले टीवी डिबेट की संस्कृति में दिखते हैं, जहाँ विचार विमर्श के नाम पर, प्रदर्शन के लिए बहस मात्र होता है| आज के न्यूज़ चैनलों पर तथाकथित बौद्धिक अक्सर मुद्दे को समझाने के बजाय शब्दों का जादू दिखाते होते हैं| बौद्धिक विमर्श को ज्ञान के उपयोग की नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता की लड़ाई बना देते हैं| यह बौद्धिकता समझाने का माध्यम नहीं  होकर सिर्फ चौंकाने का औज़ार बन जाती है।

अधिकतर बौद्धिक चोंचलों का रवैया अगर आप सहमत नहीं हैं तो आप अज्ञानी या मूर्ख हैंका होता है| ऐसे चोंचले समाधान से अधिक तथाकथित शुद्धता पर अड़े या जड़े हुए होते हैं| ये व्यावहारिक सुधारों को आदर्श से विचलनबताकर खारिज कर देते हैं| ऐसे चोंचले जमीनी सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय सैद्धांतिक शुद्धता के नाम पर जमीनी स्तर पर कुछ नहीं करते होते हैं| यह पूरी तरह सही नहीं हैकहकर आंशिक समाधान भी रोक देते हैं| परिणामत: समस्या बनी रहती है, और बौद्धिकता का प्रदर्शन जारी रहता  है।

ऐसे चोंचले वृहत समाज को ढोंगी, पाखण्डी और कर्मकाण्डी बता कर अपने को विशिष्ट बौद्धिक मात्र साबित करता है| ऐसे चोंचले समाज को कोई वैकल्पिक समुचित समाधान नहीं देता है| ऐसे चोंचले समाज से संवाद की कड़ी को भी खण्डित कर सिर्फ अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन करते दिखते है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

मानव चेतना की अनन्ता

‘चेतना’ (Consciousness) किसी ‘जीवन’ में होता है| ‘चेत’ (Alert) जाना ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना’ ही ‘जागरुकता’ है| ‘जानने की क्षमता’ ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना का अहसास’ उर्जा के प्रवाह और उसके रूपान्तरण से होता है| उर्जा के प्रवाह और उसके रूपान्तरण से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं| उन संकेतों के विशिष्ट आव्यूह (Matrix) से ‘सूचना’ (Information) का निर्माण होता है| सूचनाओं के व्यवस्थित और संगठित स्वरुप को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं| किसी चीज को यथास्थिति में जानना ‘ज्ञान’ है| ‘ज्ञान’ के सकारात्मक या नकारात्मक उपयोग एवं प्रयोग को ‘बुद्धि’ (Intellect) कहते हैं| ‘ज्ञान’ का उपयोग या प्रयोग अपने लिए करना ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग ‘मानवता’ या ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करना ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यह सब चेतना के विभिन्न ‘स्तर’ (Level) हैं| इसे कोई चेतना के विभिन्न ‘स्वरुप’ (Form) और ‘प्रतिरुप’ (Pattern) कह सकते हैं| एक आदमी का चेतना एक सामान्य जानवर से लेकर प्रज्ञावान तक हो सकता है|

चेतना की अवस्था में कोई अपने भीतर या अपने से बाहर की दुनिया के प्रति सजग और सतर्क होता है| इस चेतना में विचार, भावनाएँ, और प्रत्यक्ष ज्ञान शामिल रहता है| जीवन दो तरह का होता है, एक पादप –जीवन (Plant –Life) होता है, और दूसरा जन्तु –जीवन (Animal –Life) होता है| पादप स्वयं चलायमान नहीं होता है, इसीलिए इसकी चेतना सीमित मात्रा में कार्यरत होती है| हमलोग जन्तु की श्रेणी में आते हैं| जन्तु चलायमान होता है| जंतुओं में स्तनपायी (Mammal) सबसे ज्यादा चेतनशील होते हैं| मानव भी एक स्तनपायी जीव है| मानव का चेतना स्तर और इसका प्रतिरुप सर्वोत्कृष्ट और उच्चस्थ होता है|

मानव अपनी चेतना के विस्तार से ‘होमो सेपियंस’ (पशु मानव) से ‘होमो फेबर’ (निर्माता मानव), होमो सोशिअस’ (सामाजिक मानव), ‘होमो साइन्टिफिक’ (वैज्ञानिक मानव) और ‘होमो स्पिरिचुअल’ (आध्यात्मिक मानव) बन गया है| मानव चेतना का विस्तार अनन्त तक हो सकता है| मानव चेतना की विस्तार की कोई निश्चित सीमा नहीं हो सकती| मानव चेतना का स्तर अब ज्ञान, बुद्धि और प्रज्ञा तक पहुँचा हुआ है| अब इसके विस्तार करने और गहराइयों में उतरने की जरुरत है| लेकिन यह कैसे सम्भव हो सकता है?

मानव चेतना का विस्तार ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ के आधार पर हो सकता है| जहाँ तर्क हमें यथार्थ के धरातल पर खड़ा रखता है, वहीं कल्पना हमें अनन्त आकाश में उड़ान भरने की प्रेरणा देती है। आईन्स्टीन ने कल्पना को तर्क और परिश्रम से बहुत महत्वपूर्ण माना| ये ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ मानव विकास के आधार स्तंभ हैं| परंतु इन दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ और संभावनाएँ हैं। तर्क की अपनी सीमाएँ होती है और इसके सहारे आप कुछ सीमित दूरी तक जा सकते हैं| कल्पना सीमाविहीन होती है और कोई कल्पना के सहारे अनन्त तक पहुँच सकता है|

आईन्स्टीन अपने बारे में कहते हैं कि मैं विलक्षण बौद्धिकता का व्यक्ति नहीं हूँ| मेरी कल्पनाशीलता मुझे विशिष्ट और भिन्न बनाती है| वे कहते हैं कि अपनी चिन्तनशीलता के कारण वे विशिष्टता और भिन्नता की स्थिति पाते हैं| चिन्तनशीलता ही कल्पनाशीलता है| यह चिन्तनशीलता विचारों पर ठहराता है और गहराइयों में उतारता है। अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं कि आप तर्क से अ (A) से ज्ञ (Z) तक जा सकते हैं| लेकिन आपकी कल्पनाशीलता आपको कहीं भी ले जा सकता है। मानवता में अद्वितीय योगदान तार्किक और कल्पनाशीलता से मिली है| इन दोनों में कल्पनाशीलता का स्थान तार्किकता से अलग, उच्चतर, विशिष्ट और सर्वोच्च है|

तर्क का कार्य वस्तुओं, घटनाओं और विचारों को प्रमाणों और कारणों के आधार पर समझना है। यह मनुष्य को भ्रामक विश्वासों और अंधविश्वासों से मुक्त करता है। परंतु तर्क की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह केवल उस क्षेत्र में कार्य कर सकता है, जिसे इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं या जिसे बुद्धि प्रमाणित कर सकती है। तर्क अदृश्य, अमूर्त या भावनात्मक सत्य को नहीं पकड़ सकता। प्रेम, सौन्दर्य, श्रद्धा या ईश्वर जैसे अनुभव तर्क की सीमा से बाहर हैं। तर्क यदि अति-प्रबल हो जाए, तो वह जीवन को यांत्रिक और भावना शून्य बना देता है।

कल्पना वह शक्ति है जो हमें दृश्य से अदृश्य, ज्ञात से अज्ञात और सीमित से असीम की ओर ले जाती है। विज्ञान की हर खोज और कला की हर रचना कल्पना की ही देन है। कल्पना वह सेतु है जो मानव को सृजनशील बनाती है। इसका कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है| यह विचार, भाव, और स्वप्न के संसार में असीमित रूप से विचरण करती है। यही कल्पना की अनन्ता है| यहीं से धर्म, दर्शन और कला का उद्भव हुआ। चेतना के असीमित विस्तार का यही मुख्य आधार है| आप तर्क के सहारे सदैव आगे नहीं बढ़ सकते, लेकिन आप कल्पनाशीलता के साथ कहीं से और कभी भी आगे बढ़ सकते हैं|

मनुष्य के समग्र विकास के लिए तर्क और कल्पना दोनों का संतुलन आवश्यक है। केवल तर्क पर आधारित जीवन सूखा और सीमित होता है| केवल कल्पना पर आधारित जीवन भ्रम और अस्थिरता में डूब सकता है। जब तर्क दिशा देता है और कल्पना उसमें ऊर्जा भरती है, तब सृजन का चमत्कार घटित होता है।

तर्क हमें यह सिखाता है कि क्या है? कल्पना हमें यह दिखाती है कि क्या हो सकता है? तर्क की अपनी सीमाएँ हैं| कल्पना की कोई सीमा नहीं। इसी कारण मानव सभ्यता एवं संस्कृति  का विकास तर्क की ठोस भूमि और कल्पना के अनन्त आकाश दोनों के सम्मिलन से संभव हुआ है|

आप मानव चेतना का अनन्त विस्तार अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’ के साथ कर सकते हैं| इसलिए आप अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’ की क्षमता का विस्तार करते रहिए| यही आपको विशिष्ट, उच्चतर और लाभकारी बनाएगी|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुद्धि की उत्पत्ति "स्थिरता" से होती है

  बुद्धि को केवल आंकड़ों या सूचनाओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता। बुद्धि  की उत्पत्ति एवं विकास सिर्फ चेतना की 'स्थिरता" की अवस्था ...