अधिकतर लोगों का मानना है कि बुद्ध ने एक धर्म बनाया।
मुझे लगता है कि बुद्ध ने कोई धर्म नहीं बनाया। अर्थात बौद्ध धर्म किसी भी बुद्ध
ने नहीं बनाया। चूंकि भारतीय इतिहास में कोई 28 लोगों को बुद्धत्व की उपाधि प्राप्त
हुई, इसीलिए गोतम 28 वें और अन्तिम
बुद्ध हुए। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह धर्म क्या होता है? इस अवधारणा की स्पष्टता इस प्रश्न को समझा सकता है।
साधारणतया धर्म से एक स्पष्ट मानसिक चित्रण उभर कर
सामने आ जाता है। वर्तमान समय में विश्व में इतने सामान्य धर्म हैं कि इनकी कोई
सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक स्पष्ट परिभाषा नही बन पाता। लेकिन सभी परम्परागत धर्मों
के कुछ विशेष चारित्रिक अभिव्यक्ति होता है,
जिससेे उसके पहचान बनते हैं। इन अभिव्यक्त चारित्रियों के आधार पर
एक सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक चारित्रियों का निर्धारण किया जा सकता है। यही
अभिव्यक्त चारित्रियां ही धर्म का दृश्य पक्ष हुआ।
इन अभिव्यक्त चारित्रियों में विशेष उपासना स्थल, पवित्र ग्रंथ,
प्रार्थना अथवा पूजा-पाठ संबंधित कोई कर्मकांड या विशेष रीति,
तथा उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए याचना करना, इनमें प्रमुख है। धर्म का यही दृश्य पक्ष इसको अन्य विषयों, विचारों तथा सिद्धांतों से अलग कर देता है। धर्म में इन पक्षों की कोई
उपेक्षा नहीं कर सकता और इससे इन्कार भी नहीं कर सकता है। इन्हीं आधारों पर
विभिन्न धर्मों में विभाजन किया जाता है। बौद्ध धर्म में भी उपर्युक्त अभिव्यक्त
चारित्रियां स्पष्ट है। इनमें विशिष्ट उपासना स्थल का निर्माण या भ्रमण; किसी एक को पवित्र ग्रंथ मानना, जिसका लेखन और
सम्पादन उन व्यक्ति या सत्ता के गुजर जाने के बाद किया जाता है; किसी कृपा की आशा से प्रार्थना या याचना करना; और
मामूली ही सही, कुछ कर्मकांड करना प्रमुख विशेषता होता है।
इन अभिव्यक्त चारित्रियों का मूल भावना उस विशिष्ट शक्ति की कृपा पाना होता है,
जो प्रचलित बौद्ध धर्म में भी स्पष्ट है।
इन्हीं अभिव्यक्त चारित्रियों के आधार पर बौद्ध धर्मी
अपने को अन्य धर्मों से अलग करते हैं और सबसे प्रगतिशील धर्म भी मानते हैं। यहाँ
ध्यान देने वाली बात यह है कि इनके अनुयायी इसे धर्म भी मानते हैं और इसे कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास
और ढोंग से मुक्त भी मानते हैं। कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास
और ढोंग धर्म के आवश्यक आधार है और इससे मुक्त कोई भी
धर्म नहीं हो सकता। वही धर्म, जिसकी तुलना वैज्ञानिक
दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने एक नशीली पदार्थ से किया था। यही सबसे बड़ा विरोधाभास
है। विचित्र स्थिति यह है कि ऐसे धर्मिक बनने और दिखने वाले अपने को तार्किक और
प्रगतिशील भी मानते हैं और अपने को बौद्धिक भी समझते हैं।
कहने का स्पष्ट तात्पर्य यह है कि यदि कोई धर्म है, तो वह अवश्य ही
कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास और ढोंग से युक्त रहेगा। तब ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को इसी आधार पर दूसरों पर
नकारात्मक टिप्पणी करने का विचार उनकी विवेक हीनता है। आप किसी के कर्मकांड,
पाखंड अंधविश्वास और ढोंग के गुणवत्ता की मात्रा पर विवाद तो कर
सकते हैं, लेकिन स्वयं के धर्म में इनकी कोई मात्रा के नहीं
होने से इंकार नहीं कर सकते है। तब तो इन अनुयायियों को दूसरों की आलोचना करने का
और अपने को सर्वोपरि बताने और समझने का कोई नैतिक आधार नहीं रह जाता।
इस परम्परागत धर्म में किसी अलौकिक या अतिमानवीय शक्ति
या सत्ता में विश्वास करना सबसे प्रमुख होता है। बुद्ध ने स्वयं को दीपक बनने को
कहा, लेकिन
उनके धार्मिक अनुयायी उनसे ही कल्याण करने, यानि कृपा करने
की अनुरोध करते हैं। ऐसे लोग बुद्धों के जीवन -दर्शन और जीवन जीने के विज्ञान पर
ध्यान नही देते। दूसरों की अनावश्यक आलोचना कर आत्म मुग्धता पाना बुद्ध का दर्शन
कदापि नहीं हो सकता। उस अलौकिक या अतिमानवीय शक्ति या सत्ता से अपने कष्टों और
समस्याओं से निजात पाने की उम्मीद में ढेर सारे तामझाम करना धर्म का दूसरा
महत्वपूर्ण हिस्सा है।
धर्म मानव की एक विशेष मनोदशा या अभिवृत्ति है। इस
अभिवृत्ति का मुख्य विषय उस पूजनीय व्यक्ति या सत्ता को मूल्यवान समझना होता है।
धार्मिक व्यक्ति ऐसे संवेगों और भावनाओं से अभिभूत रहता है, और अपनी
प्रतिक्रिया देने में मानवीय मूल्यों का महत्व नहीं समझता है। धर्म का यह भी एक
अभिलक्षण है कि धर्मपरायण व्यक्ति की उस सत्ता या व्यक्ति में अखंड आस्था और उसके
प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता रखता है। आश्चर्य की बात है कि ऐसे अनुयायी अपने को
वैज्ञानिक मानसिकता के बौद्धिक भी समझते होते हैं।
दरअसल बुद्धों ने बुद्धि की बात की थी, जो व्यक्ति,
परिवार, समाज, मानवता और
मानवता के भविष्य के कल्याण को अपने में समाहित करता होता है। बुद्ध की बातों में
यदि बुद्धि और कल्याण की बात नहीं है, तो वह बुद्ध की बात हो
नहीं सकती। कुछ लोग मतदान कराकर बौद्धिकता के निर्धारण का प्रयास करते दिखते हैं।
ऐसे हताश और निराश धार्मिक अनुयायियों की संस्कृति अभी भी मौजूद है। किसी भी
बुद्धों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे आज के परम्परागत धर्म
के खांचे में बैठाया जाय।
कुछ लोगों की मानसिकता ऐसी है कि वे परम्परागत धर्म के
ढांचे से बाहर नहीं जा सकते और वैज्ञानिक मानसिकता का खोल पहन कर प्रगतिशील भी
दिखना चाहते हैं, ऐसे लोग ही महान वैज्ञानिक दार्शनिक बुद्धों को ढाल बना कर धर्म को आकार
दे दिया है। वैसे धर्म आस्था का विषय है, प्रदर्शन करने का
नहीं। सभी अपनी आस्था को बनाए रखें, लेकिन दूसरों पर अपनी
बनाबटी वैज्ञानिकता का प्रदर्शन भी नहीं करें। किसी के ऐसे बनने और ढोंग करने से,
यदि बुद्ध आज जीवित होते, तो अपने ऐसे तथाकथित
अनुयायियों के ऐसे कृत्यों से लज्जित हो जाते।
जब बुद्ध ने लोगों को स्वयं ज्ञान का प्रकाश बनने को
कहा, और
लोगों को स्वयं उस पथ पर चलने को कहा, तब वे अपनी उपासना,
अराधना, पूजन आदि करने के लिए दूसरों को क्यों
कहते? वे ऐसे धर्म क्यों बनाते?
इस पर ठहरिए और विचार कीजिए।
आचार्य
प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय
अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|