यदि
सभी समस्यायों के मूल में धर्म और शिक्षा है, तो सभी समस्यायों का समाधान भी धर्म
और शिक्षा में है| शायद इसीलिए रुसी क्रान्ति की सफलता के तुरंत बाद लेनिन ने
शिक्षा को धर्म (चर्च) से अलग कर दिया था| वर्ष 1940 तक हर सोवियत नागरिक शिक्षित
था और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से युक्त हो गया| इसी शिक्षा के साथ आज भी 15 करोड़ का
रूस 35 करोड़ के अमेरिका के समक्ष बराबरी पर है| माओ त्से तुंग ने भी अपनी महान
सांस्कृतिक क्रान्ति (1960 से 1976 तक) के साथ चीन को बदल डाला| इसने ‘प्रचलित धर्मों’
को ‘मानव धर्म’ बना कर और विद्यालयी शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बना कर चीन को इस
ऊँचाई को तक पहुँचा दिया| इस दिशा और दशा में आज भारत कहाँ हैं, गंभीरता से
विचारणीय हैं|
हमें
यहाँ धर्म को समझना चाहिए, जो अपने अर्थ में ही अतिव्यापक अर्थ रखता है| शिक्षा भी
एक व्यापक अवधारणा है, जो हमें कई स्तर पर चेतना से युक्त बनाता है| भारत में धर्म
एवं शिक्षा सम्बन्धित कई वैधानिक और संवैधानिक अधिकार भी जुड़े हुए हैं, जो भारत
में कई समस्यायों को निरंतरता देते हैं|
वैसे
धर्म का एक प्राचीन अर्थ है और एक अभी का प्रचलित अलग अर्थ है| ऋग्वेद में धर्म को
विश्व का मूल आधार बताया गया है| बौद्ध दर्शन में धारणीय गुणों को ही धर्म बताया
गया है| भारतीय मनीषियों ने धर्म को एक जीवन –पद्धति के रुप में बताया है, जिसके
अनुसार वह जीवन व्यतीत करता है| यह धर्म सिर्फ कर्तव्य के पालन से सम्बन्धित होता
है, जो उस व्यक्ति, उसके परिवार, समाज, मानवता और मानवता के भविष्य के लिए सार्थक
होता है| यह धर्म समाज में ‘मानव धर्म’ के रुप में लिया जाता रहा| इस तरह यह धर्म सिर्फ
‘आस्था’ का विषय नहीं होकर विस्तृत कल्याण के लिए होता है| धर्म शब्द ‘धि’ नामक धातु
से उत्पन्न है, जिसका अर्थ ‘धारण करना’ है| यदि यह ‘धर्म’ ही ‘मानव धर्म’ है, तो
विश्व के सभी प्रचलित आधुनिक धर्म मात्र एक सम्प्रदाय हैं|
किसी
भी प्रचलित आधुनिक धर्म में उसके अपने उपास्य विषय में अखंड आस्था और उसके प्रति
पूर्ण प्रतिबद्धता अनिवार्य होता है| इसका उपास्य अलौकिक शक्ति से युक्त माना जाता
है, जो अपने अनुयायियों पर कृपा भी करता है| हर धर्म में कोई कर्मकांड अवश्य होता
है, जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण या संशोधन के लिए आवश्यक होता
है| जब भी कोई कर्मकांड होगा, उसमे पाखंड, ढोंग एवं अतार्किक विश्वास अवश्य रहेगा,
चाहे वह कितना भी वैज्ञानिक होने का दावा कर ले| धार्मिक अनुयायियों को अपने
उपास्य विषय में आस्था अखंड रखना होता है, जिस आस्था पर कोई कार्य –कारण यानि तर्क
का प्रभाव नहीं होता है| दरअसल ये धर्म नहीं होकर सम्प्रदाय हैं| खैर, हमें यहाँ
धर्म एवं सम्प्रदाय की चर्चा नहीं करना है, क्योंकि यह प्रत्येक के लिए आस्था और
निष्ठां का विषय होता है|
शिक्षा
किसी भी वस्तु या स्थिति को यथास्थिति में समझने में सहायता करता है| शिक्षा से ‘ज्ञान’
उत्पन्न होता है, जिसके उपयोग से वह ‘बुद्धि’ बनता है| भारत में पर्याप्त और
समुचित शिक्षा के अभाव में सामान्य जनों में मानवीय गुणों का अभाव है और इसके अभाव
के कारण इससे सम्बन्धित कोई धार्मिक व्यक्ति कट्टर, अंधविश्वासी, पाखंडी, क्रूर,
मुर्ख, या देशद्रोही दिखता है| यह सब पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव
में होता है|
आज
हर ज्ञान को परम्परागत धर्म के सन्दर्भ में देखने का स्वभाव बन गया है| यही हममें
घृणा, विद्वेष, ईर्ष्या,और संवेदनहीनता फैलता है| ऐसा कोई धर्म नहीं करता है,
बल्कि ऐसा धर्म के आड़ में गलत और अनुचित शिक्षा करता है| सभी धर्मों के मूल ग्रंथो
का यदि अवलोकन किया जाय, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रचलित आधुनिक धर्मों में व्याप्त
दिखती बुराइयों के लिए इनके मूल एवं मौलिक ग्रन्थ कतई जिम्मेवार नहीं है| इसके लिए
मात्र शिक्षा की गुणवत्ता और इसका प्रसार उत्तरदायी है|
भारतीय
संविधान में धर्म एवं उपासना से सम्बन्धित मूल अधिकार के बारे में मुझे कुछ
अतिरिक्त नहीं कहना है| लेकिन धार्मिक शिक्षा (अनुच्छेद 28) और संस्कृति संरक्षण
के लिए शैक्षणिक संस्थान (अनुच्छेद 30) में जो कुछ शैक्षणिक विशेषाधिकार दिए गये
हैं, वह विचारणीय विषय अवश्य है| धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के लिए स्थापित एवं
संचालित संस्थान में भी विद्यालयी शिक्षा सभी के लिए एक समान और एक प्रकृति की अनिवार्य
होना चाहिए| विद्यालयी शिक्षा में धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के नाम पर विद्यालयों
के लिए अधिकृत पाठ्यक्रम से व्यवस्था को कोई समझौता नहीं करना चाहिए| धार्मिक और
सांस्कृतिक शिक्षा अधिकृत विद्यालयी पाठ्यक्रम के अतिरिक्त होनी चाहिए या
विद्यालयी शिक्षा की समाप्ति के बाद उच्चतर अवस्था में होनी चाहिए| मैं धर्म एवं
संस्कृति संरक्षण के उच्चतर एवं शोध संस्थानों के बारे में कोई आपत्ति नहीं कर रहा
हूँ, लेकिन हर व्यक्ति को मानव बनने की मूल एवं वैज्ञानिक शिक्षा अवश्य मिलनी
चाहिए| व्यवस्था इसका नियमन एवं नियंत्रण कड़ाई से करे|
यदि
भारत को ‘एक भारत, श्रेष्ट भारत’ बनाना है, तो हर को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा
अवश्य ही सुनिश्चित करना होगा| यदि भारत को एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनना है,
तो भारत को धर्म एवं संस्कृति -निरपेक्ष विद्यालयी शिक्षा को अनिवार्य करना होगा| धर्म
एवं संस्कृति से सम्बन्धित विशेष शिक्षा को सामान्य एवं अनिवार्य शिक्षा से अलग
करना होगा| यह संवैधानिक व्यवस्था को पुनर्व्यख्यापित करने या संवैधानिक संशोधन की
आवश्यकता जताती है| इसी से सभी धार्मिक सहित अन्य समस्यायों का निदान संभव है| यह एक
सशक्त और समृद्ध राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य है| इसके बिना सारा प्रयास
राजनीति का हिस्सा हो जाता है| वही ‘राजनीति’, जिसकी ‘नीति’ (Policy) का ‘राज’ (Secret)
कोई नहीं जानता है|
इसीलिए
हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध करने के लिए सभी
संवैधानिक अपवादों से मुक्त व्यवस्था करनी ही होगी|
आचार्य
प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष,
भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|