बुधवार, 1 दिसंबर 2021

सफलता का विज्ञान क्या है?

हर किसी को सफलता चाहिए| हर किसी को अपने लक्ष्य में सफलता मिलनी ही चाहिए| क्या सफलता का कोई विज्ञान है, या सफलता जन्म पर आधारित है, या किसी पूर्वजन्म का फल है, या किसी ईश्वरीय शक्ति की इच्छा का परिणाम है? क्या इसे कोई भी साधारण आदमी इसकी क्रिया विधि (Process/ Mechanics) को समझ कर और उसका अनुकरण कर पा सकता है? यदि हाँ में उत्तर है, तो कैसे? इसे जानने एवं समझने के लिए ही यह संक्षिप्त आलेख प्रस्तुत है-

इसके लिए आपको अपने सोच में कुछ अवधारणात्मक (Conceptual) बदलाव करना होगा| आपको सफलता के विज्ञान” (The Science of Success) के पथ पर अग्रसर होने के लिए निम्न पांच बातें बढ़िया ढंग से समझनी होंगी| इसके लिए आपको  निम्न पांच बिन्दुओं को समझना होगा ---

      1. ईश्वर में विश्वास: इसके लिए आपको ईश्वर (God) की अवधारणा (Concept), उद्देश्य (Purpose), क्रिया विधि (Mechanics) और आवश्यकता (Necessity) को समझना होगा| हमारे कहने का सीधा तात्पर्य यह है, कि आपको ईश्वर के होने के विश्वास को खंडित (Destroy) करना होगा| इसके बाद ही आप अपने ऊपर विश्वास करेंगे| इससे आप अनन्त प्रज्ञा (Infinite Intelligence) की प्रकृति, स्वाभाव एवं क्रिया विधि को समझने को प्ररित होंगे| ईश्वर में विश्वास नहीं करने के बाद ही आप अपने सोच, कर्म एवं व्यवहार की उपयोगिता तथा क्रिया विधि पर विचार कर सकते हैं| जब आप ईश्वर की व्यवस्था में विश्वास नहीं करते, तब आप विश्व व्यवस्था की नैतिक जिम्मेवारी को गंभीरता से समझते हैं| तब ही आप अपनी प्रकृति, दूसरे आदमी (समाज) एवं स्वयं आत्म के सबंध को समझते एवं मानने में सक्षम हो पाते हैं|

    2. पुनर्जन्म एवं आत्मा में विश्वास: आत्मा (Soul) और पुनर्जन्म (Reincarnation/ Rebirth) एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं, अर्थात एक दूसरे से घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए हैं| आत्मा एवं पुनर्जन्म में विश्वास करने से आपको अपने वर्तमान जन्म के सोच, कर्म, एवं व्यवहार पर निर्भरता की आवश्यकता नहीं होगी| मतलब यह कि यदि आपको सफलता इस जन्म में चाहिए, तो आपको पुनर्जन्म एवं आत्मा में विश्वास नहीं करना होगा| इस विश्वास के कारण आप बेमतलब (अगले जन्म) के लम्बे इन्तजार  में समय बर्बाद नहीं करेंगे| अब इसके बाद ही आप इस जन्म में अपने सोच, कर्म और व्यवहार पर विचार करने के लिए सही मायनों में प्रेरित होंगे| वैसे आपको जन्म के आधार वाली ठगी या अन्य दूसरे प्रकार वाली ठगी के आधार पर सफलता मिलती है। आप दूसरो को भ्रमित (Confuse) करने यानि ठगने (Cheat) के लिए अपनी सफलता का कारण अपना पुनर्जन्म या पूर्व आत्मा का कर्म एवं फल बता सकते हैं| नादान इस पर बहुत ही आसानी से विश्वास भी करेंगे| इस पुनर्जन्म एवं आत्मा में विश्वास से परंपरागत 'व्यवस्था' को अपनी यथास्थिति ( Status quo) बनाये रखने में कामयाबी मिलती है,जो उसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है।

          3. नित्यता में विश्वास : नित्यता (Eternity) में विश्वास का अर्थ हुआ कि सब कुछ स्थायी (Permanent) है, और इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है| नित्यता में विश्वास करने से आप निराशा में डूब जाते हैं, क्योंकि तब फिर आपको अपनी स्थिति में बदलाव की कोई आशा नहीं दिखती| आज चार विमीय (Four Dimensions – t, x, y एवं z अक्ष) ब्रह्माण्ड में सब कुछ सदैव बदलता रहता है, कुछ भी स्थिर एवं स्थायी नहीं है| यह सत्य और तथ्य आपके भविष्य की सफलता की संभावना को दिखाता है, और उसे सुनिश्चित भी करता है|

     4. भाग्य एवं जादू में विश्वास : भाग्य (Fate) एवं जादू/करिश्मा (Magic/ Miracle)  में आपका विश्वास 'कार्यो' या परिणामों के किसी कारण के (Cause/ Reason) होने की आवश्यकता को समाप्त कर देता है| जब कोई आदमी किसी कार्य/परिणाम  ( Effect/Result) के वास्तविक कारण को नहीं समझ पाता है, तो वह उसे भाग्य एवं जादू/ करिश्मा से होना समझता है| जब आप इसमें विश्वास करते हैं, तो आप 'कार्य-कारण'(Cause & Effect) के वैज्ञानिक सिद्धांत एवं उसकी प्रक्रिया को नहीं समझ पाते हैं| इसी कारण आप ढोंग, पाखंड, अन्धविश्वास एवं कर्मकांड में उलझ जाते हैं, और आप ठगे जाते हैं| जब आप इनमे विश्वास नहीं करते हैं, तो आप कार्य/परिणाम का वैज्ञानिक कारण खोजते एवं समझते हैं| यही मानसिकता (Mentality) विज्ञान का आधार है, और उसकी उत्पत्ति एवं विकास का कारण है|

         5. सोच की शक्ति में विश्वास: जब आप किसी ख़ास चीज या विषय पर मन को स्थिर कर उसके विभिन्न पक्षों का अध्ययन करते हैं, तो इसे उस चीज या विषय पर सोचना कहते हैं| आज आप और हम जो कुछ भी हैं, अपने पूर्व के सोच का परिणाम ही हैं| अपने सोच को बदल कर ही आप अपने लक्षित उद्देश्य को पा सकते हैं| क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत का 'प्रेक्षक सिद्धांत' (Observer Theory) यही स्थापित करता है| जब आप अपने सोच की शक्ति पर विश्वास करते हैं, तो आप अपने सोच को नियंत्रित एवं परिवर्तित करते हैं| तब आपका आपके भविष्य पर भी नियत्रण होता है|

उपरोक्त को जानने एवं समझने से यह स्पष्ट है कि यह संसार दैवीय शक्ति या अन्य समतुल्य व्यवस्था पर निर्भर नहीं है| यह संसार वस्तुत: निम्न 'त्रि-संबंध' (Tri – Relations) पर निर्भर है ---

        1. यह संसार 'आदमी' एवं 'प्रकृति' (Nature) के सम्बन्ध पर निर्भर करता है।

        2. यह संसार 'आदमी' एवं 'आदमी' के सम्बन्ध पर निर्भर करता है।

        3. यह संसार 'आदमी' एवं उसके 'आत्म' (Self) के सम्बन्ध पर निर्भर करता है|

इसीलिए आदमी का प्रकृति से सम्बन्ध संतुलित, सौहार्दपूर्ण एवं सामंजस्यपूर्ण अवश्य होना चाहिए, जिसे हम पारिस्थितिकी न्याय (Ecological Justice) भी कहते हैं| इसमें अन्य जीवों एवं वनस्पतियों सहित उर्जा प्रवाह के महत्व को समझना और उसे न्यायपूर्ण स्थान देना जरूरी है| आदमी और आदमी के सम्बन्ध को प्रगतिशील बनाने के लिए ही समाज में सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, मैत्री, एवं दान आदि की भावना एवं व्यवहार की जरूरत होती है| अपने आत्मको जानने एवं समझने के लिए ही 'आत्म अवलोकन' (Self Observation) जरूरी है| इस आत्म-अवलोकन की विधि को ही विपस्सनाकहते हैं|

यदि आप ऐसा नहीं करके भी सफलता पा रहे हैं, तो आप अपनी संभावित क्षमता के एक छोटे से अंश पर ही सीमित हैं, और आप अपने को धोखा (Deception) दे रहे हैं|

जब आप उपरोक्त बातों को समझते हैं, तो आप में सामान्य बुद्धिमता’ (General Intelligence), भावनात्मक बुद्धिमता’ (Emotional Intelligence), सामाजिक बुद्धिमता’ (Social Intelligence), एवं बौद्धिक (विवेकी) बुद्धिमता’ (Wisdom Intelligence) का उत्पादन, विकास एवं नियंत्रण होता है| इसे 'ज्ञान का उत्पादन' भी कहते हैं| इसके लिए आदमी को वस्तु या विषय से मुक्त (Liberate) होना होता है, पूर्वानुमान (Predict) करना होता है, कार्य साधन (Manipulate) करना होता है, और उसके ऊपर नियंत्रण (Control) करना होता है| इसी ज्ञान साधना के लिए ही बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग है|

मनुष्य में ज्ञान का अभाव ही उसके सभी प्रकार के दुखों का कारण है| ज्ञान ही सभी दुखों का निदान है|

और यही तथागत बुद्ध के 'धम्म' का सार (Essence) है|

ज्ञान का उत्पादन, विकास, एवं नियंत्रण करना ही मानव का वास्तविक धम्महै|

बुद्ध के 'धम्म' के बारे में अन्य सभी प्रचलित बातें सतही (Superficial) है, बाजारू (Marketable) है, आंशिक (Partial) और दिखावटी (Showy) हैं|

बुद्ध के धम्म को प्रचलित धर्म के रूप में प्रस्तुत करना बुद्ध के प्रति एक महान नाइंसाफी (Injustice) है|

यही सफलता का शुद्ध विज्ञान है|

सफलता के इस विज्ञान को धर्म के वर्तमान किसी भी स्वरूप से कोई लेना-देना नहीं है| आज के प्रचलित सभी धर्मों (बौद्ध धर्म सहित, बौद्ध धम्म नहीं) का वर्तमान स्वरूप नौवीं शताब्दी के बाद अर्थात सामन्तवाद की उत्पत्ति के साथ ही आया| अत: सफलता के इस विज्ञान को किसी भी रूप में किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए|

निरंजन सिन्हा

8 टिप्‍पणियां:

  1. विज्ञान के समझ को तार्किकता के साथ और निचोड़ में समझाने के लिए बहुत ही आभार

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  2. ज्ञानवर्धक लेख है। धर्म में मंदबुद्धि और शरारती बुद्धि लोग भी घुस जाते हैं। प्रचलित लोक धर्म में अज्ञान ऐसे ही लोगों के कारण है।

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  3. बहुत उम्दा लेख सर। अपने भारतीय संस्कृति में जड़ तक फैले बीमारी को झकझोर कर ज्ञान रूपी फल का रसास्वादन करवाये सर।

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