शनिवार, 29 मार्च 2025

इतिहास का झूठ कैसे समझें?

इतिहास का विषय वस्तु, चूँकि बीते हुए काल का होता है, और चूँकि प्राचीन काल बहुत पहले का होता है, इसीलिए प्राचीन इतिहास में कई कई झूठ को इतिहास के पन्नो में ‘सत्य’ की तरह स्थापित कर दिया गया होता है| ऐसा नहीं है कि प्राचीन काल के अतिरिक्त अन्य काल में अनेक झूठों को स्थापित नहीं किया गया है, लेकिन प्राचीन काल में अनेक झूठों को ‘सत्य’ की तरह अटल और स्थिर बना दिया गया है, लेकिन ये सब है एकदम ‘सफ़ेद झूठ’|

यह भी सही हो सकता है कि प्राचीन इतिहास की बहुत सी त्रुटियाँ अनजाने में हुई होगी, या अज्ञानतावश हुई होगी, लेकिन बहुत सी त्रुटिपूर्ण अवधारणाएँ साजिशतन भी स्थापित किया गया लगता है| लेकिन आज यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि उन त्रुटियों को ‘सत्य’ की ही तरह स्थापित रखने में, या तो अज्ञानतावश मजबूती दिया जा रहा है, या स्वार्थपन में संरक्षित एवं सुरक्षित कर ‘निरन्तरता’ दिया जा रहा है| अब तो ऐसा लगता है कि विज्ञान एवं तकनिकी के नाम पर इस खेल को और गति देने का प्रयास किया जा रहा है|

लेकिन कुछ आधुनिक एवं स्थापित वैज्ञानिक सिद्धांत ऐसे हैं, जो प्राचीन काल के बहुत से स्थापित ‘तथाकथित सत्य’ को ऐसे खंडित कर देते हैं, जो सब कुछ एक ही झटके में  स्पष्ट कर देता है, कि यह सब सिर्फ कपोल कल्पना ही है| आपको अपनी “आलोचनात्मक चिंतन” (Critical Thinking) को समृद्ध करने के लिए चार्ल्स डार्विन का ‘उद्विकासवाद’, सिगमण्ड फ्रायड का ‘मनोविश्लेषणवाद’, कार्ल मार्क्स का ‘ऐतिहासिक (वैज्ञानिक) भौतिकवाद’, अल्बर्ट आइन्स्टीन का ‘सापेक्षवाद’, फर्डीनांड दी सौसुरे का ‘संरचनावाद’, एवं जाक देरिदा का ‘विखण्डनवाद’ को अवश्य ही समझना जानना चाहिए|

इसमें सिर्फ चार्ल्स डार्विन का ‘उद्विकासवाद’ अकेले ही काफी है| साधारण एवं सरल शब्दों में, “उद्विकासवाद” यही कहता है कि कोई भी संरचना अपने जटिल अवस्था को अपने सरलतम अवस्था से ही सुधारते हुए प्राप्त करता है| अब इसका प्रयोग एवं उपयोग विविध विषयों में विभिन्न अवधारणाओं की सत्यता को समझने के लिए किया जाता है| यदि कोई भी अवधारणा अपनी प्रथम उत्पत्ति में ही जटिलतम अवस्था में आई है, तो वह अवश्य उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत के द्वारा ही मान्य होगा, जो अवश्य ही कल्पित है|

यदि कोई इतिहास अपनी विकासगाथा की व्याख्या में उद्विकासवाद को पर्याप्त स्थान नहीं देता है, यानि किसी वस्तु, या विचार यानि अवधारणाओं, या संस्था (सामाजिक, सांस्कृतिक, या आर्थिक आदि), या भाषा, संस्कृति, या घटनाओं की उत्पत्ति को उद्विकासवाद से व्याख्यापित नहीं करता है, या नहीं किया जा सकता है, तो स्पष्ट है कि वह भाग इतिहास के काल खंड में मात्र ‘झूठ’ है, ‘मिथक’ है, कल्पना है| इसी कारण ऐसी ही स्थिति में इनकी उत्पत्ति दैवीय बता कर ही व्याख्यापित किया जा सकता है, क्योंकि अन्य कोई आधार तार्किक हो ही नहीं सकता है| इतिहास का यदि कोई विचार, अवधारणा, संस्कृति, भाषा, घटना, या अन्य कोई संकल्पनात्मक उत्पत्ति की व्याख्या अप्राकृतिक हो, यानि दैवीय हो, तो आप स्पष्ट रूप में वैसी व्याख्याओं को, यानि इतिहास के वैसे भाग को, हिस्से को ‘इतिहास का झूठ’ मान सकते हैं| स्पष्ट है कि ऐसी व्याख्याओं को तार्किकता एवं वैज्ञानिकता के आधार पर व्याख्यापित किया जा संभव नहीं है| तब ऐसी व्याख्याएँ ‘बौद्धिक षड़यंत्र’ या ‘ऐतिहासिक घोटाले’ की तरह नजर आने लगती है|

अब प्राचीन इतिहास के कई हिस्सों पर “उद्विकासीय सिद्धांत” पर आधारित बड़े ही सरल एवं साधारण सवाल खड़े किये जा रहे हैं, जिसका ‘समुचित एवं पर्याप्त उत्तर’ दिया जाना मुश्किल हो रहा है| ‘समुचित एवं पर्याप्त उत्तर’ से तात्पर्य है कि ऐसा उत्तर, जो वैज्ञानिक हो, यानि तर्क पर, यानि कारण- कार्य के सिद्धांत पर आधारित हो, जिसका प्रमाण ‘प्राथमिक एवं प्रमाणिक’ हो और तथ्यात्मक भी हो| ऐसा ही उत्तर किसी को पूर्ण रूप से संतुष्ट कर पाता है| ‘समकालीन साहित्य’ को तो ‘प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण’ माना जा सकता है, लेकिन प्राचीनता के नाम पर बाद के काल में रचा हुआ पुरातात्विक साक्ष्य रहित साहित्य तो कतई ‘प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण’ नहीं माना जा सकता है| जो साहित्यिक प्रमाण ‘प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण’ पर आधारित नहीं है, वे ‘द्वितीयक प्रमाणिक प्रमाण’ भी नहीं हो सकते हैं, और इसीलिए इनकी प्रमाणिकता संदेह के घेरे में सदैव रहती है| यानि किसी पुस्तक में लिखी होने और उसे प्राचीन मात्र मान लेने से ही उसे ‘प्रमाणिक स्रोत’ नहीं माना जा सकता है|

यदि ‘कोई तथाकथित समाज’ अपने को किसी क्षेत्र विशेष में “मूल निवासी’ मानता है, तो उस पर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं| क्या उस समाज की मौलिक उत्पत्ति उसी क्षेत्र विशेष में हुई थी, या वे उस क्षेत्र विशेष में सबसे पहले रहने आए थे? ध्यान देने योग्य यह है कि सभी ‘वर्तमान मानव’ ‘होमो सेपियंस सेपियंस’ हैं, और हम सभी मानव की उत्पत्ति अफ्रीका के वोत्सवाना मैदान में कोई लगभग एक लाख वर्ष पूर्व एक ही ‘परिवार समूह’ से होने को स्थापित है| ऐसी स्थिति में कोई भी समाज या संस्कृति को अपनी ऐतिहासिक गाथा उसी उदविकासीय कड़ी में स्थापित करना होगा, अन्यथा वह झूठा है| यदि किसी प्रदेश में आप्रवासियों के झुण्ड के बार बार आते रहने की प्रक्रिया रही है, तो उस प्रदेश विशेष कोई भी मूल निवासी नहीं है, और कोई भी विदेशी नहीं है| इस तरह ‘मूल निवासी’ एवं ‘विदेशी’ की कहानी पूरी तरह झूठी है|

यदि कोई “भाषा” अपने को किसी भी क्षेत्र में ‘प्राचीनतम’ बताने का दावा करती है, तो सवाल यह है कि उसका सरलतम स्वरुप क्या रहा था, जिससे वह विकसित होकर आज तथाकथित समृद्ध एवं विकसित हुआ है? यदि किसी ऐसी भाषा को कोई दूसरे प्रदेशों से अपने साथ लाया है, तो वहाँ इसके होने के कोई प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध हैं? चूँकि सभी वर्तमान मानव एक ही परिवार समूह की संताने हैं, इसलिए इस आधार पर भी भाषाई समानता को ध्यान में रखना होगा| किसी भी समृद्ध एवं विकसित भाषा ऐसी ही किसी ‘उन्नत’ अवस्था में उत्पन्न हुई थी, यह मानना संभव नहीं है| कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी प्राचीन साहित्य की सामग्री को नई भाषा में अनुवादित कर या संपादित कर नया साहित्य रच दिया गया हो, और पुराने साहित्य को अब अप्राप्त बना दिया गया हो? फिर ऐसी नई साहित्य को ही प्राचीनतम बताया जा रहा है, जिसकी अधिकतर सामग्री वास्तव में प्राचीनतम ही है| यदि ऐसी किसी भाषा के साहित्य को पुरानी बतायी जाती है, तो उसे इन प्रश्नों का संतोषप्रद उत्तर देना ही होगा, अन्यथा उसकी प्राचीनता पर सवाल खड़े ही रहेंगे|

भारतीय क्षेत्र में सामाजिक विभाजन का प्रमुख आधार वर्ण एवं जाति है, जिसकी उत्पत्ति मध्य युग में सामन्तवाद के कारण हुई, लेकिन कतिपय ‘जातियों के इतिहासकार’ इसे प्राचीन काल में स्थापित करना चाहते हैं| कुछ लोग तो कई प्राचीन ऐतिहासिक सम्राटों को जातीय आधार देना चाहते हैं, जबकि उस समय जातियों का उद्भव हुआ ही नहीं था| यदि यह वर्ण एवं जाति की उत्पत्ति प्राचीन काल में ही हुई थी, तो इसके उद्भव की प्रक्रिया क्या थी? इस प्रश्न के तार्किक उत्तर नहीं देने पर यह मान लेना सामान्य है कि वर्ण एवं जाति की उत्पत्ति मध्य काल में ही हुई थी|

कुछ तथाकथित बौद्धिक यह मानते हैं कि इन वर्णों एवं जातियों की व्यवस्था एक ‘ख़ास वर्ण एवं जाति’ के लोगों ने बनायी, तो उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उस ‘ख़ास वर्ण एवं जाति’ का उद्भव कैसे हुआ? ऐसे तथाकथित बौद्धिकों को “वैज्ञानिक भौतिकवाद” के बारे में कोई समझ नहीं है, यानि ऐसे तथाकथित बौद्धिकों को ऐतिहासिक शक्तियों, यानि आर्थिक शक्तियों की क्रियाविधि की समझ नहीं है| ये सभी वर्ण एवं जातियाँ सामन्ती व्यवस्था की ऐतिहासिक उपज है, और इसमें किसी व्यक्ति विशेष या किसी खास जाति विशेष की कोई ऐतिहासिक भूमिका नहीं है|

कुछ तथाकथित बौद्धिकों का यह मानना होता है किसी ख़ास प्रदेश की संस्कृति किसी दूसरे प्रदेश से संस्कृतियों के प्रवाह के परिणाम है, यानि किसी ऐसे प्रदेश की संस्कृति किसी ख़ास प्रदेश से आयी है| यह सही भी हो सकता है| लेकिन ऐसे दावा करने वालों को यह भी स्थापित करना होगा कि वहाँ यह संस्कृति कैसे उत्पन्न हुई, जहाँ से यह संस्कृति आयी हुई बतायी जा रही है? यदि यह व्याख्या करने में वैसे लोग सक्षम नहीं हैं, तो उनके दावों पर प्रश्न खड़ा हो जाता है|

आप देख रहे होंगे कि कई क्षेत्रों की ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति एवं इतिहास ऐसे ही आधारों पर स्थापित हैं, जिनकी कोई वैज्ञानिक तार्किक आधार नहीं है| यदि ऐसी ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति एवं इतिहास पर ऐसे ‘उदविकासीय सवाल’ खड़े होते हैं, ती इनकी सारी ऐतिहासिकता एक ही झटके में ध्वस्त हो जाती है| आप भी सोचिए, और अपने आसपास देखिए|

ऐसे ही सवाल “स्थापित इतिहास” को उल्टा कर देते हैं|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

गुरुवार, 27 मार्च 2025

हमें किससे विवाह नहीं करना चाहिए?

क्या हम सभी से विवाह नहीं कर सकते? यदि हम एक ‘स्तनपायी पशु’ हैं, तो क्या हम सभी प्रकार के स्तनपायी पशुओं से विवाह कर सकते हैं? यदि हम सभी ‘होमो सेपियन्स सेपियन्स’ हैं, तो क्या हम सभी प्रकार के होमो सेपियन्स सेपियन्स से विवाह कर सकते हैं? ध्यान रहे कि वर्तमान सभी मानव ही ‘होमो सेपियन्स सेपियन्स’ कहलाते हैं| तो क्या विवाह का एकमात्र उद्देश्य ‘यौन संतुष्टि’ ही है? इन सभी का एक स्पष्ट उत्तर है – नहीं, ऐसी बात नहीं है| तो विवाह क्या होता है, क्यों होता है, और इसकी मूल, मौलिक एवं आधारभूत अनिवार्यताएं क्या है?

विवाह एक ‘सामाजिक सांस्कृतिक संस्था’ है| पशुओं और मानव में इसी ‘सामाजिक सांस्कृतिक संस्था’ के निर्माण एवं कार्य ही आधारभूत भिन्नता देता है, जो एक मानव को अन्य पशुओं से अलग करता है| यही ‘सामाजिक सांस्कृतिक संस्था’ ही सभ्यता एवं संस्कृति के नियमन एवं सञ्चालन की ‘निर्मात्री इकाई’ होती है, जिसके बिना मानव सभ्य एवं सुसंस्कृत नहीं हो सकता| इस ‘सामाजिक सांस्कृतिक संस्था’ के बिना तो मानव भी पशुओं का एक झुण्ड मात्र होता| सभी वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक एवं अन्य संस्थाएँ इन्ही अवधारणाओं पर आधारित है| लेकिन किसी भी संस्था का निर्माण प्रकृति के मूल, मौलिक एवं आधारभूत स्वभाव, लक्षण एवं क्रियाविधियों के विरुद्ध लम्बे समय के लिए नहीं किया जा सकता| यदि किसी भी संस्था का निर्माण प्रकृति के किसी भी स्वभाव के विरुद्ध किया जाता है, तो वह सब परिवार, समाज, संस्कृति एवं मानवता को नष्ट करता हुआ होगा| आपने ने भी प्रकृति में देखा होगा कि सभी उच्चतर चेतना के पशु पक्षी आदि विपरीत लिंगी का युग्म ही एक साथ रहकर प्रकृति की नियति को आगे बढाता हुआ होता है| विपरीत लिंगी मानव, यानि ‘Man’ एवं ‘Womb’ वाला ‘Man’ (Woman) ही मिलकर एक ‘प्राकृतिक इकाई’ बनता है| मतलब एक सामान्य मानव (पुरुष) एवं एक ‘गर्भाशय’ वाला मानव (स्त्री)_ही प्राकृतिक रूप में एक दुसरे का पूरक है, और दोनों ही मिलकर एक प्राकृतिक इकाई बनाता है| बाकी सब अप्राकृतिक है| इसे समझना है, यदि कोई अप्राकृतिक स्वभाव का नहीं है|   

कुछ लोग समझते हैं कि एक विवाह का मूल एवं मौलिक आधार दो मानवों की यौन संतुष्टि है, और इसी आधार दो ‘विपरीत लिंगी मानवों’ (स्त्री एवं पुरुष) के अतिरिक्त अब ‘समान लिंगी मानवों’ (स्त्री एवं स्त्री और पुरुष एवं पुरुष के बीच) के विवाह की बातें भी होने लगी है, और कुछ संस्कृतियों में वैधानिक मान्यता भी दे दिया गया है| विवाह एकमात्र यौन संतुष्टि के लिए के लिए गठित प्रक्रम नहीं है| किसी भी संस्था का गठन एक मूल, मौलिक एवं आधारभूत उद्देश्य के लिए होता है, जिसका अंतिम लक्ष्य मानवता की सेवा करना है, और भविष्य को सुरक्षित रखना है| मानवता के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मानवों की निरंतरता अनिवार्य है, और इसके लिए बच्चे का जनन होना और उसका पालन पोषण कर उसे वयस्क एवं समझदार बनाना जरुरी है| कोई भी किसी बच्चे का पालन पोषण तो कर सकता है, लेकिन बच्चे जनने के लिए विपरीत लिंगी मनवो के मिलन के द्वारा ही संभव है| किसी विपरीत लिंगी मानवो के द्वारा बच्चा जनना कतिपय कारणों (बीमारी/ विकलांगता) से संभव नहीं भी हो सकता है, लेकिन इन अपवादों को सामान्य सिद्धांत मान लेना और इसे संस्थागत स्वरुप दे देना भी प्रकृति के मौलिक चरित्र के विरुद्ध है|

प्रकृति के अनुकूल एवं अनुरूप परिवार का मूल एवं मौलिक कार्य बच्चे का जनन करना एवं पालन पोषण करना है| वैसे बच्चे के पालन पोषण के लिए ‘खंडित परिवार’, ‘संयुक्त परिवार’, एवं ‘विस्तारित परिवार’ हो सकता है, और समाज भी इस कार्य को एक परिवार के रूप में करता है, लेकिन बच्चे का जनन करना एवं उसे सामाजिक वैधता देना ही ‘विवाह’ संस्था का एकमात्र प्राथमिक कार्य होता है| वैध यौन संतुष्टि के लिए अन्य व्यवस्था हो सकता है| यदि कोई समान लिंगी यौन संतुष्टि चाहता है, या कोई अन्य व्यवस्था उसे संतुष्टि देता है, तो एक व्यक्ति की स्वतन्त्रता के रूप में, व्यक्तिवाद के रूप में उसे मान्यता मिल सकती है, सामाजिक स्वीकृति मिल सकती है, और उसे बनाये रखना किन्ही व्यक्तियों का आपसी मामला हो सकता है, लेकिन इसे ‘विवाह’ नहीं माना जा सकता है, जो एक संस्था है|

इसी प्राकृतिक स्वभाव की अनिवार्यता के कारण सामान लिंगी में विवाह प्राकृतिक नहीं है| जैसा अब बदलते समाज में सामान्य होता जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी के साथ विवाह के अतिरिक्त अन्य के साथ, यौन सम्बन्ध बना ले रहा है और जीवन जी रहा है| लेकिन ऐसे समान लिंगी विवाह को एक संस्था के रूप में वैधानिक स्वीकृति नहीं ही दी जानी चाहिए| ‘यौन संतुष्टि’ एक अलग मामला है, और एक ‘संस्थागत गठन’ दूसरा एवं गंभीर मामला है| सभी मानवीय भावनाओं को ‘संस्थागत स्वीकृति’ नहीं दी जा सकती है, अन्यथा कोई पशुओं के साथ भी अपने यौन संतुष्टि, जिसे अप्राकृतिक कहा जाता है, को सामाजिक स्वीकृति के साथ साथ ‘संस्थागत स्वीकृति’ भी चाहेंगे|

ध्यान दें, विपरीत लिंगी मानवों के मध्य सभी विवाह वैधानिक होते हुए भी उपयुक्त एवं समुचित नहीं माना जाता है| आप समाज में अक्सर देखते हैं कि विवाह से गठित परिवार भी तनाव का शिकार रहता है, जिसके कई कारण हैं| पहला एवं सबसे महत्पूर्ण कारण तो स्त्री एवं पुरुषों के भिन्न भिन्न मनोवैज्ञानिक गठन एवं समझ है, जिसके बारे में लेखक John Grey की प्रसिद्ध पुस्तक “Men are from Mars, Women are from Venus” में बेहतर ढंग से समझाया गया है| यदि दोनों वैवाहिक युगल में ‘चेतना’ का स्तर  उच्चतर होता है, यानि समझदारी का स्तर उच्चतर होता है, तो एक विवाह, यानि इससे गठित परिवार मजे से चलता होता है| यदि किसी वैवाहिक युग्म में कोई एक भी चेतना या समझदारी  के उच्चतर स्तर पर होता है, तो उस विवाह को दिक्कत नहीं आती है| लेकिन यदि दोनों ही चेतना के निम्न स्तर पर रहता है, यानि चेतना के स्तर पर एक पशु के समान स्तर का होता है, तो जीवन तनावग्रस्त रहना भी एक सामान्य जीवन हो जाता है|

इसीलिए यदि आपने यदि अभी तक विवाह नहीं किया है, या अपने किसी नजदीकी के विवाह होने की जानकारी है, तो उसकी प्रकृति को समझ लें| चूँकि सभी वर्तमान मानव एक परिवार- समूह से जन्मे हैं, और इसीलिए सभी की जीनीय गठन में फेनो टाईप (Pheno Type) संरचना में भिन्नता होते हुए भी जीनों टाईप (Geno Type) संरचना समान होती है| अर्थात किसी भी आदमी का बच्चा आदमी (जीनों टाईप समानता) ही होगा, भले उसका रूप-रंग एवं कद- काठी यानि बाह्य स्वरुप (फेनो टाईप संरचना) भिन्न भिन्न होगा| कहने का तात्पर्य यह है कि वैसे आप किसी भी विपरीत लिंगी से विवाह कर सकते हैं| लेकिन चूँकि मानव चेतना युक्त प्राणी है और इसी कारण यह एक पशु से मानव भी बन सका है, इसीलिए जीवन भर साथ रहने के लिए समान चेतना यानि समझ की जरुरत होती है|

‘परिस्थिति’ बदलती रहती है, और इसीलिए इसके ‘अनुकूलन’ की अनिवार्यता के लिए ‘समाज’ भी बदलता रहता है, और इसी कारण सामाजिक ‘मानक’ ‘मूल्य’ (Value) एवं ‘प्रतिमान’ (Norm) भी बदलता रहता है| इसी को “संस्कृति का बदलना” भी कहते हैं| आज विश्व की सभी संस्कृतियाँ एक ‘वैश्विक संस्कृति’ के निर्माण की ओर अग्रसर है| इस परिवर्तन को कोई भी नियंत्रित नहीं कर सकता है, कोई भी नहीं रोक सकता है, क्योंकि सभी सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्कृतियाँ वैश्चिक बाजार की शक्तियों से नियमित, निर्देशित एवं नियंत्रित हो रही है| कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी किसी भी संस्कृति के, यानि किसी भी जाति, प्रजाति, धर्म एवं सम्प्रदाय में विवाह कर सकता है, लेकिन इतना अवश्य ही ध्यान रहे कि वैवाहिक युग्म में न्यूनतम किसी एक का चेतना स्तर उच्चतर स्तर का हो, या समान स्तर का अवश्य हो| तब ही उस विवाह के सफल होने की संभावना है| दरअसल समायोजन के लिए समझदारी चाहिए, जिसे ही “चेतना” का उच्चतर स्तर कहते हैं| इसीलिए कोई भी सभी से विवाह नहीं कर सकता है, या नहीं करना चाहिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष. भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्था

गुरुवार, 20 मार्च 2025

हम जीवित क्यों हैं?

एक बड़ा ही अहम सवाल है कि ‘हम जीवित क्यों हैं’? ‘जीवन क्या है’? अर्थात ‘जीवन का उद्देश्य क्या है’? वैसे प्रथम दृष्टया यह सब बड़ा ही साधारण एवं सरल सवाल लग सकता है, लेकिन इसका उत्तर बहुत ही व्यापक एवं गहन है, और इसका प्रभाव भी बहुत ही दूरगामी है| यदि अब तक आपने इस प्रश्न पर ठहर कर विचार नहीं किया है, तो आपका जीवन उद्देश्यहीन गेंद की तरह ही इधर उधर लुढकता रह सकता है, या उद्देश्यहीन भटकता रह सकता है| स्पष्टतया सभी जीवित मानव को यह अवश्य ही जानना एवं समझना चाहिए कि ‘हम जीवित क्यों हैं’? ‘जीवन क्या है’? अर्थात ‘जीवन का उद्देश्य क्या है’?

दरअसल कोई भी चीज यदि जीवित है, तो यह स्पष्ट है कि वह ‘चेतन’ (Conscious) है, यानि उसमे ‘चेतना’ है| किसी भी बदलती रहने वाली स्थिति या परिस्थिति के प्रति सचेत रहने की, यानि ‘चेते’ (Alert) रहने की प्रवृति, यानि प्राकृतिक स्वभाव ही ‘चेतना’ है| ‘चेत जाना’ एक स्वभाव है, जो अपने पर्यावरण के बदल जाने की स्थिति में उसके प्रति अनुकूलित (Adjust/ Adopt) हो जाने के लिए तैयार एवं तत्पर रहता है, चैतन्य रहता है, सचेत रहता है| इसी कारण किसी ‘विचार- शून्य मानव’ को समाज ‘चलता फिरता लाश’ भी कह देता है, मान लेता है| इसी प्राकृतिक स्वाभाव को, इसी स्वाभाविक एवं सहज गुण को ‘चेतना’ (Consciousness) कहते हैं| इस ‘चेतना’ को आप दूसरे शब्दों में, मानव के सन्दर्भ में ‘मन’ (Mind) कह सकते हैं, ‘आत्म’ (Self) भी कह सकते हैं, लेकिन इसे आप ‘आत्मा’ (जो अजर अमर है, और अपने कर्मों के साथ पुनर्जन्म भी लेती है) नहीं कह सकते हैं| यही गुण, स्वभाव, प्रकृति ही किसी चीज को सजीव बनाती है, अन्यथा वह निर्जीव कहलाती है| अत: ‘सचेत’ रहने की ‘चैतन्य अवस्था’ ही ‘जीवन’ है|

हम जीवित क्यों है? किसी “जीवित” के सम्बन्ध में हम आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में, यानि भौतिकी के ‘क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत’ (Quantam Field Theory) की भाषा में कह सकते हैं कि ‘जब किसी वस्तु के एक खास रासायनिक जैवकीय संरचना, यानि कोई ‘क्रोमोजोम’ (Chromosome) या ‘क्रोमोजोम के सेट’ प्रकृति के ‘अनन्त प्रज्ञा’ (Infinite Intelligence) से, यानि ‘एकीकृत क्षेत्र बलों’ (Unified Field Forces) से एक ख़ास किस्म की ऊर्जा ग्रहण करता है, तब वह जीवित हो उठता है, और जबतक उस ऊर्जा का वह आदान प्रदान करता रहता है, तब तक वह जीवित कहलाता है’| इस ऊर्जा को आप "जीवन- ऊर्जा" (Life Energy) कह सकते हैं। और उसकी शारीरिक कोशिकाएँ अपने ‘क्रोमोजोम’ (Chromosome) या ‘क्रोमोजोम के सेट’ को उसकी मौलिक संरचना में यथावत एवं कार्यकारी बनाए रखने की शक्ति अपने ‘जीवन उद्देश्य’ से ही प्राप्त करता है| अर्थात जब तक उसका ‘जीवन उद्देश्य’ स्थिर, सुनिश्चित एवं व्यापक नहीं होता है, तब तक उसे जीवन जीने की शक्ति या प्रेरणा भी नहीं मिल पाता है| चूँकि ‘वनस्पति जीवन’ या ‘सूक्ष्म जीवन’ चिंतन मनन नहीं कर सकता है, इसीलिए उसका जीवन उद्देश्य प्रकृति द्वारा ही उसके क्रोमोजोम में निर्धारित एवं सुनिश्चित रहता है|

जब उस वस्तु, या जीवित जीव के कोशिकाओं के ‘क्रोमोजोम संरचना’ छिन्न भिन्न होने लगती है, यानि उस ‘एकीकृत क्षेत्र बलों’ से ऊर्जा प्राप्त करने में असमर्थ हो जाती है, तो वह वस्तु या जीवित जीव मृत्यु को प्राप्त कर लेती है, और निर्जीव हो जाती है| यह विशिष्ट उर्जा किसी ख़ास कम्पन (Frequency) पर ही कार्य करता है, अन्यथा वह कार्य ही नहीं करता है| इस पैरा को दुबारा बड़े ही ध्यान से अवलोकन करें| उर्जा की यह क्रियाविधि कोशिकाओं के प्रत्येक ‘क्रोमोजोम’ के स्तर पर निरन्तर चलता रहता है, और इसीलिए किसी जीवित की मृत्यु के उपरान्त भी उसके विभिन्न अंगों का प्रत्यारोपण संभव हो जाता है| स्पष्ट है कि यह चेतना या आत्म की एक एकीकृत ‘शक्ति- पुंज’ की तरह नहीं होती है, और इसीलिए यह किसी ‘आत्मा’ की अवधारणा का खण्डन भी करता है|

लेकिन एक मानव अपने बदलते स्थिति एवं परिस्थिति में अनुकूलन (Adoptation) करने के लिए चिंतन मनन कर सकता है, इसीलिए एक मानव अपने ‘जीवन उद्देश्य’ का निर्धारण एवं सुनिश्चयन भी कर सकता है| विज्ञान भी मानता है कि चिन्तन मनन की क्षमता, यानि ‘बुद्धि का प्रकाश’ प्रत्येक मानव में प्राकृतिक रूप में विद्यमान है, वह प्रयास करके तो देखे| तो हमारे ‘जीवन का उद्देश्य क्या है’? इस प्रश्न एवं उत्तर को समझने से पहले एक वास्तविक प्रसंग प्रस्तुत करना चाहता हूँ| मैंने (शायद) एक TEDx आयोजन (Event) में एक मेडिकल सर्जन की आपबीती सुन रहा था| आप इस प्रसंग के सार (Essence) पर ही ध्यान देंगे, लेकिन संज्ञावाचक (नामों) तथ्यों पर ध्यान नहीं देंगे|

उसने बताया कि एक दिन अपने क्लिनिक से निकलने वक्त एक 26 वर्षीय युवा की लगभग मृत शरीर उपचार के लिए लाया गया| खैर, उसे बचा लिया गया| जब उसके ‘क्रोमोजोम संरचना’ सम्बन्धी प्रतिवेदन उपलब्ध हुआ, तो वह चिकित्सक आश्चर्यचकित था| उस ‘क्रोमोजोम संरचना’ सम्बन्धी प्रतिवेदन में उसकी ‘क्रोमोजोम संरचना’ इस तरह छिन्न भिन्न थी, कि उसकी उम्र कोई सत्तर से अस्सी वर्ष के मध्य बताया गया था| उसके परिजनों से यह पता लगा कि वह युवक चार्टर्ड अकाउंटेंट था, उसकी पत्नी एक साफ्टवेयर इंजीनियर थी, उसको चार माह की एक बच्ची भी थी, और उसका विगत चार माह से तलाक की प्रक्रिया न्यायलय में विचाराधीन था| वह चिकित्सक समझ गया कि उस युवक का ‘जीवन उद्देश्य’ उसके केन्द्रित परिवार तक ही सीमित था, उससे अलग होने की प्रक्रिया के बाद उसका ‘जीवन उद्देश्य’ ही समाप्त हो गया था, और तब वह क्यों जीवित रहता?| इस जीवन उद्देश्य को समझ लेने के बाद वह परिवार फिर से एक हो सका|

एक आधुनिक वर्तमान मानव वस्तुत: ‘होमो सेपियंस सेपियंस’ है, और एक स्तनपायी पशु ही है| एक पशु बच्चे पैदा करता है, उसे पालता पोषता है, और फिर उसे ही देखता हुआ मर भी जाता है| यदि कोई दो पैरो वाला पशु (मानव) भी ऐसा ही करता है, तो यह स्पष्ट है कि उस मानव का जीवन उद्देश्य भी एक पशु की ही तरह बहुत ही सीमित होता है| और जब उसका उस छोटे पारिवारिक इकाई से कोई निराशा, हताशा, या खिन्नता, या अलगाव पाता है, तो उसका ‘जीवन उद्देश्य’ ही खण्डित हो जाता है, या नष्ट हो जाता है और फिर उसके जीवित रहने की प्रेरणा शक्ति ही समाप्त हो जाती है| यदि कोई अपने ‘जीवन उद्देश्य’ में विस्तृत समाज को, मानवता को भी समा लेता है, तो वह महान हो जाता है| यदि कोई अपने ‘जीवन उद्देश्य’ में ‘प्रकृति’ सहित ‘भविष्य’ को भी समाहित कर लेता है, तो वह “बुद्ध” हो जाता है| जब किसी का ‘जीवन उद्देश्य’ बहुत ही व्यापक, गहन और विस्तृत हो जाता है, उसके ‘जीवन उद्देश्य’ की प्रेरक शक्ति भी बहुत ही व्यापक, गहन और विस्तृत हो जाता है| उसके जीवन में किसी भी छोटे मोटे कारकों के विपरीत होने से भी उसकी जीवित रहने की प्रेरणा शक्ति कमतर नहीं होती| तब वह जीवित रहने के लिए वह हर संभव सजग एवं सतर्क प्रयास करता रहता है, जो उसके ‘जीवन उद्देश्य’ की प्राप्ति के अनिवार्य होता है|

मैं अपने 08 मार्च 2025 के आलेख – “मैं कौन हूँ” (niranjan2020.blogspot.com) में भी इन स्थितियों को स्पष्ट किया हूँ| यह प्रकृति का स्पष्ट नियम है कि कोई भी वस्तु –निर्जीव या सजीव, सदैव ही किरणें वितरित करती रहती है, यानि वह सदैव ही वितरित करती रहती है; यदि वह उसका तापमान शून्य (0 – Zero) डिग्री केल्विन से अधिक हो, और सभी वस्तुओं का तापमान सदैव ही इस न्यूनतम से अधिक ही होती है| लेकिन यदि कोई सजीव आपतित से अधिक ही वितरित करता है, तो उसे नष्ट होना ही है| इसलिए अपने ‘जीवन उद्देश्य’ में ‘वितरित करना’ यानि ‘देना’ भी सुनिश्चित करें, अन्य चीजों के अतिरिक्त आप अपना प्यार- स्नेह, ज्ञान, विचार, वैचारिकी, दृष्टि, समय भी दे सकते हैं, ताकि आपके जीवन के बाद भी इसके लिए आपको मानवता याद करे| प्रकृति के इन नियमों के विपरीत जाने की सोचना भी बहुत ही घातक है|

इसलिए,

अपने ‘जीवन उद्देश्य’ पर विचार कीजिए,

और मानवता के भविष्य को कुछ देते रहिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

मंगलवार, 18 मार्च 2025

धर्म - व्यक्ति की, या सत्ता की आवश्यकता है?

धर्म एक बड़ा ही गंभीर, गहन, एवं विस्तृत अध्ययन क्षेत्र है, जो मानव जीवन की समझ को प्रभावित करने का कार्य करता है| और शायद इसीलिए यह विषय भी विवादास्पद और संवेदनशील भी माना जाता है| वैसे ‘धर्म’ के सम्बन्ध में यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि ‘धर्म’ की संकल्पना यानि अवधारणा (Concept) क्या है? अर्थात कोई भी किसी धर्म से क्या समझता है? वैसे पालि के ‘धम्म’ एवं संस्कृत यानि हिंदी के ‘धर्म’ दिखते तो हैं एक समान, लेकिन संरचनात्मक एवं निहित अर्थ में सर्वथा भिन्न है, हालाँकि शब्द ‘धर्म’ पालि के ही ‘धम्म’ शब्द का ही सुसंस्कृत (संवर्धित) स्वरुप है| लेकिन ‘संरचनावाद’ (Structuralism) के विद्वान् एक ‘धर्म’ को एक ‘धम्म’ की ही तरह एक ‘मजहब’ और एक ‘रिलीजन’ से भी भिन्न मानते हैं| इस तरह, यहाँ एक प्रचलित एवं परंपरागत ‘धर्म’ को ही इस प्रसंग में रखूँगा| आप इसे कार्ल मार्क्स वह का ‘धर्म’ समझ सकते हैं, जिसे उसने ‘अफीम’ के नशे की तरह एक ‘नशा’ उत्पन्न करने वाला बताया|

जब भी धर्म को समझने की बात आती है, तब ‘दर्शन’ और ‘अध्यात्म’ की बात आ ही जाती है, या इन दोनों अवधारणाओं को ‘धर्म’ के साथ जबरदस्ती ला ही दिया जाता है| आप यह भी कह सकते हैं कि धर्म के मूलभूत, मौलिक एवं मूल तत्वों को समझने की प्रक्रिया में इन दोनों को, यानि ‘दर्शन’ और ‘अध्यात्म’ की अवधारणाओं को ढाल बना कर इस विषय को ‘और जटिलतर’ बना दिया जाता है|

हमें ‘दर्शन’ और ‘अध्यात्म’ की संकल्पना को भी समझ लेना चाहिए| सामान्यत: धर्माचार्य लोग ‘अध्यात्म’ की बात करते हैं, लेकिन इन संकल्पना को इस तरह प्रस्तुत करते हैं, कि वे जब चाहे तब कुछ नयी व्याख्या कर सकें, क्योंकि इस सम्बन्ध में वे खुद ही स्पष्ट नहीं जानते होते हैं| वे कहानियाँ गढ़ देंगे, उदाहरणों का अम्बार लगा देंगे, परन्तु सामान्यत: आपकी समझ के लिए उस अवधारणा को स्पष्ट नहीं करेंगे, या नहीं कर सकते| दरअसल ‘अध्यात्म’ दो शब्दों ‘अधि’ (Above) और आत्म (Self/ Mind) से बना है| जब कोई अपने ‘आत्म’ को, यानि अपने ‘मन’ को, यानि अपनी ‘चेतना’ को ‘अधि’ से, यानि ‘अनन्त प्रज्ञा’ (Infinite Intelligence) से जोड़ लेता है, उस प्रक्रम या प्रक्रिया को ‘अध्यात्म’ कहते हैं| यह ‘ज्ञान’ प्राप्त करने की उत्कृष्ट विधि है, और इसे ही ‘अंतर्ज्ञान’ भी कहते हैं| यदि आप मुझसे कुछ उदहारण के साथ अध्यात्म की स्पष्टता चाहते हैं, तो मैं तीन आध्यात्मिक व्यक्तियों का उदाहरण देता हूँ – प्राचीन काल में ‘बुद्ध’, बीसवीं शताब्दी में ‘अल्बर्ट आइन्स्टीन’ और इस शताब्दी में ‘स्टीफन हावकिन्स’| इन तीनों ने अपनी ‘आत्म’ को, यानि अपनी ‘चेतना’ को ‘अनन्त प्रज्ञा’ के संपर्क में ला कर मानवता को वह ज्ञान दिया, जिससे व्यापक मानवता लाभान्वित है| वैसे ‘सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था’ (Cultural Economy – कुछ लोग इसे ही ‘धार्मिक अर्थव्यवस्था’ भी कहते समझते हैं) के बाजार में प्रचलित अन्य अवधारणाओं के सम्बन्ध में, या तथाकथित मठाधीशों के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है| यहाँ यह भी ध्यान रहे कि मैंने ‘आत्म’ (Self) की चर्चा की है, लेकिन इससे मिलता जुलता ‘आत्मा’ नहीं है|

वैसे ‘दर्शन’ किसी भी चीज को सम्यक एवं समुचित ढंग से देखना समझना होता है| इसीलिए दर्शन का मूल विषय ‘जीवन’, ‘समाज’ और ‘सत्ता’ के मूलभूत, मौलिक एवं मूल तत्वों को, यानि मूल भावों (Essence) को समझना ही है| समाज का अभिजात वर्ग ही सत्ता पर नियंत्रण रखता है, और संचालित एवं नियमित भी करता रहता है, भले आपको ‘सत्ता’ के भौतिक चेहरे या स्वरुप कुछ अलग दिखता हो| इसीलिए समाज का अभिजात वर्ग ‘दर्शन’ के उपकरणों, यानि ‘दर्शन’ की संकल्पनाओं के सहारे ही एक समानान्तर ‘आभासी’ (Virtual) एवं भ्रामक दुनिया बनाता है, जो तथाकथित ‘विशिष्टता’, ‘सर्वोच्चता’, ‘भिन्नता, और ‘दिव्यता’ पर आधारित होता है| अभिजात वर्ग इन्हीं ‘विशिष्टता’, ‘सर्वोच्चता’, ‘भिन्नता, और ‘दिव्यता’ के आधार पर सामान्य जनों को वास्तविक दुनिया की वास्तविक कठिनाइयों से विमुख करने में और कल्पनाओं की दुनिया पर विश्वास दिला पाने में सफल हो पाते हैं| इन तथाकथित दार्शनिक एवं आध्यात्मिक व्याख्यायों के आधार ही सामान्य जन अपनी गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, सम्मान एवं गरिमा की समस्यायों पर ध्यान नहीं देकर अपनी काल्पनिक परलोक को सुधारने में ही विश्वास करते हैं| इसीलिए अधिसंख्य दार्शनिक सामान्य जीवन के अस्तित्व को बेहतर बनाने में, यानि सामान्य जीवन की प्रकृति एवं नियति को समझने या स्पष्ट करने में ‘अपना समय’ नहीं लगाते हैं| इसीलिए अधिकतर लोग दर्शन को ‘झूठ का बौद्धिकीकरण’ भी कहते या समझते हैं| इसीलिए सामान्य लोग ‘दर्शन’ को “मायावी तर्कशीलता” (Elusive Logic - काल्पनिक यानि दिखने मात्र के लिए तर्कशीलता) भी मानते हैं|  

‘दर्शन’ प्रत्यक्षत: किसी को ‘सत्ता’ तो नहीं देता या दिलाता है, लेकिन ‘सत्ता’ पर काबिज होने की समझ अवश्य ही देता है| इसीलिए जिनको ‘दर्शन’ की कोई भी समझ नहीं होती है, वे निश्चितया ही एवं सदैव ही ‘सत्ता’ से बहुत दूर होते हैं| दरअसल ‘सत्ता’ अलग कुछ नहीं है, यह मात्र ‘व्यवस्था की सुविधा’ का सुनिश्चयन होता है| ‘जीवन की व्यवस्था की सुविधा’ यानि ‘सत्ता’ से अलग कोई भी वास्तविक दर्शन हो भी नहीं सकता है| ‘धर्म’ को व्यक्ति की आवश्यकता से ज्यादा सत्ता के लिए “वैचारिक घातक अस्त्र” के रूप समझा जाना चाहिए| इसीलिए ‘सत्ता’ की यह अनिवार्यता होती है कि वह ‘धर्म’, ‘अध्यात्म’ और ‘दर्शन’ को एक साथ मिला कर अपनी दिशा में मोड़ ले, यानि अपने पक्ष में उपयोग एवं प्रयोग करे| दरअसल ‘वैज्ञानिक दर्शन’ वास्तव में ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ पर आधारित होता है, लेकिन ‘दर्शन’ को सत्ता के समर्थन में ‘मायावी तर्कशीलता’ के रूप में ही सामान्य जनों के मध्य प्रस्तुत किया जाता है, ताकि सामान्य जन इस उलझन से बाहर नहीं निकल सके|

‘दर्शन’ एवं ‘अध्यात्म’ ही कोई मौलिक, मूलभूत  एवं मूल नवाचारी विचार पैदा करता है, या कर सकता है, जो सब कुछ उलट पुलट कर सकता है, या कर देता है| इसीलिए विक्टर ह्यूगो कहते हैं कि ‘एक विचार का जब ‘उपयुक्त समय’ आता है, तब वह विचार दुनिया की समस्त शक्तिशाली सेनाओं से भी ज्यादा ताकतवर हो जाता है’| मैं इसमें एक संशोधन करता हूँ कि “कोई भी ‘उपयुक्त समय’ नहीं आता है, बल्कि ‘उपयुक्त विचार’ पैदा करना होता है, जो समकालिक होता है, और इसीलिए तत्कालीन समस्त सेनाओं से भी शक्तिशाली हो जाता है| यह ‘उपयुक्त विचार’ ‘दर्शन’ एवं ‘अध्यात्म’ ही उत्पन्न कर सकता है|

किसी भी प्रचलित धर्म का मूल एवं प्राथमिक तत्व “आत्मा” होता है, जो एक शरीर के जन्म के जीवन -कर्म को दूसरे शरीर के जन्म तक ढोता रहता है| मतलब कि एक ‘आत्मा’ के सहारे ही “पुनर्जन्म” होता है, और इस ‘आत्मा’ के बिना किसी का भी पुनर्जन्म नहीं हो सकता है| इस ‘आत्मा’ को ‘नित्य’ माना जाता है, निश्चित माना जाता है, और यह ‘अनित्य’ नहीं होता है, यानि यह ‘आत्मा’ ‘बदलने वाला नहीं’ होता है| जब किसी का ‘आत्मा’ नित्य होता है, तब उस व्यक्ति की जाति भी नित्य ही रहेगा| यही ‘आत्मा’ होती है, जो एक शरीर के जन्म के कर्मों के फल के परिणाम को अगले जन्म तक ले जाती है, और यही “कर्मवाद” कहलाता है| इसी कारण आपके जन्म की जाति यानि कर्म की सुनिश्चितता भी नित्य होता है, और इसे ही “नित्यवाद” कहते हैं| चूँकि यह सब नित्य होता है और इन सारी व्यवस्थाओं को नियमित, नियंत्रित एवं संचालित करने वाला भी कोई ‘नित्य प्राधिकार या सत्ता’ ही होगा, और उस नित्य को ही “ईश्वर” कहते हैं| यही पाँचों तत्व ही किसी भी धर्म के मूलभूत, मौलिक एवं मूल तत्व है, अन्यथा वह प्रचलित एवं पारम्परिक धर्म नहीं है, ‘कुछ अलग और कोई अन्य विशिष्ट’ चीज है| ‘आत्मा’ की अवधारणा ‘सत्ता’ को उसके ‘अव्यवस्था’ एवं ‘कुशासन’ के उत्तरदायित्व से मुक्त कर देता है, क्योंकि शासन के किसी ‘अव्यवस्था’ एवं ‘कुशासन’ का प्रतिफल को, जो कोई भी (सामान्य जन) भोग रहा है, वह उसके पूर्व के जन्म में किये गए उसके ही कर्मों के फल का परिणाम है| चूँकि कोई भी ‘सत्ता’ किसी के पूर्व जन्म में जाकर उसके कर्मों को सुधार नहीं कर सकता है, इसलिए किसी के कष्टमय एवं दुर्भाग्यमय जीवन के लिए कभी भी ‘सत्ता’ जबाबदेह नहीं हो सकता| अर्थात किसी के इन कष्टमय एवं दुर्भाग्यमय जीवन के लिए किसी शासन यानि सत्ता को दोष नहीं दे सकते हैं| आज के वैज्ञानिक युग में आत्म’, ‘मन’ एवं ‘चेतना’ तो वैज्ञानिक अवधारणा है, लेकिन इससे मिलता जुलता ‘आत्मा’ वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है|

ऐसा लगता है कि ‘धर्म’ एक व्यक्तिगत उपयोग एवं प्रयोग की अवधारणा है, लेकिन वस्तुत: ‘धर्म’ सत्ता का मौलिक एवं आधारभूत हथियार है, उपकरण है, जिसके द्वारा जनमत को नियमित एवं नियंत्रित किया जाता है| एक ‘धर्म’ किसी को जीवन के प्रति सुधार की संभावना का आश्वासन देता दिखता है, लेकिन इस जीवन में नहीं, अपितु अगले जीवन में बेहतर जीवन का आश्वासन देता है, क्योंकि यह जीवन पिछले जन्म के कर्म के आधार पर पूर्व निर्धारित है| और किसी के अगले जीवन के होने का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है| अर्थात अगले जीवन को, यानि अगले शरीर में पुनर्जन्म को कोई भी आधुनिक विज्ञान मान्यता नहीं देता है| आप किसी धर्म के कर्म या काण्ड के नाम पर अपने को विश्वास दिला सकते हैं, उर्जा एवं शक्ति पाने का दावा कर सकते हैं| यदि कोई शासन यानि सत्ता सामान्य जनता को कष्टमय एवं दुर्भाग्यमय जीवन ही दे रहा है, तो उस सत्ता के लिए यही धर्म ही ‘उद्धारक’ साबित होता है| इसीलिए सभी पारम्परिक प्रचलित धर्म मध्य युग के सामन्तवादी काल में ही अपने वर्तमान स्वरुप ग्रहण किया है, भले उसके साथ किसी भी काल के ऐतिहासिक व्यक्ति से उसे सम्बद्ध कर दिया हो| जब आप किसी भी धर्म के समर्थन में कोई ‘प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाणों’ (पुरातात्विक प्रमाणों सहित) साक्ष्यों सम्बन्धित प्रश्नों की बात करेंगे, तो ‘उपरोक्त विवेचित अवधारणा’ ही  स्पष्टतया उभर कर सामने आता है, बाकि सब मिथक है|

आप भी इस पर मनन एवं मंथन करें, आपको सब कुछ स्वत: स्पष्ट होता जायगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुधवार, 12 मार्च 2025

होलिका दहन या होली का दहन?

“होलिका दहन” या “होली का दहन” शब्द- युग्म देखने में तो एक जैसे लगते हैं, परन्तु इन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है| ‘होली का दहन' एक ऐतिहासिक सामाजिक सांस्कृतिक ‘प्रक्रम’ है एवं मूल है, जबकि ‘होलिका दहन’ एक आख्यान है, एक कथानक है, जो जन जीवन में लोकप्रिय है| जैसे उर्दू में शाब्दिक- संकेतों के हेर फेर से शब्द ‘खुदा’ भी शब्द ‘जुदा’ हो जाता है, उसी तरह यहाँ भी ‘का’ के स्थान- संरचना के हेर फेर से पूरा ताना बाना ही बदल जाता है|

आपने होली के अवसर पर देखा होगा कि होली के सम्बन्ध में, अपने समाज में, अपने आसपास में ‘तथाकथित बौद्धिकों की व्याख्याओं’ की बाढ़ आ जाती है| बताया जाता है कि 08 मार्च को “अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस” के अवसर कुछ बौद्धिक महिलाओं के अधिकार दिवस के अवसर पर एक दूसरे को बधाईयाँ देते हैं, मानवतावादी दिखने के लिए लम्बी लम्बी हाँकते हैं, और दो पक्षों (15 दिवस) के भीतर ही एक महिला के दहन के अवसर पर एक दूसरे को बधाइयाँ भी देते हैं| इससे कुछ या अधिकतर ऐसे तथाकथित बौद्धिक परेशान परेशान हो जाते हैं कि ये कैसे बौद्धिक हैं, जो खुल कर दोहरा चरित्र जीते हैं – एक तरफ महिला के गरिमामयी जीवन की कामना करते हैं, और इसी के साथ एक महिला – होलिका के दहन के अवसर पर बधाईयाँ भी देते हैं| | ऐसे तथाकथित बौद्धिकों को काफी कोफ़्त भी होता रहता है|

इसके ही साथ कुछ स्थानीय या अपने आसपास के क्षेत्रों का नाम लेकर ‘इतिहास’ के नाम पर एक कहानी दोहरायी जाती है – फलाने क्षेत्र में एक दुष्ट राजा था| उसका नाम हिरण्यकश्यप था| उसका पुत्र प्रहलाद ईश्वर भक्त था| हिरण्यकश्यप को उसके ईश्वर भक्ति से चिढ थी, इसीलिए उसे मार देने की कई प्रयास किए गए, लेकिन सभी प्रयास बेकार रहा| उस राजा की बहन ‘होलिका’ को आग में नहीं जलने का वरदान मिला हुआ था| कहानी के अनुसार होलिका प्रहलाद को अपने गोद में लेकर आग में बैठ गयी, लेकिन होलिका जल गयी, और ईश्वर भक्त प्रहलाद बच गया| विचित्र बात यह है कि इस कहानी को ऐतिहासिक मानने वाले अधिकांश तथाकथित बौद्धिक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास भी नहीं करते हैं, लेकिन प्रहलाद को बचाने वाले ईश्वर अवतार – नरसिंह में विश्वास भी करते हैं| उनके अनुसार होलिका एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थी, यानि वह किसी ऐतिहासिक काल की महिला हुई, जिसका दहन किया गया, और यह गलत हुआ| लेकिन इसी मान्यता के साथ ही ऐसे लोग ईश्वर के अवतार के वहाँ उपस्थित होने तथा एक ऐतिहासिक व्यक्ति को बचाने के प्रसंग पर चुप्पी साध लेते हैं| इस तरह यह स्पष्ट है कि जब होलिका एक ऐतिहासिक व्यक्ति रही, तो उसकी बचाने वाला भी एक ऐतिहासिक व्यक्ति अवश्य ही रहा होगा| यदि एक भाग सही था, तो दूसरा भी अवश्य ही सही होगा, यानि ईश्वर भी एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं| लेकिन यदि एक भाग सही है और दूसरा अभिन्न भाग गलत है, तो यह अधकचरा हो जायगा| यदि यह स्थिति अधकचरा की हुई, तो वैसे लोगों की बौद्धिकता को क्या कहा जाय?

स्पष्ट है कि उपरोक्त कहानी एक कथानक (Narrative) है, एक आख्यान है, एक मिथक है, और उससे ज्यादा और कुछ नहीं है| एक कथानक में सामान्य किस्म के आदमियों को ‘भावना’ में बहा ले जाने की अद्भुत क्षमता होती है| जब भारत में बौद्धिकता ह्रास हुआ और सामन्ती सामाजिक संस्कृति का उद्भव हुआ, तभी ऐसे कथानकों को गढ़ा गया| एक कथानक सुनने एवं समझने में आसान, सरल एवं साधारण होते हैं| चूँकि इसका कोई पुरातात्विक प्रमाण या कोई अन्य प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण नहीं है, जो ऐसे किसी कहानी को इतिहास के काल खंड में स्थापित कर सकते हैं, इसीलिए ये कहानियाँ मात्र एक मिथक ही होती है| ऐसे कहानियाँ यह स्पष्ट करते हैं कि ‘कथानक ही शासन करता है’| सामान्य लोग शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों से ही कोई बात समझ पाते हैं| ऐसे सामान्य लोगों को उलझा देने के लिए, या सुलझा देने के लिए ही मानसिक ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग किया जाता है| ऐसे सामान्य लोग अपनी मानसिक दृष्टि का उपयोग नहीं कर पाते हैं, और उसी कहानी का नया नया निष्कर्ष निकाल कर और सामान्य लोगों को बेवकूफ बना कर स्वयं बौद्धिक दिखलाने का प्रयास करने में सफल हो जाते हैं|

अब आप अपने बौद्धिक दृष्टि से इन सारे प्रकरण पर नजर डालें| विश्व में बौद्धिकता का उद्भव एवं उद्विकास कृषि के साथ ही शुरू हुआ| मानव जीवन में कृषि ही वह पहली व्यवस्था हुई, जब भोजन की सुनिश्चितता उन लोगों के लिए भी संभव कराया, जो कृषि कार्य में नहीं लगे थे| इस तरह कृषि व्यवस्था ही सम्पूर्ण जीवन का आधार बना| अर्थव्यवस्था के पाँचों प्रक्षेत्रों का विकास भी इसी सुनिश्चितता के साथ हुआ| चौथा प्रक्षेत्र ज्ञान सृजन का एवं पंचम प्रक्षेत्र नीतियों (शासकीय सहित) का निर्माण किया जाता है| राज्य का आर्थिक आधार भी कृषि उपज का लगान और कृषि उत्पाद का व्यापार एवं उस आधारित कर- स्नाग्रहण ही रहा| इस समय खेतों में रबी फसल तैयार रहता है, और पके हुए फसलों को खलिहान लाने की उत्साहपूर्ण तैयारी की जाती है| पुराने कृषि – अपशिष्ट एवं अन्य गन्दगी को नष्ट करना एवं नए क्षेत्र को तैयार करना बेहद जरुरी हो जाता रहा| ऐसे पुराने कचडों एवं अपशिष्टों को जला देना एक सुन्दर विकल्प रहा, जो होली का दहन हुआ| आधुनिक युग के तथाकथित बौद्धिक उस प्राचीन काल के कृषि कार्य के संपादन के प्रक्रम को आधुनिक अर्थव्यवस्था एवं नागरीय जीवन की नजरों से देखने समझने का प्रयास करते हैं, और कुंठित होते रहते हैं| अपने को आधुनिक एवं वैज्ञानिक समझने के भ्रम में सामान्य बुद्धि वाले लोग महान भारतीय सांस्कृतिक विरासत की भावना (Essence) को तोड़ मरोड़ दे रहे हैं| यह आपकी संवैधानिक स्वतन्त्रता है कि आप कोई पर्व या त्यौहार मनाएँ, या नहीं मनाएँ, लेकिन महान भारतीय संस्कृति विरासत के मूल भाव की गलत व्याख्या नहीं करे|

होली के समय जाड़े की ऋतु की विदाई हो चुकी होती है, और गर्मी दस्तक देता हुआ होता है| यह वसंत का सुहावना समय होता है| अधिकतर पेड़ अपने पुराने पत्ते झाड़ दिए होते है, और नए नए हरे कोपलों एवं हरे हरे नए पत्तों से सभी पेड़ सज धज कर तैयार हो जाते हैं| अनाज, दहलन, तेलहन एवं अन्य पौधें की फसलें पक कर तैयार रहती है| आम, महुआ, जामुन, कटहल आदि फलों के फूल मन्जर अपने सुगन्धों से फिजाँ बदल देता है| यही समय राज्यों के राजस्व संह्रहण का भी होता है| अब आप ही बताएँ कि राजा से लेकर प्रजा तक ऐसे समय में अपनी खुशियों का इजहार नहीं करे? ऐसे समय में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए ही ‘रंगों’ का उपयोग करते हैं| यदि कोई इन प्राकृतिक रंगों के नाम पर कोई अन्य कृत्रिम एवं जहरीले रंगों का दुरूपयोग कर दे, तो दोषी वह व्यक्ति हो सकता है| परन्तु इस ‘दुष्टता’ के लिए यह भारतीय सांस्कृतिक विरासत कतई दोषी नहीं होगी|

समय के संस्कृति बदलती रहती है, यानि संस्कृति गतिमान होती है| होना भी चाहिए, ‘अनुकूलन’ (Adoptation) करना ही जीवन की निरंतरता का आधार है| इसी कारण आज संस्कृति अपने स्वरुप को वैश्विक बनती जा रही है| समय बदलता रहता है, प्रसंग एवं पृष्ठभूमि भी बदलता रहता है और इसी कारण इसकी उपयोगिता एवं सार्थकता भी बदलती रहती है| जब यह सब बदलेगा, तो अनुकूलन के लिए ढाँचा भी बदलेगा, संरचना भी बदलेगा, और विन्यास भी बदलेगा, लेकिन भाव यानि मकसद तो स्थिर ही रहेगा| यह होली एक ‘पशु मानव’ के ‘बौद्धिक मानव’ में बदलने की घटना की याद दिलाती है|

‘होली’ (Holi/ Holy) का अंग्रेजी अर्थ ‘पवित्र’ होता है| अधिकतर लोग, जो आदमियों में समानता के स्थान पर विभेद ही ज्यादा खोजते रहते हैं, उनके लिए यह ‘वाक्य’ अटपटा लगेगा| एक इंगलिश शब्द है और दूसरा हिंदी शब्द है, तो समानता कहाँ से?, यह एक यक्ष प्रश्न के रूप में लाते हैं| ऐसा लगता है कि ब्रिटिश जैसे रोते हैं, हँसते हैं, तो भारतीय दूसरे स्वरुप में रोते एवं हँसते हैं| नहीं, दोनों में समानता होती है| एक यह ध्यान देने की बात है कि विश्व में वर्तमान सभी मानव ‘होमो सेपियन्स सेपियन्स’ हैं, और सभी एक ही मानव समूह (परिवार) की संतानें हैं| इनकी उत्पत्ति ही कोई एक लाख वर्ष के अन्दर ही अफ्रीका के वोत्सवाना के मैदान में हुई है, और यहीं से समय के साथ सारे विश्व में फ़ैल गए| जब कुछ समय पहले एक ही थे, और परिस्थिति के अनुकूलन के परिणाम स्वरुप सतही ढाँचे एवं संरचना में ही बदलाव हुआ है| ऐसा ही भाषा एवं संस्कृति के साथ हुआ  है| जब आप सामानता खोजेंगे, तो आपको आंतरिक समानता मिलेंगे, और जब आप असमानता खोजेंगे, तो आपको सतही असमानता मिलेंगे|  स्पष्ट है कि भारतीय ‘होली’ (Holi) भी इसी ‘पवित्रता’ (Holy) की भावना अपने में समाहित किए हुए है|

आइए, होली का त्यौहार मनाए|

मौसम के परिवर्तन के अवसर पर, फसलों के आगमन के अवसर पर, नवीनता के आगमन के अवसर पर हम भी उत्साहित हों|

स्वरुप बदल सकते हैं, तरीका बदल सकते हैं, परन्तु भाव बनाए रखिए|

जीवन में नवीनता लाने के बहाने को अवसर बनाइए|

भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 8 मार्च 2025

मैं कौन हूँ?

मैं कौन हूँ?, एक बड़ा ही सहज और स्वाभाविक प्रश्न है। लेकिन इसका उत्तर सरल (Simple) भी नहीं है, और साधारण (Ordinary) भी नहीं है। मतलब इसका उत्तर संरचना में जटिलतर भी है, और अपने उद्विकासीय अवस्था के प्रथम सोपान का ही नहीं होकर, उच्चतर अवस्था का है। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यही प्रश्न जीवन का मूल है, और यही मानव जीवन का उद्देश्य भी स्पष्ट करता है| जब आप किसी भी वस्तु (Objects, not only goods) या किसी भी क्रिया, यानि किसी भी घटनाक्रम को यथास्थिति स्वरुप में जान लेते हैं, जैसा वह उस समय एवं उस सन्दर्भ और पृष्ठभूमि में रहा था, तो उन चीजों को समझ पाना बेहद आसान हो जाता है| किसी भी वस्तु या क्रिया या अवस्था को उसी स्वरुप में जान पाना, जैसा वह उस समय वास्तव में रहा है, ही ज्ञान कहलाता है| जब कोई अपने आप को ‘मूल’ (Core) स्वरुप में, ‘मूलभूत’ (Fundamental) अवस्था में, एवं ‘मौलिक’ (Original) संरचना में जान पाता है, यानि कोई अपने आप को ‘शुद्ध’ (Pure) अवस्था में जान पाता है, तो वह यह भी जान जाता है कि “मैं कौन हूँ?” इसी ज्ञान की अवस्था को “मुक्ति” (Liberation) भी कहते हैं|

फ्रांसीसी दार्शनिक रे देकार्ते कहते हैं कि ‘मैं सोचता हूँइसलिए मैं हूँ’। मतलब जब हम सोचते नहीं होते हैं, या सोचने लायक नहीं हैं, तब मैं नहीं हूँ। इसीलिए मृत्यु उपरांत मैं नहीं हूँ, या बेहोशी में भी मैं नहीं हूँ, या गहन निद्रा में भी मैं नहीं हूँ; क्योंकि उस समय हम सोचते नहीं होते हैं। एक और स्पष्ट अर्थ यह भी है  कि जब मैं सोचने लायक भी नहीं हूँ, तो मेरे होने या नहीं होने का कोई अर्थ भी नहीं है| लेकिन यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि चिंतन की प्रक्रिया सचेतन अवस्था के साथ साथ अचेतन अवस्था में भी चलती रहती है, क्योंकि ‘मन’ शान्त होकर भी सक्रिय एवं तत्पर रहता है, तभी तो किसी अवस्था में अचानक तत्काल प्रतिक्रिया दे पाते हैं| मतलब मेरे होने या नहीं होने में मेरी ‘चेतना’ यानि चेतनता की अवस्था ही मूल है, मौलिक है, और मूलभूत भी है| इसीलिए दुनिया के सभी कालों में, और सभी क्षेत्रों के सभी बुद्धिवादियों ने यही कहा है कि हम जैसा सदैव सोचते रहते हैं, वैसा स्वरुप या अवस्था हम पा लेते हैं| हालाँकि क्वांटम भौतिकी का कोपेनहेगन वक्तव्य यही कहता है कि कोई भी चीज वहाँ इसलिए हैं, क्योंकि हम वहाँ वही देखना चाहते हैं (अवलोकन का सिद्धांत)| लेकिन क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत यह कहता है कि जिस चीज के होने की संभावना जहाँ ज्यादा होती है, वहीं उसके प्रकट होने की संभावना भी ज्यादा होती है| इसे आप चेतना के उद्दीपन के रूप में भी मान सकते हैं| अर्थात जैसा हम सोचते रहते हैं, वैसा ही हो जाते हैं|

इसका एक और स्पष्ट अर्थ यह भी है कि  मेरा शरीर और मैं, दोनों ही एक नहीं है। अर्थात मैं (मेरा मन) अपने शरीर के साथ तो हूँ, लेकिन उसका हिस्सा नहीं हूँ। इसीलिए रे देकार्ते कहते हैं कि मानव अपने शरीर और अपने मन का संयुक्त उत्पाद है| तो “मैं” मेरा ‘मन’ (Mind) है, मेरी ‘चेतना’ (Consciousness) है, मेरा ‘आत्म’ (Self) तो है, लेकिन मैं मेरी ‘आत्मा’ (Soul) नहीं है, यह कोई वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है और इसे ‘आत्म’ के पर्यार्य के रूप में दिखा कर ही सजिशतन या अज्ञानतावश उपयोग एवं प्रयोग कर अनर्थ किया जाता है। यानि हमें मन, चेतना, आत्म एवं आत्मा पर थोडा गंभीरता से ठहर कर समझना चाहिए|

पुनः मैं रे देकार्ते पर आता हूँ। मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ, यानि मैं चेतन हूँ| मैं अपनी सोच पर भी सोच सकता हूँ, जो शायद एक सामान्य पशु नहीं करता है, इसलिए ही मैं उत्कृष्ट चेतना की अवस्था में हूँ, और मैं एक पशु नहीं हूँ| इसीलिए यह स्पष्ट है कि चेतना के विकास की अवस्था ही उस मानव का स्तर निर्धारित एवं निश्चित करता है, अर्थात चेतना का विकास ही जीवन का मूल उद्देश्य है| एक पशु अपने अधिकतर कार्य व्यवहार अपनी रिफ्लेक्स (प्रतिवर्ती – Reflex) अनुक्रिया के अनुरूप ही कर पाता है, और इसमें चिंतन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण नहीं होती है, या नगण्य होती है, या नहीं ही होती है| इसीलिए ‘तुरंत प्रतिक्रिया देना’, यानि ‘बिना सोचे समझे ही प्रतिक्रिया देना’ “पशुवत प्रवृति” (Animalistic Instincts) मानी जाती है| इसी कारण ऐसे लोगों का स्तर इन पशुओं के चिंतन स्तर की ही तरह निम्नतर ही रहता है| इसलिए मेरा मानना है कि एक पशु यदि सोच भी सकता है, लेकिन वह अपनी सोच की सामग्रियों यानि उन विषयों पर फिर से नहीं सोच सकता है।

तो सवाल यह है कि यह तथाकथित ‘सोचना’ क्या होता है? किसी भी विषय या सूचना पर अपनी चिंतन प्रक्रिया की अवस्था को ठहरा देना ही ‘सोचना’ है| अर्थात किसी भी ‘सूचना’ को ‘संसाधित’ करना ही ‘सोचना’ है, यानि किसी विषय पर अपने मन के द्वारा परीक्षण करवाना ही ‘सोचना’ है| किसी में प्रतिवर्ती अनुक्रिया (Reflex Action) उसके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ही सीमित रहता है, और यह ‘सूचना’ मस्तिष्क तक भी नहीं जा पाता है, और इसी कारण से इस प्रक्रिया में मन की कोई भूमिका नहीं हो पाती है| मन तो शरीर से अलग कोई ‘उर्जा मैट्रिक्स’ (Energy Matrix) है| ‘मस्तिष्क’ मन एवं शरीर के मध्य एक वह ‘मोड्यूलेटर’ (Modulator) है, जो इनके कम उर्जा, या कम लम्बाई के तरंग (Wave), या कम विभव (Potential) की सूचना को एक दूसरे के पास अनुवादित करता है, यानि शारीरिक व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियायों को समझने एवं अनुकूलित कर विचार, भावना, एवं व्यवहार को उत्पन्न करता है| मन अपनी लगभग सभी क्रियाओं के लिए उर्जा, सूचना, पदार्थ आदि वह अपने शरीर से ही लेता रहता है, अर्थात उसकी चेतन की अवस्था के अनुसार अपने शरीर के बाहर से भी ले सकता है|

तो क्या चेतना सदैव शुद्धता की अवस्था में ही रहता है, या अशुद्धता का भी मिश्रण होता है? चेतना की अवस्था ही किसी ज्ञान के स्तर को भी निर्धारित, नियमित, निश्चित एवं नियंत्रित करता रहता है| अपनी चेतना से अशुद्धता हटाना ही ज्ञान है। ज्ञान” (Wisdom) वह विधि एवं स्तरीय उपकरण है, जिससे किसी भी चीज़ को उसी स्वरूप एवं उसी संरचना, अवस्था में जाना जाय, जैसा वह है। और इस ज्ञान का स्तर ही चेतना की शुद्धता के स्तर पर आधारित है। इसी शुद्धता एवं अशुद्धता के मिश्रण के अनुपात के कारण ही भिन्न भिन्न लोग एक ही वस्तु या अवस्था को अपने भिन्न भिन्न तरीकों से देखते, समझते एवं व्यवहार करते हैं। जब कोई भी चेतन की शुद्धता एवं अशुद्धता को जान एवं समझ जाता है, तभी वह अज्ञानता से मुक्त होता है, यानि उसे ‘मुक्ति मिल जाना’ माना जाता है| जब कोई किसी वस्तु, या घटना, या अवस्था को शुद्धता की अवस्था को जान पाता है, तभी वह उसके सम्बन्ध में कोई नवाचारी’ (Innovative) विचार, या समाधान, या उपयोग, या प्रयोग, या ‘इन्जिनीरिंग’ (समस्या का समाधान करना ही Engineering है) कर पाता है| इसीलिए तमाम वैज्ञानिक सहित सभी सामाजिक एवं आर्थिक चिन्तक भी किसी चीज या अवस्था या क्रिया को उसके मूल, मौलिक एवं मूलभूत अवस्था को ही जानना चाहता है, इसे आप विश्व से सभी विकसित व्यवस्थाओं को देख कर समझ सकते हैं| मैं भी अपने मूल को जानना चाहता हूँ|

तो शुद्धता क्या है? विश्व या ब्रह्माण्ड में सभी चीजें अपने तत्वीय एवं यौगिक जैसी शुद्ध अवस्थाओं का सम्मिश्रण है। हम चेतना की अवस्था को निम्नता, उच्चता या उच्चतमता के स्तर को इसी शुद्धता के स्तर के पैमाने पर ही स्थापित करते हैं, यानि वर्गीकृत करते हैं। ब्रह्माण्ड की सभी चीजों को शुद्ध रूप में सिर्फ ‘फील्ड’ यानि ‘कणिका’ (Particle), ‘ऊर्जा’ (Energy), ‘समय’ (Time), एवं ‘आकाश’ (Space) के रूप में ही पाया जाता है| यह स्थापित है कि ‘बिंग बैंग’ (महाविस्फोट) सिद्धांत के अनुसार कोई साढ़े तेरह अरब साल पहले किसी एक बिन्दु के महाविस्फोट से ही ये चारों मूल, मौलिक एवं मूलभूत चीजों का, यानि ‘कणिका’, ‘ऊर्जा’, ‘समय’, एवं ‘आकाश’ निर्माण हुआ, यानि उस समय के पहले कुछ भी नहीं था|  बाकी सभी इसके ही मिश्रण हैं, यानि अशुद्ध स्वरुप है| उदाहरण के लिए, धातु- विज्ञान में अयस्क (Ore) धातुओं के तत्वीय एवं यौगिक अवस्थाओं का अशुद्ध मिश्रण होता है, और निश्चित प्रक्रियायों से ही गुजार कर इसे शुद्ध अवस्था में पाया जाता है| ऐसे ही अशुद्ध चेतना को शुद्ध करना पड़ता है|

भौतिकी के सर्वोच्च स्तर पर मौजूद क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत के ‘विलक्षणता सिद्धांत’ (Singularity Theory) उन मूल चारों चीजों में सम्बन्ध स्थापित करता है| इसके अनुसार बलों का क्षेत्र (Field) से ही ‘कणिका’ (Particle), ‘ऊर्जा’, ‘समय’ (Time), एवं ‘आकाश’ (Space) उत्पन्न हुआ| ‘क्षेत्र’ (Field) वस्तुत: ऊर्जा फील्ड ही है, जिसके उद्दीपन (Excitation) से ही’ ‘कणिका बनता है| दूसरे शब्दों, ‘उर्जा’ के एकत्रण से ही ‘कणिका’ बनते हैं| ‘कणिका’ के स्थान परिवर्तन से ‘आकाश’ बनता है, और इसी ‘स्थान परिवर्तन’ को ‘गति’ कहते हैं| इसी गति से ‘समय’ का आभास होता है| दरअसल समय की वास्तविकता को समझने वाले सबसे पहले आधुनिक व्यक्ति अल्बर्ट आइन्स्टीन ही थे, लेकिन आज भी ‘समय’ को समझने में कठिनाई होती है| ‘बल’ यानि Force भी मूलत: चार – ‘कमजोर’ (Weak) बल, ‘शक्तिशाली’ (Strong) बल, ‘गुरुत्व’ (Gravitation) बल, एवं ‘इलेक्ट्रो मैगनेटिक’ (Electro Magnetic) बल ही होते हैं| इसमें से भी अभी तक गुरुत्व बल की उत्त्पति सम्बन्धी क्रियाविधि को नहीं समझा जा सका है| अल्बर्ट आईंस्टीन का ‘एकीकृत सिद्धांत’ (Unified Theory) इन सभी बलों की एकीकृत व्याख्या का प्रयास रहा है| ‘परमाणु’ के अन्दर के ‘कणों’ के ‘कम्पन’ से ही ‘इलेक्ट्रो मैगनेटिक बल’ उत्पन्न होता है, परमाणु के अन्दर इलेक्ट्रोन एवं प्रोटोन के बीच ‘कमजोर’ बल लगता है, और नाभिक के अन्दर प्रोटोनों को एक साथ बाँधे रखने वाला बल ही ‘शक्तिशाली’ बल कहलाता है| ब्रह्माण्ड में यही बल अपने शुद्ध रूप में मौजूद रहता है| बाकी सभी बल अपने मिश्रित स्वरुप में होती है|

हमारी ‘चेतना’ यानि ‘मैं’ (Self) भी ब्रह्माण्ड के इसी एकीकृत बल का “उद्दीपन” (Excitation) मात्र है, जो मेरे शरीर को ‘मन’ (Mind) के रूप में प्राप्त करता है, और शरीर के समाप्त होते ही यह चेतन यानि मैं उसी ब्रह्माण्ड के चेतन में विलीन होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर लेता है| इसीलिए आत्मा एक गलत अवधारणा है| अर्थात जब तक मेरा शरीर अपने अस्तित्व के साथ क्रियाशील नहीं है, तब तक मैं भी चेतनशील नहीं रह सकता| यही ‘मन’ ‘मैं’ हूँ, मेरी ‘आत्म’ है, मैं ‘स्वयं’ हूँ| मैं इसी मन की, इसी आत्म की, इसी चेतना की शुद्धता की बात कर रहा हूँ| जैसे, जल का उदाहरण लिया जाय| जल शुद्ध रूप में हाइड्रोजन के दो परमाणु एवं आक्सीजन के एक परमाणु का एक यौगिक है, एक अणु है और यही शुद्ध रूप है| जब आप किसी जल के अणु एवं परमाणु को, यानि शुद्ध अवस्था में जान एवं समझ जाते हैं, तब इसके स्रोत या समापन की अवस्था में इसे शुद्ध रूप में समझ पाते हैं| लेकिन यदि किसी ‘जल’ को कोई “विशिष्ट पहचान” देना चाहते हैं, तो वह अवश्य ही अशुद्ध अवस्था में होगी, अन्यथा उसका कोई अलग पहचान संभव नहीं है| यही स्थिति मेरे मन की है, यही मैं हूँ, यही मेरी चेतना है, यही मैं स्वयं हूँ, लेकिन यह मेरी आत्मा नहीं है| अर्थात मैं भी ब्रह्माण्ड के चेतन का अशुद्ध स्वरुप हूँ, और मुझे अपने चेतन के शुद्ध रूप में समझना है|

जब कोई अपनी चेतन को, यानि अपनी ‘आत्म’ को ‘अधि चेतन’ यानि ब्रह्माण्ड के ‘क्षेत्र’ (फील्ड) से संपर्क करता है, तो यही अध्यात्म”, या “अधि” + “आत्म” कहलाता है| इसी ‘आत्म’ को ब्रह्माण्ड के फील्ड से योग करने वाले को ‘योगी’ कहते हैं, और इस प्रक्रिया को ‘योग’ कहते हैं| जब मेरी या किसी की ‘चेतना’, यानि ‘स्वयं’, यानि ‘आत्म’, यानि ‘मैं’ ब्रह्माण्ड के क्षेत्र या चेतना में विलीन हो जायगा, यानि अपना अस्तित्व समाप्त कर लेगा|, तब फिर मेरा उस ‘क्षेत्र’ से कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहेगा|

मेरे आत्म, यानि मेरा (मैं), यानि मेरे स्वयं, यानि मेरी चेतना की यही वैज्ञानिक व्याख्या है, 

बाकी व्याख्याएँ आपके मन को झूठी सांत्वना दे सकता है और आप उसी में आनन्दित भी रह सकते है| इसके लिए हर कोई स्वतंत्र भी है| मैं अपने को इतना ही जान पाया हूँ|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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