मैं सुबह सुबह टहलने के समय एक विद्यालय चला
जाता हूँ। नन्हें मुन्ने बच्चों का विद्यालय – ‘बुद्ध इनोवेटिव माइण्ड स्कूल’। कुछ बच्चे घेर लेते हैं, जिनके लिए मै 'दादा सर' होता हूँ। मैं अक्सर उन बच्चों में बड़े सपने बनाने, जगाने, और गढ़ने के लिए उनसे सवाल करता रहता हूँ कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगे? उन सपनों को आकार देने, उन सपनों में रंग भरने
और उन सपनों को जीवन्त बनाने के लिए उनके सपनों को कल्पना लोक में विचरण भी कराता
रहता हूँ।
अल्बर्ट आईन्स्टीन ने कहा है कि जीवन में कल्पना
ही सबसे महत्वपूर्ण है। कल्पना ही पहले विचार बनते हैं और फिर वास्तविकता भी। एक
कार्यालय का एक कलर्क आईन्स्टीन खिड़की से बाहर उस पेंटर को देख रहा था, जो सामने दूर चर्च की
बाहरी दीवारों की रंगाई पुताई कर रहा था। उसने कल्पना की कि यदि पेंटर वहाँ से
गिरेगा, तो क्या होगा? यदि वह
अन्तरिक्ष में गिरा, तो क्या होगा, अदि
आदि। गणित में रुचि रखने वाला वह कार्यालय कलर्क इसी कल्पना को आगे बढाते हुए ‘सापेक्षिता का विशेष सिद्धांत' दिया और एक दशक बाद ‘सापेक्षिता का सामान्य सिद्धांत’ दिया। वह ‘कलर्क’ अल्बर्ट आईन्स्टीन के नाम से विश्व विख्यात
वैज्ञानिक हुआ| कल्पना की शक्ति का उपयोग कर स्टीफन हाकिन्स
ने ब्रह्माण्ड का रहस्य खोल दिया। बच्चों में कल्पना की शक्ति और समझ बढाना बहुत
जरूरी है। कल्पना व्यक्ति के चेतना का विस्तार
अनन्त तक कर सकता है, और अनन्त के निष्क्रिय तत्वों को सक्रिय कर सकता है|
अनन्त स्वयं में सदैव और सतत चैतन्य नहीं होता है, बल्कि एक मानव ही अपनी
कल्पनाशीलता के साथ ब्रह्माण्ड के उन भागों को चैतन्य करता है, जिनको वह चैतन्य
पाना चाहता है| चेतना वह सक्रिय वास्तविकता है, जिसे भौतिकी के ‘उलझाव सिद्धांत’ (Entanglement
Theory) में देखा गया| इसे दुबारा पढ़ें|
तुम क्या बनोगी? एक बच्ची ने बताया कि वह डाक्टर बनेगी। वाह, डाक्टर! तब तो मैं जब बीमार पड़ जाऊँगा, तब तो
तुम मुझे सुई नहीं देकर सिर्फ पीने वाले दवाई ही दोगी? हाँ, दादा सर, और
आपके घर भी आ जाऊँगी आपको देखने। एक बच्चे ने बताया कि वह बड़ा होकर ‘बड़ा (समृद्ध) आदमी’ बनेगा। यह ‘बड़ा आदमी’ क्या होता है? दादा सर, बड़ा आदमी के पास बड़ा घर होता है, बड़ी गाड़ी होती है, बहुत पैसा होता है। वाह, मैंने कहा। तब तो मैं भी तुम्हारी गाड़ी में घूमूँगा। हाँ, दादा सर, एक सीट आपके लिए रहेगा। उसकी दीदी
बोली कि उस (बडे़) घर में मेरे लिए एक कमरा भी होगा। इसी तरह के अनेक सवाल होते
हैं और जबाब भी आते हैं। मेरा काम सिर्फ यह रहता है कि मैं उन बच्चों को ‘कल्पनाशीलता’
बताऊँ| यह भी बताऊँ कि वे बच्चे अपने सपनों की वास्तविक उड़ान कैसे भरेंगे?
एक दिन एक छोटा बच्चा – अंकुश, (गाँव
मुसेपुर, बिहटा) मेरे पास आया| मैंने
उससे पूछा कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगे?
उसने बड़ी सरलता से, और बड़ी सहजता से, लेकिन बड़ी दृढता से जबाब दिया - मैं
बड़ा होकर “आदमी” बनूँगा।
इसका जबाब तो एकबारगी साधारण लगा, पर मैं इस ‘असमान्य जबाब’ से
ठिठक गया। वैसे ही, जैसे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति
अब्दुल कलाम साहब एक बार गुजरात के आनन्द के एक विद्यालय की एक छात्रा स्नेहल ठक्कर के जबाब से ठिठक गए थे। इसे भारतीय राष्ट्रपति अब्दुल
कलाम ने अपनी पुस्तक “इग्नाइटेड माइण्ड” में अपने समर्पण में लिखा है| उसने बच्चों से पूछा था कि ‘तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है’? विविध जबाबों में एक जबाब ने उन्हें चौका दिया था।
छात्रा स्नेहल ठक्कर ने बताया कि 'गरीबी' ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। उनकी यह
पुस्तक 'इग्नेटेड माइन्ड' उसी
बच्ची को समर्पित है। ‘गरीबी’ के कारण
ही आदमी ‘अज्ञानी’ रह जाता है, और उसके व्यक्तित्व का महत्तम विकास नहीं हो पाता है| तब वह अपने समाज और मानवता को अपनी क्षमता के अनुरुप नहीं दे पाता है||
अब, मेरे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि ‘आदमी’ बनने का तरीका क्या होगा? क्या साहित्य ही एक ‘वनमानुष’ को
‘मानुष’, यानि ‘आदमी’ बनाता है? निश्चिततया ‘संवाद’ ने ही एक ‘पशु मानव’
(Animal Man) को ‘सामाजिक मानव’
(Social Man/ Homo Socius) बनाया, और फिर उसे ‘निर्माता मानव’ (Homo Faber) भी बनाया| इसी संवाद ने इसे आज ‘वैज्ञानिक मानव’ (Homo
Scientific) भी बनाया|
इसी ‘संवाद’ ने ही “साहित्य” को जन्म दिया और विकसित भी किया| सबका हित करना या समाज का हित करने वाला सामग्री ही 'साहित्य’ है| लेकिन आज साहित्य
में भी विवेकशीलता और सत्यता का दर्शन नहीं होता , या बड़ी मुश्किल से दर्शन होता
है| भारत के साहित्य पर सामन्ती संस्कृति का छाया फैला हुआ है| भारतीय संस्कृति के
मौलिक ग्रंथो को मध्ययुगीन सामन्ती काल में नष्ट कर दिया गया| आज उपलब्ध
सांस्कृतिक साहित्य सामन्तवादी हितों के अनुरूप सम्पादित और संशोधित है| इसके
शुद्ध स्वरुप को आधुनिक दर्शन (Modern Philosophy) के सहयोग से जाना जा सकता है|
इसे लिए ‘आधुनिक दर्शन’ का अध्ययन आवश्यक है|
लेकिन एक पशु को मानव होना ही पर्याप्त नहीं था, और है| उसे
‘आदमी’ बनना है| उसे
सिर्फ एक मानव नहीं होना है, उसे ‘मानवता
युक्त मानव’ होना है| इसके लिए ‘साहित्य’
और ‘दर्शन’ की अनिवार्यता है|
‘साहित्य’ मानव में सहानुभूति एवं समानुभूति
जगाकर उसे संवेदनशील बनाता है|
‘साहित्य’ के द्वारा हम एक दूसरे के प्रति के दुख, सुख, संघर्ष, प्रेम और
अन्य भावनाओं को महसूस करने लगते हैं| ‘साहित्य’ के नायक
हमें उसी तरह बनने को प्रेरित करते हैं| अनेक साहित्य इसीलिए ही रचे जाते हैं –
वास्तविक एवं काल्पनिक| साहित्य में अनेक ऐसे
पात्र हमें सत्य, न्याय, स्वतन्त्रता,
समता, बंधुता, प्रेम, साहस, त्याग और करुणा के आदर्श प्रस्तुत करते
हैं| इन साहित्यों के द्वारा व्यक्ति, परिवार
एवं समाज में नैतिक मूल्यों को स्थापित करते हैं|
लेकिन कोई ‘साहित्य’ बिना ‘आधुनिक दर्शन’ के समझ
के ‘समुचित’ नहीं हो सकता| ‘दर्शन’ देखने और समझने के प्रति दृष्टिकोण बदल देता
है| किसी भी सत्य का सार्थक अर्थ में बिना ‘दर्शन’ के नहीं समझा जा सकता| ‘समुचित
साहित्य’ ही हमें तर्कशील, विवेकशील,
मानवतावादी और वैज्ञानिक बनाता है| ‘सवाल खड़ा
करना’ ‘समुचित साहित्य’ का एक प्रमुख कार्य होना चाहिए|
‘समुचित साहित्य’ ही सभ्यता और संस्कृति को मानवीय बनाता है|
‘समुचित साहित्य’ ही आम-चिंतन, आत्म-अन्वेषण
एवं आत्म-मूल्याङ्कन करना सिखाता है| ‘समुचित साहित्य’
आत्म-भूमिका और आत्म-संतुलन का समन्वयन समझाता है|
संक्षेप में, ‘समुचित साहित्य’ हमें जीवन जीने का कला और
विज्ञान समझाता है, जीवन दर्शन को स्पष्ट करता है, मानव में मनुष्यता जगाता है, और मानव को ‘आदमी’ बनाता है|
इसीलिए, मानव को “आदमी” बनाने के लिए ‘समुचित साहित्य’ को ज़िंदा कीजिए| अर्थात, साहित्य के साथ ‘आधुनिक दर्शन’
का भी अध्ययन कीजिए|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
दार्शनिक,
शिक्षक एवं लेखक
अध्यक्ष,
भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान, बिहटा, पटना, बिहार|
अत्यंत सुन्दर, सटीक एवं सार्थक विश्लेषण।
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर एवं प्रेरक आलेख।
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