सोमवार, 13 अप्रैल 2026

डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी में सम्बन्ध

डॉ हेडगेवार एक भारतीय नायक रहे हैं, जिन्होंने भारत में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की| यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा ‘नागरिक समाज’ का संस्था है| यह संगठन स्वयंसेवकों द्वारा भारतीय राष्ट्र के निर्माण के लिए गठित हुआ| लेकिन इनके बारे में कतिपय भारतीय बौद्धिकों में बहुत भ्रम बना हुआ है| मैं किन्हीं के भ्रम का निवारण भी नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि सभी को एक विचार पर सहमत नहीं किया जा सकता| मैं इनके बारे में एक ऐसा ‘तथ्य’ का प्रस्तुतीकरण करना चाहता हूँ, जिसके बारे मैंने आज तक कहीं नहीं सुना या पढा|

दरअसल एक ‘सत्य’ भी सभी के अपने पूर्वाग्रहों का दर्पण होता है| इतना ही नहीं, किताबों में जो लिखा होता है, उसका सदैव वही अर्थ नहीं समझा जाता, जो उस किताब के लेखक का होता है| किताबों में लेखक अपनी समझ के अनुसार लिखता है, लेकिन उसका पाठक उसका वही अर्थ समझता है, जो वह समझना चाहता है| भारत में डॉ हेडगेवार के सम्बन्ध में भी यही हुआ है| सब कोई सस्ता और साधारण अर्थ निकलना चाहता है, क्योंकि गहन अर्थ के लिए अतिरिक्त समय और ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ का बौद्धिक श्रम की आवश्यकता होती है| उनके ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दवी राज्य’ की अवधारणा भी ऐसा ही श्रम –साध्य अवधारणा है| लोगों ने ‘संस्कृति’, ‘राष्ट्र’ और ‘हिन्दवी’ को नहीं समझा, ‘राष्ट्र’ को ‘देश’ समझा और सम्राट शिवाजी के ‘हिन्दवी’ को एक ‘धर्म’ समझा|  इनकी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा वही है, जिसे जोसेफ स्टालिन ने 1813 में रचित अपनी किताब – ‘मार्क्सवाद एवं उनकी राष्ट्रीय समस्याएँ’ में दिया था|  

ऐसा माना जाता है कि डॉ हेडगेवार पर किसी विदेशी दार्शनिको एवं क्रांतिकारियों का प्रभाव नहीं पड़ा| ऐसे विद्वान् यह भूल जाते हैं कि डॉ हेडगेवार अपने छात्र जीवन में बंगाल के ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य रहे|  बगाल का ‘अनुशीलन समिति’ अपने समय का भारत के सबसे बड़े और सशक्त क्रान्तिकारी संगठन था| इस संगठन की सक्रियता के कारण भारत की राजधानी कलकत्ता को दिल्ली विस्थापित करना पड़ा| क्या ऐसा संभव था कि उस संगठन का एक सक्रिय सदस्य अपने दर्शन और विचारधारा में क्रान्तिकारी नहीं होगा? भारत और मेक्सिको के कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक मानवेन्द्र नाथ राय भी उस संगठन के सदस्य थे| एम एन राय एक क्रान्तिकारी और मानवतावादी भी थे, जो कम्युनिस्ट विचारधारा के आलोचक भी रहे| डॉ हेडगेवार और राय हम उम्र भी थे| श्री अरबिन्दो भी उसी संगठन के सक्रिय सदस्य थे|

इटली के एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी थे| डॉ० हेडगेवार के ग्राम्शी के समकालीन एवं हमउम्र थे, और इसीलिए इन दोनों में वैचारिक एवं भावनात्मक लगाव रहा| एन्टोनियो ग्राम्शी ने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया और कार्ल मार्क्स के दर्शन को अव्यवहारिक बताया| वे अपने कारावास अवधि में अपने विचारों को लिखते रहे, जो एक पुस्तक - ‘जेल नोटबुक’ (Prison Notebooks) के नाम से प्रसिद्ध हुआ| जब हम एन्टोनियो ग्राम्शी के सभी मूल दार्शनिक तत्वों का गहनता से अवलोकन करते हैं, तब ये सभी तत्व डॉ० हेडगेवार के सभी दर्शन में प्रमुखता से स्पष्ट होता है| इस पर ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है| मैंने डॉ० हेडगेवार को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों में सबसे पहले एन्टोनियो ग्राम्शी को रखा है|

एन्टोनियो ग्राम्शी के दर्शन में ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony), ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony), ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution), ‘राजनीतिक समाज’ (Political Society) एवं ‘नागरिक समाज’ (Civil Society), ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) एवं ‘नागरिक स्वतन्त्रता’ (Civil Freedom), ‘स्थितियों का युद्ध’ (War of Position) और ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) प्रमुख अवधारणा है| इन अवधारणाओं को अच्छी तरह समझ कर कोई डॉ० हेडगेवार के ‘कार्य –दर्शन’ को समझ सकता है| डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी के मूल एवं मौलिक कार्य -दर्शन में आश्चर्यजनक समानता स्पष्ट है| हालाँकि मैं आश्चर्यचकित नहीं हूँ, मैं इसे स्वाभाविक समानता मानता हूँ|

ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ में यह समझाया है कि शासक वर्ग अपनी विचारधारा को समाज में इस तरह प्रस्तुत करता है और नियमित करता है, ताकि उस विचारधारा को वह समाज अपना समझ कर उसे अपना मान ले| किसी भी वर्ग की सत्ता सिर्फ राजनीतिक, या आर्थिक, या सशस्त्र बल के सहारे नहीं टिक सकती, अपितु उसकी संस्कृति, जीवन –मूल्य, नैतिकता, शिक्षा, मीडिया और धर्म के सहारे टिकी रहती है| सत्ता इन साधनों के सहारे समाज के विचारों, मूल्यों एवं नैतिकता पर नियंत्रण कर निरंतरता बनाए रखती है| शासक वर्ग अपने हित की विचारधारा को सामान्य जन गण का ‘सामान्य समझ’ (Common Sense) बना कर प्रस्तुत करती है|

सामान्य जन गण इन्हें अपने हित का सामाजिक एवं धार्मिक मूल्य समझती है| इसे अपना सामान्य नैतिकता समझती है| सामान्य जन गण इन्हें अपना ‘सांस्कृतिक दायित्व’ समझ कर इसका स्वयं पालन करती रहती है| इसी ‘सांस्कृतिक दायित्व’ की समझ को ही सत्ता का ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ कहा गया है| इसके लिए राज्य को किसी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है| सामान्य जनता की सामान्य समझ को समाज के स्तर पर समझाया जा सकता है, और उसे सुधारा जा सकता है| इसी सुधारने की प्रक्रिया को ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony) कहते हैं| इसी को ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution) समझा जाता हैं|

ग्राम्शी ने अपने ‘राजनीतिक समाज’ की अवधारणा में यह समझाया कि बिना सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलाव के ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) का कोई अर्थ नहीं होता है| ‘राजनीतिक समाज’ वह समाज होता है, जिनकी राजनीति, प्रशासन, पुलिस, सेना, शिक्षा, धर्म, न्याय, एवं अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण होता है| ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ मिलने से उस देश का मात्र ‘राजनीतिक समाज’ ही लाभान्वित होता है| तत्कालीन भारतीय कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भी एक ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ की प्राप्ति के लिए था, जिसका लाभ भारतीय ‘नागरिक समाज’ को नहीं मिलने वाला था, बल्कि इसका लाभ भारतीय  ‘राजनीतिक समाज’ को मिलने वाला था| बाद में, भारत में यही हुआ|

इसी तरह, ग्राम्शी ने समझाया कि ‘राजनीतिक समाज’ के अलावे एक ‘नागरिक समाज’ होता है| यह ‘नागरिक समाज’ बौद्धिक रुप में पिछड़ा हुआ होता है| इस समाज मे सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना किसी भी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता है| आज भी भारतीय नागरिक समाज अपनी गरीबी, बीमारी और अशिक्षा से जूझ रहा है| शायद इसी ‘आध्यात्मिक दृष्टि’ ने डॉ हेडगेवार को इन स्वतन्त्रता आन्दोलन से विमुख रकहा|

डॉ० हेडगेवार समझते थे कि सिर्फ ‘राजनीतिक समाज’ के सहारे किसी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है| भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक असमानता धार्मिकता का आवरण ओढ़े हुए अस्तित्व में मौजूद है| भारत के राष्ट्र –निर्माण में यही असमानता आज भी बाधा बनी हुई है| एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए ‘राजनीतिक समाज’ के साथ साथ ‘नागरिक समाज’ को भी प्रमुखता से शामिल किये जाने की अनिवार्यता होती है| यह सब डॉ० हेडगेवार के दर्शन और कार्यों में स्पष्ट है|

‘स्थितियों के युद्ध’ में ग्राम्शी समझाते हैं कि युद्ध सिर्फ सीधे टकराव से नहीं किया जाना चाहिए| इनका मानना है कि वर्तमान शासक वर्ग अपना शासन अपने विचारधारा को प्रसारित कर करता है| ऐसे शासकों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए उस समाज में जाकर उनकी विचारधाराओं के सापेक्ष अपनी अवधारणाओं और मान्यताओं के आधार पर अपनी विचारधारा बना कर प्रसारित करना होता है| सामान्य जन गण को वही विचारधारा स्वीकार्य होती है, जो उन्हें समझने में सरल और साधारण होती है| ‘हिन्दवी’ पर आधारित विचारधारा भी एक ऐसी ही सरल विचारधारा है| किसी विचारधारा का खंडन करना या उस पर प्रतिक्रिया देना उन विरोधियों की विचारधारा का ही प्रसारण करना होता है| डॉ० हेडगेवार भी ग्राम्शी की समझ की मान्यताओं पर कार्य कर रहे थे| यह युद्ध समाज में सांस्कृतिक बदलाव का होता है| यही ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ हुआ|

ग्राम्शी ने ‘सजीव बौद्धिक’ की अवधारणा में इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक वर्ग को अपने स्वयं के बौद्धिक तैयार करने चाहिए| ये ‘सजीव बौद्धिक’ बुद्धिजीवियों का ऐसा वर्ग होगा, जो सम्बन्धित वर्ग अर्थात सामान्य जन गण से जुड़कर उसकी चेतना को बौद्धिकता और दिशा देगा| वह ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) वर्ग उस समाज की चेतना को उच्चतर अवस्था में ले जाए| उसे ‘नागरिक समाज’ को उस ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ के विरुद्ध ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ करके ‘नई वैचारिक ढाँचा’ बनाना चाहिए| सामान्यत: परम्परागत बौद्धिक नेतृत्व भी उन्ही सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के घेरे में ही, उन्ही के द्वारा रचित की गई किताबों में ही समाधान खोजते रहते हैं| इसी समझ के अभाव में सामान्य जनगण और उनके नेतृत्व को दशको एवं शतकों के बीत जाने के बाद भी समाधान नहीं दिखता है| ये बौद्धिक नेतृत्व उन्ही ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ की उलझनों में उलझे रहते हैं| इन्हें ‘निर्जीव बौद्धिक’ कहा जा सकता है|

डॉ० हेडगेवार के दर्शन में ग्राम्शी की यही अवधारणा स्पष्ट रुप से दिखते और चिखते हुए मिलते हैं| डॉ० हेडगेवार का संगठन संस्कृति और चेतना के स्तर पर बदलाव की बात कर राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी 

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी में सम्बन्ध

डॉ हेडगेवार एक भारतीय नायक रहे हैं, जिन्होंने भारत में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की| यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा ‘नागरिक समाज’ ...